गौरवशाली भारत-2
101. यूरोप में सारे ड्रुइडो का धर्मप्रमुख जिसे सामान्यजनों को पापी ठहराकर बहिष्कृत कराने या पापमुक्त घोषित करने का अधिकार था उसके पद का संस्कृत नाम था पाप-ह यानि पापहर्ता या पापहंता. रोम में उसके धर्मपीठ को Vatican संस्कृत शब्द वाटिका कहा जाता था. उसी पाप-ह शब्द से पोप शब्द बना. किन्तु फ्रेंच आदि अन्य यूरोपीय भाषाओँ में उस धर्मगुरु को अभी भी उसके मूल संस्कृत शब्द पाप या पाप-ह ही कहते है.(पी एन ओक)
102. The Celtic Druids, Writer-Godfrey Higgins, Picadilly, 1929 ग्रन्थ की भूमिका में हिगिंस ने लिखा है, “उत्तर भारत के निवासी बौद्ध लोग, जिन्होंने पिरमिड्स, स्टोनहेंज, कोरनोक आदि (भवन) बनाए उन्होंने ही विश्व की दंतकथाएँ (पुराण आदि) लिखी जिनका स्रोत एक ही था और जिनकी प्रणाली बड़े उच्च, सुंदर, सत्य तत्वों पर आधारित थी-उन्ही की गौरवगाथा इस ग्रन्थ में वर्णित है.
103. ब्रिटेन के ड्रुइड सेलटक नाम के एक अतिप्राचीन परम्परा के लोग थे. विश्व की अद्यात्म पीढ़ियों के वे लोग थे, जो प्रलय से बचकर ग्रीस, इटली, फ़्रांस, ब्रिटेन आदि देशों में पहुंचे. इसी प्रकार उन्हीं लोगों की अन्य शाखा “दक्षिण एशिया” से सीरिया और अफ्रीका में गयी. पाश्चात्य देशों की भाषा एक ही थी. प्राचीन आयरलैंड की लिपि ही उन सबकी लिपि थी. ब्रिटेन, गाल, इटली, ग्रीस, सीरिया, अर्बस्थान, ईरान और हिन्दुस्थान-सबकी वही लिपि थी. (The Celtic Druids, Writer-Godfrey Higgins, Picadilly, 1929)
104. ड्रुइड धर्मगुरु पूर्ववर्ती देशों के निवासी थे. वे भारत से ब्रिटेन में आए थे. प्रथम लिपि यानि कैडमियन वर्णमाला उन्ही की चलाई हुई थी. स्टोनहेंज, कोरनोक आदि एशिया और यूरोप की भव्य इमारतों के निर्माता वे ही लोग थे. (The Celtic Druids, Writer-Godfrey Higgins, Picadilly, 1929)
105. प्राचीन यूरोप के लोग सेल्ट (Celts) या केल्ट्स (Kelts) कहलाते थे. डोरोथी चैपलिन ने अपने ग्रन्थ के पृष्ठ १६-२० पर लिखा है, “केल्ट लोग विभिन्न जातियों के थे. उनकी भाषाएँ भिन्न थी तथापि उनकी संस्कृति एक थी. उनके न्यायालय होते थे. ड्रुइड पुरोहितों के बनाए नियमानुसार समाज का नियन्त्रण होता था. केल्ट जन आर्य थे या नहीं इस पर मतभेद है किन्तु यदि वे आर्य नहीं थे तो होम-हवन की प्रथा उनमें कैसे आई? ऋग्वेद के अतिरिक्त किस प्राचीन ग्रन्थ में यज्ञ के बारे में विपुल वर्णन है? हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ के अतिरिक्त बैल, वराह और सर्प को किस साहित्य में दैवी प्रतीक समझा जाता है?”
106. “इस्लाम पूर्व समय में ईरान पूर्णतया भिन्न प्रकार का देश था. ईसापूर्व सं २२३४ में ईरान में आर्य शासन था. इस्लामी देश बनने के पश्चात ईरान स्ट्रेन और विश्वासघातकी देश हो गया है. जो भी मोहम्मदी होता है उसका जीवन विषय-वासनाओं से लिप्त रहता है.” (पेज १४२, Sanskrit and its kindred Literatures-Studies in Comparative Mythology, Writer-Laura Elizabeth, London, 1881)
107. प्राचीन यूरोप में जब वैदिक संस्कृति थी तब अर्थात ड्रुइडो के समय पुरे यूरोप में वैदिक पंचांग ही प्रचलन में था. भारत में सूर्योदय लगभग साढ़े पांच बजे सुबह होता है. उस समय ब्रिटेन में रात्रि के १२ बजते हैं. अतः भारत में नए दिन की शुरुआत के समय को ही वहां भी नया दिन माना जाता था. वही परम्परा आज भी यूरोप में है और नये दिन की शुरुआत मध्यरात्रि के पश्चात् होती है. (पी एन ओक)
१०८. पहाड़ियों पर आग जलाकर २५ दिसम्बर का त्यौहार ब्रिटने और आयरलैंड में मनाया जाता था. फ़्रांस में ड्रुइडस की परम्परा वैसी ही सर्वव्यापी थी जैसे ब्रिटेन में. हरियाली और विशेषतया Mistletoe (यानि सोमलता) उस त्यौहार में घर-घर में लगायी जाती. लन्दन नगर में भी लगायी जाति थी. इससे यह ड्रुईडो का त्यौहार होने का पता चलता है. ईसाई परम्परा से उसका (क्रिसमस का) कोई सम्बन्ध नहीं है. (हिंगिस पेज १६१)
109. इशानी (Esseni) पंथ के साधू ईसाई बनाए जाने के बाद पतित और पापी रोमन और ग्रीक साधू कहलाने लगे. उनके ईसाई बनने से पूर्व के मठों में एक विशेष दिन सूर्यपूजा होता था. सूर्य को ईश्वर कहते थे. वह दिन था २५ दिसम्बर, मानो सूर्य का वह जन्मदिन था. ड्रुइड लोग भी इसे मनाते थे. भारत से लेकर पश्चिम के सारे देशों तक सूर्य के उस उत्तर संक्रमन का दिन जो मनाया जाता था उसी को उठाकर ईसाईयों ने अपना क्रिसमस त्यौहार घोषित कर दिया. (हिंगिस पेज १६४)
110. रोम नगर में अनादी काल से एत्रुस्कन लोग बालकृष्ण को गोद में लिए हुए यशोदा की मूर्तियाँ और गोकुल का दृश्य बनाकर, भगवान कृष्ण के जन्म समय पर ठीक रात्रि १२ बजे घंटियाँ बजाकर कृष्णमास त्यौहार मनाते थे. वे ही लोग जब छल बल और कपट से ईसाई बनाए गये तो उसी प्राचीन यशोदा-कृष्ण की मूर्तियों को मेरी और उसका पुत्र ईसामसीह कहकर उसी पूजा को ईसाई मोड़ देने की हेराफेरी ईसा-पंथियों ने कर दी. (पी एन ओक)
111. हिगिंस के ग्रन्थ के पृष्ठ ४३ से ५९ पर उल्लेख है कि “भारत के नगरकोट, कश्मीर और वाराणसी नगरों में, रशिया के समरकंद नगर में बड़े विद्याकेंद्र थे जहाँ विपुल संस्कृत साहित्य था.” वैसा ही वैदिक साहित्य और धर्मकेंद्र इजिप्त के अलेक्जेंड्रिया, इटली के रोम और तुर्की के इस्ताम्बुल नगरों में भी था. वहां की जनता जैसे जैसे ईसाई और इस्लामी बनती गयी वहां के मन्दिर, ग्रन्थ आदि सब जला दिए गये.
११२. सांप सीढ़ी का खेल वैदिक मनोरंजन पर आधारित है. महाराष्ट्र में इसे ज्ञानदेव का मोक्षपट, गुजरात में ज्ञानाचौपट और दक्षिण में इसे परमपद सोनपट कहते हैं.
113. अनादि समय से हिन्दू लोग सागर पर्यटन करते रहे हैं. दूर दूर के द्वीपों में उनकी सभ्यता का प्रसार होना हिन्दुओं की सागर यात्रा का ठोस प्रमाण है-कर्नल टॉड
114. लन्दन का संत पॉल कैथेड्रल चर्च प्राचीन समय में गोपाल कृष्ण का मन्दिर था. सन १६४४ के आसपास आग लगने से प्राचीन मन्दिर की इमारत को काफी क्षति हुई थी. मन्दिर का नवीनीकरण होने के बाबजूद कृष्ण परम्परा के कई चिन्ह अभी भी दिखाई देते हैं-पी एन ओक
115. उत्तर भारत के सूर्यवंशी लोगों का विश्व-प्रसार उनके विशाल भवनों से पहचाना जा सकता है. मन्दिर, महल, किले आदि की मोटी दीवारें, सार्वजनिक सुविधाओं के विविध निर्माण-कार्य जो रोम, इटली, ग्रीक, पेरू, ईजिप्त, सीलोन आदि प्रदेशों में पाए जाते हैं, उनकी विशालता से बड़ा अचम्भा होता है. (पेज-१६३, India in Greece, By e pococke)
116. दर्शनशास्त्र में तो हिन्दू जन ग्रीस और रोम से कहीं आगे थे. ईजिप्त के लोगों का धर्म, पुराण और दार्शनिक कल्पनाएँ हिन्दुओं से ली गयी थी. ग्रीक दर्शनशास्त्र लगभग पूरा ही हिन्दू दर्शनशास्त्र पर आधारित था. हिन्दू दर्शनशास्त्र बड़े गहरे और परिपूर्ण होने के कारन ग्रीक दार्शनिक हिन्दुओं के शिष्य ही रहे होंगे. (Bharat-India as seen and known by Foreigners)
117. ग्रीक लेखकों ने लिखा है हिन्दू लोग बड़े ज्ञानी थे, उनका आध्यात्मिक ज्ञान उच्चस्तरीय था. खगोल ज्योतिष और गणित में भी वे प्रवीन थे. डायोनीशस लिखता है कि हिंडून ने ही प्रथम सागर पार यात्रायें आरम्भ कर दूर-दूर देशों में निजी माल पहुंचाया. आकाशस्थ ग्रहों के भ्रमण वेग और तारों का अध्ययन और नामकरण हिन्दुओं ने ही किया. अति प्राचीन समय से प्रत्येक क्षेत्र में हिन्दू विख्यात थे. (The Culcutta Review, December, 1861)
118. हिन्दू सभ्यता प्राचीनतम है. उसके महत्वपूर्ण अवशेष जहाँ-तहां पाए जाते हैं. हर क्षेत्र की प्रवीणता और सभ्यता में हिन्दू सर्वदा अग्रसर रहे हैं. हिन्दू प्रणाली जब उत्कर्ष के शिखर पर थी उस समय अन्य सभ्यताओं का उदय भी नहीं हुआ था. हिन्दू प्रणाली की जितनी खोज की जाए उतना ही उसका स्वरूप अधिक मनोहारी और विशाल दिखाई देता है. (The Edinburgh Review, October, 1872)
119. हिन्दुओं का साहित्य प्राचीनतम होते हुए भी वह इतने व्यवस्थित रूप से जतन किया गया है कि उससे हम कितने ही सबक सिख सकते हैं और अज्ञात इतिहास की कड़ियाँ जोड़ सकते हैं-मैक्समुलर (Page-21, India what it can Teach us)
१२०. जर्मन लोग जर्मनी को डायित्शलैंड (Deutschland) कहते हैं जो दैत्यस्थान का अपभ्रंश है. कश्यप ऋषि के पुत्र दैत्य या दानव काश्यपीय सागर (Caspian Sea) के आस पास बसे थे. हालैंड देश के निवासी भी डच (Deutch) यानि दैत्य कहलाते हैं. पुराणों में दनु और मर्क नामक दो दानवों का उल्लेख आता है जिनकी शिव के पुत्र स्कन्द से लडाई होती रहती थी. उन्ही दैत्यों की स्मृति डेनमार्क देश के नाम में है. स्कैंडिनेविया वास्तव में स्कन्दनावीय है जो दैत्यों से लडाई के समय स्कन्द की नावसेना का बेस क्षेत्र या छावनी था-पी एन ओक
121. प्राचीनकाल में फ़्रांस देश को गाल (Gaul) प्रदेश भी कहा जाता था. यह गालव मुनि का कर्मक्षेत्र हो सकता है. उनका गुरुकुल, आश्रम आदि वहां रहा होगा-पी एन ओक
122. Atlantic महासागर में मूल शब्द अ-तल-अन्तिक है यानि जिसके तल का अंत ही नहीं अर्थात अति गहरा सागर-पी एन ओक
123. अफ्रीका महाद्वीप का नाम उसके आकारस्वरूप शंखद्वीप था. रावण की मृत्यु के पश्चात उसके सम्बन्धियों का राज्य माली, सोमाली (सोमालिया) राम के साम्राज्य के अंतर्गत आ गया. इन प्रदेशों पर राम के पुत्र कुश का अधिकार हो गया इसलिए इसे कुशद्वीप भी कहा जाता था. इस्लामिक आक्रमण के पूर्व इन प्रदेशों तथा उत्तर और दक्षिण सूडान, मिस्त्र आदि देश के लोग खुद को कुशायिट्स यानि कुश के प्रजाजन कहते थे. हाम (राम का अपभ्रंश) को कुश का पिता बतलाते थे.
पी एन ओक, Also see Wikipedia “Kushites”, “Kush” “Sudan”etc
124. पेलेस्टाईन प्रदेश (अब फिलिस्तीन) का नाम ऋषि पुलस्त्य के नाम पर पड़ा है. यह पुलस्त्य ऋषि के कर्मक्षेत्र होंगे. पुलस्त्य ऋषि के वंशजों के राक्षस बन जाने के कारन फिलिस्तीन शब्द का अर्थ अंग्रेजी शब्दकोश में भी राक्षसी मनोवृति (असभ्य, असंस्कृत) का ही द्योतक है-पी एन ओक
125. ऑस्ट्रिया देश की राजधानी विएना का प्राचीन साहित्य में नाम बिन्डोबन (Vindoban) है जो वृन्दावन का अपभ्रंश है. Netherlands के आगे A लगा देने पर यह Anetherland अंतर्स्थान संस्कृत शब्द बनता है. सागर स्तर से निचा होने के कारन इस देश में सागर का पानी रोकने केलिए विशेष व्यवस्था करना पड़ता है-पी एन ओक
126. आप-सिन्धु का अपभ्रंश है आबसिन. इसी से अफ्रीका का अबीसीनिया देश का नाम पड़ा है. वहां के मूल निवासी भारत से आकर बसे थे. Eusebius नाम के ग्रीक इतिहासकार ने India as seen and known by Foreigners पुस्तक में लिखा है कि सिन्धु नदी के किनारे रहनेवाले लोग ईजिप्त के समीप इथिओपिया (अबीसीनिया) प्रदेश में आकर बसे.
127. वैदिक कालगणना के अनुसार साठ पल की एक घटि और साठ घटियों का एक दिन होता है. ढाई घटियों का एक होरा बनता है. उसी होरा शब्द से Hour बना है.
128. भारतीय पद्धति में समय के मापक इकाई
१ परमाणु= १/३७९६७५ सेकंड
२ परमाणु= १ अणु
३ अणु = त्र्यसरेणु
३ त्र्यसरेणु= १ त्रुटि
१०० त्रुटि = १ वेध
३ वेध = १ लव
३ लव = १ निमिष
३ निमिष = १ क्षण
५ क्षण = १ कष्ट
१५ कष्ट = १ लघु
१५ लघु = १ घटिका = ६० पल = २४ मिनिट
२ घटिका = १ मुहूर्त
३३/४ मुहूर्त = १ प्रहर = ३ घंटा
८ प्रहर = १ दिन
१५ दिन = १ पक्ष
२ पक्ष = १ मास
२ मास = १ ऋतू
३ ऋतू = १ अयन
२ अयन = १ वर्ष
129. यूरोप के लोग जब जंगली अवस्था में रहते थे उस प्राचीन अतीत में भारत के लोगों को रोग प्रतिरोधक और रोग निवारक चिकित्सा भलीभांति ज्ञात था. विश्व के लोग जानते न हों पर आयुर्वेद शास्त्र का जन्म भारत में ही हुआ. भारत से अरबों ने सिखा और अरबों से यह विद्या यूरोप गयी. अब हमें पता लग रहा है कि हिन्दू शास्त्रों में स्वच्छता के सही नियम भी अंतर्भूत हैं. स्मृतिकार मनु मानवजाति के अतिश्रेष्ठ पथ-प्रदर्शकों में से एक हैं जिन्होंने स्वच्छ सामाजिक जीवन के आदर्श नियम बनाये हैं. (मद्रास के गवर्नर लार्ड ऑटहिल, १९०५ में मद्रास में The king Institute of preventive Medicine का उद्घाटन करते हुए.)
१३०. शल्य चिकित्सा में हिन्दू लोग बहुत अग्रसर थे. यूरोप के चिकित्सकों के हजारों वर्ष पूर्व सुश्रुत संहिता में मुत्रपिंड में चुभने वाली पथरी की शल्य-क्रिया बड़ी सूक्ष्मता से वर्णित है. आधुनिक शल्य-चिकित्सा के औजार प्राचीन नमूनों पर ही बनाये जाते हैं. दुर्घटनाओं या हमलों के कारन शरीर के अंगों में टूट-फुट हिन्दू शल्य-चिकित्सक बड़ी अच्छी तरह से दुरुस्त किया करते थे. बेबीलोन, असीरिया, ईजिप्त, ग्रीस आदि देशों में जो दवाइयाँ प्रयोग होती थी, वे सारी की सारी भारत में ही बनाई जाति थी. (Surgeon Dr. Rowan Nicks, Australia on September 29, 1983 , New Delhi)
131. प्राचीन हिन्दुओं की शल्य-चिकित्सा बड़ी साहसी और कुशल होती थी. शरीर के खराब अवयव को काटकर अलग करना, खौलते तेल के प्रयोग से दबाब द्वारा रुधिरस्राव को रोकना, पथरी निकालना, उदर या योनिस्थान में शल्य क्रिया करना, हर्निया, फिच्युला, खिसकी हुई हड्डी सही करना, टूटी हड्डी जोड़ना,शरीर से हानिकारक पदार्थ निकालना आदि जानते थे. विकृत कान, नाक आदि अवयव दुरुस्त करने की कला यूरोपियन शल्य चिकित्सकों ने हिन्दुओं से सीखी है. कठिन से कठिन प्रसूति को वे भली प्रकार निभा लेते, इतना उनका दाई-कर्म कुशल होता था-Sir William Hunter
132. Fertility and Sterility नाम का एक अमेरिकन वैद्यकीय मासिक है. उसके नवम्बर-दिसम्बर १९८० के अंक में Frank M Gautmann और Herta A Guttmann द्वारा लिखे लेख में एक स्त्री का गर्भ दूसरी स्त्री में रोपने की प्रक्रिया प्राचीन आयुर्वेद शास्त्र द्वारा कितनी कुशलता से की जाती थी, उसका वर्णन है. (जैसे, देवकी के सातवें गर्भ का रोहिणी के गर्भ में स्थानान्तरण याद करें)
133. गांधारी के १०० पुत्र सेरोगेसी (बिज रोपण प्रक्रिया) द्वारा हुए थे. उस प्रक्रिया का पूरा वर्णन बड़ी बारीकी से महाभारत में अंकित है. महाभारत का युद्ध संभवतः ईसा पूर्व सन ३१३८ में हुआ था-पी एन ओक
१३४. सुश्रुत के ग्रन्थ में शल्यक्रिया के १२१ औजारों का वर्णन है. सुश्रुत ने ११२० रोगों के नाम दिए हैं जिनकी पहचान नाड़ी परीक्षा, हृदय की धक धक और अन्य लक्षणों से करने का मार्ग बतलाया है. सन १३०० के एक ग्रन्थ में नाड़ी परीक्षा का वर्णन दिया है. मूत्र परिक्षण विश्लेषण आदि से रोग का पता लगाने की विधि बतलाई गयी है-पी एन ओक
135. रूस के साइबेरिया में वैदिक संस्कृति के अवशेष अब भी दिखाई देते हैं. भारत से डॉ लोकेश्चन्द्र कुछ साथियों को लेकर वहां दो-तिन बार गये. उन्होंने वहां देखा की वहां के लोग अभी भी गंगा जल की पवित्रता को मानते हैं. हिंगाषटक, त्रिफला आदि आयुर्वेदिक औषधि बनाते हैं. रोग से मुक्ति केलिए आयुदेवता की पूजा करते हैं. ऐसे ही एक आयुदेवता की मूर्ति हौज खास, नई दिल्ली में प्रदर्शित है-पी एन ओक
136. वैदिक स्थापत्य यानि वास्तुकला और नगर-रचना की पूरी विधि मूल तत्व आदि विवरण जिन संस्कृत ग्रंथों में मिलता है उन्हें अगम साहित्य कहा जाता है.ये ग्रन्थ बहुत प्राचीन हैं. मानसार शिल्पशास्त्र के रचयिता महर्षि मानसार के अनुसार ब्रह्मा जी ने नगर-निर्माण और भवन-रचना विद्याओं में चार विद्वानों को प्रशिक्षण दिया. उनके नाम हैं-विश्वकर्मा, मय, तवस्तर और मनु.
137. शिल्पज्ञान (Engineering) की सबसे प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ है भृगु शिल्पसन्हिता. किले, महल, स्तम्भ, भवन, प्रासाद, पुल, मन्दिर, गुरुकुल, मठ आदि बनाने की विधि बताने वाली अन्य संस्कृत ग्रन्थ हैं-मयमत, काश्यप, सारस्वत्यम, युक्ति कल्पतरु, समरांगन, सूत्रधार, आकाश भैरवकल्प, नारद शिल्पसन्हिता, विश्वकर्मा विद्याप्रकाश, बृहतसंहिता, शिल्पशास्त्र आदि.
138. कुतुबुद्दीन ने कुतुबमीनार बनबाई या शाहजहाँ ने ताजमहल बनबाया एसा उल्लेख कुतुबुद्दीन या शाहजहाँ के दरबारी द्स्ताबेजों में या तत्कालीन तवारीखों (इतिहास की किताबों) में भी नहीं है. मुसलमानों द्वारा किसी इमारत को कब्जा किये हुए जब वर्षों बीत जाते थे तो चाटुकार दरबारी जो जिस हिन्दू ईमारत को हड़पता था उसे ही उसका निर्माता घोषित कर देते थे. सिर्फ भारत ही नहीं पुरे विश्व में मुसलमानों ने इसी फर्जीवाडा से लूट की इमारतें अपने नाम घोषित की है. वामपंथी इतिहासकार भी वही करते आ रहे हैं-पी एन ओक
139. “विधवा का मुंह तक नहीं देखना चाहिए” इस उद्गार का वास्तविक अर्थ है उनका जल्द से जल्द पुनर्विवाह कर देना चाहिए ताकि उसका भी कल्याण हो और सामाजिक मर्यादा भी भंग होने न पाए. पहले तो युद्ध में एक साथ हजारों लाखों स्त्रियाँ विधवा हो जाती थी, महाभारत युद्ध में तो करोड़ों विधवाएं हुई. अभिमन्यु की विधवा क्या तिरस्कार के योग्य थी? यह उद्गार वैसा ही है जैसे गांवों में कहावत है “मर्द को खाते और स्त्री को नहाते कोई न देख पाए” अर्थात मर्द जल्दी खाकर काम पर जाए और स्त्री जल्दी से नहा ले क्योंकि पहले आज की तरह सुविधा नहीं होती थी.
140. गुम्बद (dome) का संस्कृत शब्द आमलक और कुम्भज है. कुम्भज मतलब कुम्भ (घड़ा) जैसा. गुम्बद कुम्भज का ही अपभ्रंश हैं. इसलिए यह कहना की गुम्बद इस्लामिक स्थापत्य कला है बिलकुल झूठ है. गुम्बद क्या इस्लामिक स्थापत्य कला जैसा कोई कला है ही नहीं. कुम्भ को अंग्रेजी में Comb कहते हैं इसी का अपभ्रंश अंग्रेजी में कुम्भज केलिए Dome हुआ-पी एन ओक
141. स्तम्भ में अंदर से जीना, हर मंजिल पर छज्जे, स्तम्भ के शीर्ष पर छत्र यानि गुम्बद होना यह सारे हिन्दू दीपस्तम्भ के लक्षण है. वैदिक स्थापत्य में इसे एक स्तम्भ कहते हैं. इटली में पीसा की झुकी मीनार, अफगानिस्तान के गजनी में स्थित मीनार, दिल्ली का तथाकथित कुतुबमीनार, ताजमहल के चरों कोनो पर स्थित मीनार, अहमदाबाद का हिलता मीनार आदि सारे वैदिक स्थापत्य के उदाहरन है-पी एन ओक
142. रोमन लोग विश्व के श्रेष्ठतम भवन निर्माता रहे हैं, तथापि सुशोभित या सजी-धजी इमारतें वे बना नहीं पाए.वे कमानें तो बनाते थे तथापि स्थापत्य की उनकी कोई विशेषता नहीं है.भवनों की विशालता और ग्रीक शैली का विचित्र अनुकरण, यहीं तक उनका स्थापत्य सिमित था. भारत में सुशोभित या सजी-धजी इमारतें बृहद पैमाने पर दिखाई देती है. (रोबर्ट बर्न, introduction to Rome and the Campagna)
143. ग्रीक भूगोलवेत्ता स्ट्रैबो ने लिखा है कि, “ग्रीस के लोगों की गान पद्धति, उनकी लय, तन, गाने आदि सारे पूर्ववर्ती प्रदेशों (भारत) से लिए हुए दिखाई देते हैं. भारत सहित पूरा एशिया खंड का प्रदेश Bacchus (यानि त्रयम्बकेश या शिवपूजक) था और पाश्चात्य संगीत का अधिकार स्रोत वही है. एक अन्य लेखक पौर्वात्य के सितार बड़े ठाठ से बजाए जाने का उल्लेख करता है.
144. देववाणी संस्कृत के शब्द भी वैज्ञानिक विश्लेषणों पर आधारित होते है. जैसे, जगत-ज गत का अर्थ है वह जो गतिमान है यानि जो प्रतिक्षण परिस्थिति बदलती रहती है. संसार का सभी दृश्य और अदृश्य पदार्थ गतिमान है यहाँ तक स्वयं पृथ्वी और सौर मंडल भी. उसी तरह संसार का मतलब होता है संसरति-इति यानि जो प्रवाह के सामान गतिमान होता है-पी एन ओक
१४५. रूस के काल्मिक प्रदेश की राजधानी एलिस्ता में काल्मिक भाषा में रामायण छपी है. काल्मिक दंतकथाओं में रामायण के कई प्रसंग प्रस्तुत किए जाते हैं. उस प्रान्त के ग्रंथालयों में प्राचीन काल्मिक लिपि में लिखे रामायण के सात संस्करण सुरक्षित हैं. (डेक्कन हेराल्ड, दिसम्बर १५, १९७२, बेंगलोर)
लेनिनग्राद में रुसी और मंगोलियाई भाषाओँ में लिखी और भी रामकथाएं उपलब्ध हैं-पी एन ओक
146. रशिया ऋषिय (प्रदेश) का अपभ्रंश है. प्राचीन काल में यह ऋषि मुनियों का प्रमुख तपश्चर्या स्थल था. रूस का काल्मिक प्रदेश में काल्मिक बाल्मिक शब्द है-पी एन ओक
वैदिक काल में १२ देवासुर संग्राम इलावर्त (सोवियत रूस) में हुआ था-MKV
147. स्ट्रैबो के अनुसार भारत तक का एशिया खंड Bachhus (त्रयम्बकेश उर्फ़ शिव) को समर्पित था. उसी प्रदेश में Hercules (हरक्युलिस अर्थात हरि कुल ईश या कृष्ण) और Bachhus को पूर्ववर्ती प्रदेशों का स्वामी कहा जाता था. बेबीलोन और मिस्त्र की संस्कृति के वही उद्गमस्थल थे. ग्रीक और रोमन जनता के Buchhus और मित्रस (सूर्य) देवता उसी प्रदेश के थे. (पृष्ठ ४४, Buddhisht and Christian Gospels, The Yukwan Publishing house, Tokyo, 1905)
148. दुनियाभर में शिव की पूजा का प्रचलन था, इस बात के हजारों सबूत बिखरे पड़े हैं. पुरातात्विक निष्कर्षों के अनुसार प्राचीन शहर मेसोपोटेमिया और बेबीलोन में भी शिवलिंग की पूजा किए जाने के सबूत मिले हैं. इसके अलावा मोहन-जोदड़ो और हड़प्पा की विकसित संस्कृति में भी शिवलिंग की पूजा किए जाने के पुरातात्विक अवशेष मिले हैं. हाल ही में इस्लामिक स्टेट द्वारा नष्ट कर दिए गए प्राचीन शहर पलमायरा, नीमरूद आदि नगरों में भी शिव की पूजा के प्रचलन के अवशेष मिलते हैं. इसके अतिरिक्त इन जगहों में भी शिवलिंग हैं:
भारत के बाहर शिवलिंग कहां कहां
– ग्लासगो, स्काटलैंड में सोने के शिवलिंग है.
– तुर्किस्तान के शहर में बारह सौ फुट ऊंचा शिवलिंग है.
– हेड्रोपोलिस शहर में तीन सौ फुट ऊंचा शिवलिंग है.
– दक्षिण अमेरिका के ब्राजील देश में अनेक शिवलिंग हैं.
– कारिथ,यूरोप में पार्वती का मंदिर है.
– मेक्सिको में अनेक शिवलिंग हैं.
– कम्बोडिया में प्राचीन शिवलिंग है.
– जावा और सुमात्रा प्रदेशों में भी अनेकों शिवलिंग हैं.
– इंडोनेशिया में अनेक भव्य देवालय एवं प्राचीन शिलालेख हैं. इन शिलालेखों में शिव-विषयक लेख ही अधिक हैं. जिनके आरम्भ में लिखा रहता है- ॐ नम: शिवाय.
– इजिप्ट का सुप्रसिद्ध स्थल और आयरलैंड का धर्मस्थल शंकर का स्मारक लिंग ही है.
– नेपाल, पाकिस्तान और भूटान आदि कई देशों में ईश्वर शिवलिंग के प्रमाण मिलते हैं.
– चीन में नील सरस्वती का मंदिर है.
– इजिप्ट का सुप्रसिद्ध स्थल और आयरलैंड का धर्मस्थल शंकर का स्मारक लिंग ही है.
– अलेक्जेंड्रिया में अंतर्राष्ट्रीय शिव तीर्थस्थल था. यूरोपीय इतिहासकारों के अनुसार अलेक्जेंडर भारत की ओर बढने से पहले इस शिव तीर्थस्थल में दर्शन पूजा किया था.
-मक्का में मक्केश्वर महादेव की पूजा जगत प्रसिद्ध है, आदि.
149. ग्रीस में ईसाई पूर्व काल में इशानी पंथ होता था. इशान शंकर का नाम है, ग्रीस के लोग शिवपंथी थे. इसी कारन ग्रीस और रोम में शिव की मूर्तियाँ और शंकर की पिंडियाँ भी बड़ी संख्यां में प्राप्त होती रही है. पंथ दीक्षा लेते ही प्रत्येक ईशानी एक शुभ्र कौपीन धारण कर पैर में खडाऊं पहनता था.
150. प्राचीन समय के आर्य, ईशानी-यानि शिव पंथी, समरीटन यानि मनुस्मृति आदि स्मृति ग्रंथों के अनुसार आचरण करनेवाले, स्टोह्क्स यानि स्तविक जो स्तवन करा करते थे, इजिप्तिशियंस यानि अजपति राम के देश के लोग, असीरियनस यानि असुर, सिरियन्स यानि सुर, रोमन यानि रामपंथी, ज्यू यानि यदु लोग, कननाईट यानि कन्हैयापंथी, कुशाईट यानि कुश के प्रजाजन, एट्रूस्कन यानि ऋषि अत्रि के अनुयायी, यवन यानि ग्रीक, म्लेच्छ यानि मलेशियन आदि स्थानीय विविधताओं के साथ सभी वैदिक संस्कृति के अनुयायी ही थे-पी एन ओक
151. लेखक Spencer Lewis के ग्रन्थ The mystical Life of jesus के पृष्ठ १३५ पर मुकुटधारी शिशु का एक चित्र मुद्रित है और उसके निचे लिखा है, “Research has revealed that a similar statue of a holy child was exhibited on Chrismas Day in many lands before the Christian era.”
152. चैत्र से प्रारम्भ होनेवाला मास अरब, यूरोप में एकाम्बर द्वितीयाम्बर आदि संख्यावाची शब्दों में भी गिना जाता था. यूरोपियनों के ईसाई बनने पर नवमास मार्च (जैसे इंग्लैण्ड में २२ मार्च जो १७५२ ईसवी तक चला) को रूढ़ हो गया. उसी मार्च महीने को प्रथम मास मानकर सेप्टेम्बर (सप्तअम्बर), ऑक्टोबर (अष्टअम्बर), नवेम्बर (नवअम्बर), दिसम्बर (दशअम्बर) आदि क्रमशः ७ वा, ८ वा, ९ वा, १० वा आदि मास बना था. फिर अचानक से एक आदेश के तहत जनवरी को नव मास अथवा प्रथम महीना मान लिया गया-पी एन ओक
153. लेखक Spencer Lewis ने अपने ग्रन्थ The mystical Life of jesus के पृष्ठ १५६ पर लिखा है कि “क्रिस्तस नाम या उपाधि पूर्ववर्ती देशों के अनेक गूढ़ पंथों में देवावतार की द्योतक थी. क्रिस्तस यह मूलतः ईजिप्त के एक देवता का नाम था. ईजिप्त के लोग जिसे ‘ख’ कहते थे उसे ग्रीक ‘क्ष’ लिखते थे. ग्रीक ‘क्ष’ का उच्चारण ‘क’ भी किया जाता था. इसी कारन ईजिप्त का ‘खरु’ ग्रीक भाषा में ‘कृ’ लिखा जाता था.”
क्रिस्तस मूलतः कृष्णस शब्द है. ‘ष्ण’ का उच्चारण ही ष्ट या स्त था. एसा उच्चारण भारत के कई प्रदेशों में भी होता है. अतः स्पष्ट है कि कृष्ण ही कृष्ट, कृष्त, ख्रीष्ट है तथा कृष्णनीति ही कृष्टनीति, ख्रीस्टनीति, क्रिश्चनीति है. ईशस कृष्ण का रोमन/ग्रीक उच्चार ही जीसस कृष्ट या क्राईस्ट है. जीसस नाम का कोई व्यक्ति कभी पैदा नहीं हुआ. ईजिप्त में ब्रिटिश-फ़्रांस युद्ध के समय भी कृष्ण मन्दिर था-पी एन ओक
154. दिसम्बर अर्थात दशम्बर अथवा दसवां महिना. रोमन में X का मतलब होता है १०. इसलिए X’mas का मतलब भी होता है दसवां महीना. दूसरी बात, Spencer Lewis ने लिखा है कि, “प्राचीन लोग शुभ अक्षर XP लिखा करते थे”. X कृष्ण शब्द का अद्याक्षर था क्योंकि ग्रीक ‘क्ष’ का उच्चारण ‘क’ भी किया जाता था. उसी तरह P परमात्मा या परमपिता का. अतः X’mas का मतलब संस्कृत कृष्णमास था जिसका अपभ्रंश अब क्रिसमस हो गया है. अपने अतीत के इतिहास को नष्ट भ्रष्ट कर देने और नकार देने के कारन यूरोपियनों की एसी हालत हो गयी है जिन्हें X’mas का सही मतलब भी पता नहीं है-पी एन ओक
154. ईसाई, इस्लामी और वामपंथी तीनों इतिहास के दुश्मन होते हैं. ये तीनों अपने अतीत के इतिहास को निकम्मा और गैरजरूरी बताकर नष्ट कर देते हैं. अगर भारत में घर घर में रामायण, महाभारत, वेद, पुराण आदि नहीं होते तो ये तीनों मिलकर भारत के गौरवशाली अतीत को भी नष्ट करने में सफल हो गये होते-पी एन ओक
155. जेरुसलम का तथाकथित Dome on the Rock मस्जिद प्राचीन अष्टकोणीय मन्दिर है. उसके गुम्बद के निचे अंदर जो रॉक अथवा चट्टान है वह स्वयम्भू महादेव थे. वही वहां के देवता हैं. भक्तगण उन्ही की पूजा और परिक्रमा करते हैं. परवर्ती काल में कुछ भावुक लोग उस पवित्र चट्टान के टुकड़े पूजा केलिए घर ले जाने लगे इसलिए उसे जाली से बंद कर दिया गया है. अब लोग जाली के बाहर से चट्टान की परिक्रमा करते हैं. जाहिर है चट्टान की पूजा और परिक्रमा अतीत के मन्दिर की यादें है इस्लामिक पूजा पद्धति नहीं-पी एन ओक
156. इस्लाम संस्कृत ईशालयम से बना है जिसका अर्थ होता है देवता का मन्दिर. काबा प्राचीनकाल से अरबों का प्रमुख ईशालयम था. मोहम्मद का परिवार वहां के पुजारी थे और अरब के लोग उस ईशालयम के अनुयायी. इसलिए मोहम्मद पैगम्बर ने जब काबा ईशालयम पर कब्जा किया तो उसने अपने मुहम्मदी पंथ का नाम ईशालयम उर्फ़ इस्लाम (अरबी उच्चार) रखा-पी एन ओक
157. जापान में सरस्वती, गणेश, कृष्ण आदि वैदिक देवताओं के हजारों मन्दिर हैं. जापानी डाक-विभाग द्वारा भी मुरलीधर कृष्ण का टिकट इराक की तरह ही श्रद्धा भाव से प्रकाशित किया गया है-पी एन ओक
158. ग्रीस के कोरिन्थ नगर के म्यूजियम में दीवार पर एक वृक्ष की छाया में पैर के आगे दूसरा पैर धरे हुए भगवान कृष्ण का बांसुरी बजाते और धेनु चराते एक चित्र प्रदर्शित है. अज्ञानी यूरोपीय पुरातत्वविदों ने उसके निचे लिख रखा है “एक देहाती दृश्य”. ग्रीस के नरेशों के सिक्कों पर ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक कृष्ण-बलराम की प्रतिमाएं खुदी होती थी. कृष्ण की मूर्तियाँ यूरोप अफ्रीका आदि देशों के मन्दिरों में होती थी और उन्हें रधमंथस, हेराक्लिज, हरक्यूलीज, हिरम, हर्मिस, कृष्ण, कृष्ट, इशस आदि नामों से जाना जाता था-पी एन ओक
(सिकन्दर मन्दिरों में पूजा करता था और कई मन्दिर बनबाया था इसके पर्याप्त प्रमाण हैं. ईसा पूर्व दूसरी सदी में पुष्यमित्र शुंग के समय सिंध पार के ग्रीक राजा मेनान्डर बौद्ध धर्म अपना लिया था. आगे सातवाहनों ने उन्हें अरब तक खदेड़ दिया. हो सकता है इसका प्रभाव ग्रीस की जनता पर पड़ा हो और उनमे से कुछ बौद्ध तो कुछ सनातन धर्म के विरोधी हो गये हों. धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से कमजोर पड़ने पर जब रोमन ईसाईयों ने हमला कर उन्हें ईसाई बनाया होगा तो स्वाभाविक है ईसाईयों ने ग्रीस के प्राचीन वैदिक अतीत को नष्ट भ्रष्ट कर दिया होगा-MKV)
159. यहूदी लोगों को Judaist और Jew भी कहा जाता है. ये यदुकुल के लोग हैं. यदु का अपभ्रंश यहूदी है और जदु उच्चारण से अपभ्रंश जुडेई हुआ. ज्यू लोगों का केलेंडर ३७६१ BC से प्रारम्भ हुआ जो ईसवी सन २०१९-२० में ५७८० वा वर्ष चल रहा है. उनके संवत को Passover वर्ष कहते हैं. Passover का अर्थ है देश छोड़कर निकला जाना. अर्थात उन्हें द्वारिका राज्य छोड़े और कृष्ण से बिछड़े हुए ५७८० वर्ष हो गया. वे जब द्वारिका से बिछड़े तब से उन्होंने निजी सम्वत गणना आरम्भ की. अतः महाभारतीय युद्ध हुए लगभग ५७८१ वर्ष होना चाहिए-पी एन ओक
(इजरायल के लोग भ्रमवश खुद को ईजिप्त से इस्रायेल भागकर आये हुए समझते हैं क्योंकि एसा हिब्रू बायबल में लिखा है. परन्तु विस्तृत अध्ययन से पता चलता है इस बात का न तो कोई एतिहासिक और न ही पुरातात्विक आधार है. सभी स्रोतों में इसे मिथक कहा गया है. कुछ इतिहासकार इन्हें दक्षिण ईजिप्त के Cannan के कननाईट से जोड़ते हैं. हम जानते हैं Cannan मूलतः कान्हा शब्द है और कननाईट कान्हापंथी ही थे. अतः सम्भव है यदु लोग द्वारिका से निकलकर पहले ईजिप्त गये हों परन्तु वहां अनुकूल परिस्थिति नहीं होने के कारन वे इस्रायल आ गये हों-MKV)
160. The Chosen People ग्रन्थ के लेखक अलेंग्रो लिखते हैं की, “यहूदियों के प्रख्यात पूर्वज तथा उनके भगवान के नाम सेमेटिक (अर्थात अरबी) परम्परा के नहीं है. वे तो किसी प्राचीनतम पौर्वात्य सभ्यता ही नहीं अपितु प्राचीनतम जागतिक परम्परा के हैं.”
यहूदियों के पूर्वज और भगवान प्राचीनतम पौर्वात्य सभ्यता के होने का मतलब स्पष्ट है भारतीय पूर्वज और कृष्ण भगवान.
161. प्राचीन कम्बोडिया (कम्बोज) में सम्भवतः उड़ीसा के राजाओं का राज्य था. कम्बोडिया और उड़ीसा दोनों के प्राचीन नृत्य, गान, वेशभूषा, वाद्य, गहने और प्रासाद तथा मूर्ति शैली में गहरी समानता है-पी एन ओक
162. स्याम (थाईलैंड) के लोग आज भले ही बौद्ध धर्म मानते हों परन्तु उनकी संस्कृति वैदिक परम्परा की है. वहां के राजपुरोहित वैदिक धर्मी यानि हिन्दू ही होते हैं. स्याम के राजा का राज्याभिषेक प्राचीन वैदिक संस्कारों से वैदिक मन्त्रों सहित होता है. प्रत्येक राजा को राम की पदवी दी जाती है. बैंकोक से पहले स्याम की राजधानी अयूथ्या था जिसे म्यांमार ने युद्ध में तबाह कर दिया था-पी एन ओक
163. स्याम (थाईलैंड) की प्राचीन राजधानी अयूथ्या का वर्णन इतिहास में इन शब्दों में मिलता है:
देवदूतों का नगर, अमरपुरी, इंद्र की रत्नजड़ित चमकती धमकती बस्ती, शोभायमान मन्दिरों से भरी अयूथ्यानरेश की नगरी, राजा के विशाल एवं सुंदर महलों का नगर, विष्णु और अन्य समस्त देवी देवताओंका निवास स्थान आदि-पी एन ओक
164. मलय प्रदेश (मलेशिया) की राजधानी कोलालम्पुर चोलानाम्पुरम का अपभ्रंश हैं. यहाँ चोल राजाओं का शासन था.नगर के मध्य में एक विशाल शिवमंदिर था जिसमे स्फटिक के विशाल शिवलिंग की पूजा होती थी. उत्खनन में उस नगर के मध्यवर्ती भाग में शिवमंदिर के अवशेष पाए गये हैं जिन्हें अरबों ने नष्ट कर दिया था. वहां के राज परिवार और रियासत में अभी भी आर्य संस्कृति और संस्कृत के शब्द विद्यमान हैं जैसे श्री, महादेवी, महाश्री, राम हुसैन, लक्ष्मण हुसैन आदि-पी एन ओक
165. जावा, सुमात्रा और बाली द्वीपों (इंडोनेशिया) पर इस्लामिक आक्रमण से पूर्व वैदिक धर्म और आर्य संस्कृति ही प्रचलन में था. इस्लामिक आक्रमण के बाद वैदिक धर्म तो लगभग खत्म हो गया है परन्तु आर्य संस्कृति का लोप अभी नहीं हुआ है. चोलों के समय यहाँ चोलवंश का शासन था. बाली द्वीप में तो अभी तक चातुर्वर्ण्य व्यवस्था का हिन्दू धर्म ही प्रतिष्ठित है. वहां के पंडित पंडा कहा जाता है. बाली में परम्परागत सारे उत्सव, त्यौहार, व्रत, पर्व आदि अभी तक वैदिक पद्धति से मनाए जाते हैं-पी एन ओक
166. ऑस्ट्रेलिया के माओरी जनजाति प्राचीन वैदिक संस्कृति के लोग हैं. वे अभी भी ललाट पर तिलक लगाते हैं. उनकी शक्लें तमिलों से मिलती है और भाषा भी तमिल से मिलती जुलती है-पी एन ओक
167. वैवस्त मनु स्वयं सूर्य (प्रजापति वरुण के छोटे भाई, न की Sun) पुत्र थे और मनु से ही सारे मानव हुए. इस दृष्टि से जापानी राजकुल की उत्पत्ति सूर्य से माना जाना जापान की वैदिक परम्परा ही सिद्ध करती है-पी एन ओक
168. शाक्य मुनि (इच्छवाकू वंशी शाक्य क्षत्रिय) सिद्धार्थ गौतमबुद्ध एक सीधा-सादा हिन्दू साधू था. उसने न ही कभी हिन्दू धर्म का त्याग किया और न ही कोई दूसरा धर्म स्थापन किया. जन्म से मृत्यु तक सिद्धार्थ हिन्दू ही रहा, किन्तु राजसी जीवन त्यागकर साधू बन जाने पर सिद्धार्थ के त्याग से प्रभावित विश्व के अधिकांश लोग उसके व्यक्तिगत अनुयायी बन गये-पी एन ओक
169. चीन का धर्म और संस्कृति निसंदेह हिन्दू स्रोत की है. एक समय था कि लोयंग प्रान्त में ही ३००० हिन्दू साधू और दस सहस्त्र भारतीय कुटुम्ब बसे हुए थे जो वैदिक धर्म, संस्कृति और कला को बराबर चला रहे थे. (पृष्ठ ११३, Ideals of the East, लेखक ओकाकुरा)
170. यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि चीन का धर्म भारत से उद्भूत है. (पृष्ठ ८५, The Theogony of the Hindus)
171. रामायण में चीन का उल्लेख कोषकार (रेशम का कोष निर्माण करने वाले) कीड़ों का प्रदेश के रूप में हुआ है. (पृष्ठ ८, खंड-२, आर्यतरंगिनी, लेखक-ए. कल्याणरामन)
172. चीन देश में किसी शिशु का जन्म होते ही उसका जन्म समय, तारीख और राशी लिखी जाती है. प्रवास को निकलते समय भी ज्योतिषियों से योग्य मुहूर्त पूछा जाता था. यहाँ के ज्योतिषी बड़े प्रवीन हैं और उनकी कही बातें अधिकतर सच निकलती थी. (पृष्ठ १९१, खंड-२, मार्कोपोलो का प्रवास वर्णन)
173. चीन का ज्ञानकोष सम्पादन करने वाले प्राध्यापक Huang Xin Chuang कहते हैं, “चीन के राजकुलों की वेदों पर बड़ी श्रद्धा थी. लगभग सारे ही राजघराने वेदों का चीनी भाषा में अनुवाद करा लेते थे. योग और आयुर्वेद के संस्कृत ग्रन्थों का भी चीनी भाषा में अनुवाद हुआ है. लगभग पांच सहस्त्र प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद चीनी भाषा में उपलब्ध हैं. भारत में उपलब्ध ह्स्तलिखितों से भी कई चीनी अनुवाद अधिक प्राचीन हैं.”
174. दक्षिण चीन सागरतट पर कोवान्झाऊ नाम का नगर है. वहां उत्खनन में शिव, विष्णु आदि वैदिक देवताओं की मूर्तियाँ तथा दीवारों पर खुदे अनेक देवी देवताओं के चित्र पाए गये. वहां के एक प्राचीन खंडहर में कृष्ण, हनुमान, लक्ष्मी, गरुड़ आदि की मूर्तियाँ और चित्र पाए गये. यह सारी सामग्री स्थानीय म्यूजियम ऑफ़ ओवेर्सिज कम्युनिकेशन में प्रदर्शित है-पी एन ओक
175. चीन के जन्जिओंगचोंग शहर में चार फूट ऊँची विष्णु भगवान की मूर्ति, करीब ७१ नृसिंह भगवान की मूर्ति मिली. वहां विष्णु पुराण की कथाएं, कैलाश पर शिव पार्वती आदि कथाएं चित्रित मिली. वहां के म्यूजियम के अधिकारी डॉ Yang Qin Zhang के अनुसार वहां का एक मन्दिर भारत के मदुरई के मीनाक्षी मन्दिर शैली का बना हुआ है-पी एन ओक
176. चीन के कोवान्झाऊ में दीवारों पर उत्कीर्ण चित्र में कुबेर के दो पुत्र, सात कन्याओं के साथ जलक्रीडा करते हुए कालिया नाग तथा बालकृष्ण द्वारा कलिया नाग दमन का चित्र प्रदर्शित है. गरुड पर आरूढ़ विष्णु भगवान का भी चित्र है-पी एन ओक
177. अयोध्या के सूर्यवंशी राजा की कन्या से कोरिया के राजा किम सुरो का विवाह हुआ था. कोरिया के इतिहास में लिखा है कि ईसवी सन ४९ में अयोध्या की राजकन्या ईश्वरीय आज्ञा के अनुसार नौका से सागर पारकर कोरिया में दाखिल हुई. जिस क्षत्रिय कोरियाई राजा से उस भारतीय राजकुमारी का विवाह हुआ वह राजा नौ फुट लम्बा था.
178. वैदिक संस्कृति में आठ दिशाएं हैं-उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम, ईशान्य, आग्नेय, नैऋत्य और वायव्य. इन दिशाओं के पालक कुबेर, इंद्रा, यम, वरुण, इशाणु, अग्नि, राक्षस और वायु हैं जिन्हें अष्टदिक्पाल कहा जाता है. कोरिया में अष्टदिक्पालों की मूर्तियाँ बनती थी और पूजी जाती थी. उनमे से कुछ मूर्तियाँ ब्रिटिश म्यूजियम में प्रदर्शित है-पी एन ओक
179. मिस्त्र का नाम ईजिप्त श्रीराम के पूर्वज अजपति का अपभ्रंश है. ईजिप्त की दंतकथाओं में दशरथ की कथाएं अन्तर्निहित हैं. इथिओपिया आदि उत्तर अफ़्रीकी देशों के साथ प्राचीन ईजिप्त के लोग भी खुद को कुशाईटस अर्थात कुश के प्रजाजन कहते थे-पी एन ओक
180. रोमन सम्राट कॉन्टेस्टायिन ने ईसाई बनने के बाद लगभग ३१२ ईसवी में रामनगर (रोम) स्थित वाटिका (veatican) पर हमला किया और वहां के वैदिक धर्मी पापहर्ता (पीठाधीश) की हत्या कर वहां ईसाई बिशप को बैठाकर उसी को पापहर्ता उर्फ़ पोप घोषित कर दिया. वहां के वैदिक धर्मग्रंथ के भंडार को नष्ट करा दिया-पी एन ओक
181. गाजा पट्टी के एक प्रमुख नगर का नाम रामल्ला है. आयरलैंड के wexford नगर के उत्तर में एक मील की दूरी पर Ramsfort house है. उस ईमारत में एक शिलालेख है जिसमें थॉमस राम के बारे में लिखा है. इंग्लैण्ड में सागर किनारे Ramsgate नगर है जो रामघाट या रामद्वार है. बड़ा बड़ा द्वार आदि को तोड़ने केलिए मोटी लकड़ी या खम्भे Ramrod कहलाता है. यूरोप, जर्मनी, रूस, मंगोलिया आदि में रामायण का मिलना, कुशाईटो (कुश के प्रजाजन) का साम्राज्य, ईजिप्त के प्राचीन नरेशों के रामसेने प्रथम, द्वीतीय नाम आदि सिद्ध करता है कि भगवान श्रीराम वैश्विक भगवान थे-पी एन ओक
182. इराक के अंतिम राजकुल का नाम बर्मक था. अलबरूनी के इतिहास के अनुवादक एडवर्ड डी सचौ ने लिखा है कि इराक में नवबहार नगर नवबिहार का अपभ्रंश है. वह एक बौद्ध पीठ था. इस पीठाधीश के पद को परमक (परमगुरु) कहते थे. अरब-इस्लामी आक्रामकों ने जब इराक पर हमला कर इराक को बल पूर्वक मुसलमान बनाया तब से परमक उर्फ़ बर्मक की धर्मसत्ता समाप्त हो गयी. परमक उर्फ़ बर्मक के इस्लामिक राजा बन जाने के कारन उसके अनुयायी जनता उसी के आज्ञा से मुसलमान बन गयी.
183. ईरान में प्रजा राज्य स्थापित होने से पूर्व जो अंतिम राजकुल था वह पहलवी घराना था. पहलवी वैदिक धर्म को मानने वाले क्षत्रिय लोग थे. महाभारत और पुराणों में उसका उल्लेख है. वशिष्ठ की कामधेनु जब विश्वामित्र छीनकर ले जाने लगे तो उस कामधेनु का रक्षण करने केलिए जो क्षत्रिय कुल दौड़ता आया वह पह्लव ही थे-पी एन ओक
184. ईरान के राजा की जो उपाधियाँ होती थी उनमे उसे आर्यमिहिर कहा जाता था जिसका अर्थ है वैदिक संस्कृति के लोगों में सूर्य जैसा चमकने वाला श्रेष्ठ तारा. ईरान के राजचिन्ह में एक सिंह अपने दाहिने पैर से खड्ग धारण किया हुआ और अगले बाएँ पैर से पृथ्वी गोल को दबाया हुआ बताया गया है. यह कृण्वन्तो विश्वमार्यम का प्रतीक है. इसमें यह दर्शाया गया है कि सारी पृथ्वी पर राज्य सत्ता का तभी ठीक नियन्त्रण रह सकता है जब हाथ में खड्ग हो और हृदय सिंह जैसा पराक्रमी हो-पी एन ओक
185. मुसलमानों द्वारा ईरान के पारसियों को बलपूर्वक मुसलमान बनाये जाने के बाबजूद मुस्लिम पिता से उत्पन्न ईरानी कवि साद ने कभी इस्लाम स्वीकार नहीं किया. वह अपने पूर्वजों की तरह विष्णु भक्त था. व्हम्बेरी ने अपने पुस्तक के पृष्ठ १२८ पर लीखा है कि, “Saadi even assumed the religion of the worshippers of Vishnu in order to extend and increase his knowledge of things.”
186. ग्रीक इतिहासकार ओरियन के अनुसार मारकण्ड यह सागदियाना की राजधानी थी. मारकण्ड शायद वही नगर है जिसे ईरानी लोग आजकल समरकंद कहते हैं- Sir W Drummond का ग्रन्थ पेज ३२२
मारकण्ड वास्तव में मार्कण्डेय है अर्थात समरकंद नगर का पुराना नाम मार्कण्डेय नगर था क्योंकि वहां ऋषि मार्कण्डेय का आश्रम और गुरुकुल था. सागदियाना राजकुल प्राचीन शुद्धोधन शब्द है. समरकंद पर मुस्लिमों के अधिकार करने से पूर्व समरकंद बौद्ध नगर था और यहाँ का राजा भी बौद्ध था. अंतिम बौद्ध राजा का राजमहल अब तैमूर लंग का मकबरा कहा जाता है-पी एन ओक
187. अनेक प्रमाणों से प्रतीत होता है कि प्राचीन भारतीय, ईरानी, तार्तर और चीनी लोगों की न्याय-व्यववस्था, धर्म और विद्या समान थे. तुराण (यानि तार्तर और चीन) के लोग ईरानियों जैसे ही सूर्यपूजक थे. अश्वमेध यज्ञ करते और सूर्य को रथ अर्पण करते. चीनी लोग भी सूर्यभक्त थे और वे ग्रहपूजन भी करते थे. (Sir W Drummond का ग्रन्थ खंड-२, पेज १३०)
188. प्राचीनकाल में अरब लोग शैवपंथी थे. मोहम्मद…रब…मोज़ेस…मैमोनी आदि से पूर्व अनेक युग तक अरबों में शिवभक्ति ही प्रचलित थी. सारे मानव उसी धर्म के अनुयायी थे…विश्व के लगभग सारे ही प्रगत लोगों का वही धर्म था….विविध प्रकार के पत्थर-कोई गोल, कोई स्तम्भ के आकर का, कोई पिरामिड के आकार का, प्राचीन समय से पूजे जाते थे. ((Sir W Drummond का ग्रन्थ खंड-२, पेज ४०७-४३५)
189. सर विलियम जोन्स कहते हैं की स्पष्ट प्रमाणों से और तर्क द्वारा यह बात सिद्ध हो चुकी है कि असीरिय और पिशदादी शासनों से पूर्व ईरान में एक बड़ा प्रबल राज्य प्रस्थापित था और वह वास्तव में हिन्दू राज्य था. वह सैकड़ों वर्ष रहा. अयोध्या और इन्द्रप्रस्थ के हिन्दू राजकुलों से उसका इतिहास जुड़ा हुआ है. (Collectania De Rebus Hibernicus, Writer, Lt. General Charles Vallancey, Pg. 465)
190. बेबीलोनियन और असीरियन साम्राज्यों में सर्वत्र हिन्दू धर्म ही था. प्राचीन धर्मग्रंथों में पाए जाने वाले विपुल प्रमाणों से यह प्रतीत होता है कि उनके देव सूर्य होते थे. वे उसे बालनाथ कहते थे. उसका स्तम्भरूपी प्रतीक प्रत्येक पहाड़ी पर प्रत्येक कुञ्ज में प्रतिष्ठित था. उसका एक दूसरा रूप था बछड़े का, जिसका पर्व हर पूर्णिमा को हटा था. (इंडिया इन ग्रीस, लेखक एडवर्ड पॉकोक, पृष्ठ-१७८)
191. सीरिया राज्य का नाम सूर्य से पड़ा है. सारा प्रदेश भी सूर्य से ही सीरिया कहलाया. प्राचीन समय में यहाँ सूर्यपूजक लोग ही रहते थे. यह सूर्य योद्धा लोग बड़ी संख्यां में पेलेस्टाइन में बसे. (इंडिया इन ग्रीस, लेखक एडवर्ड पॉकोक, पृष्ठ-१८२)
192. निमरोद नाम का ईजिप्त का एक प्राचीन सम्राट था. विल्फोर्ड साहब का कहना है कि प्राचीन संस्कृत साहित्य में उसका मूल नाम निर्मर्याद (हिरण्यकाश्यप?) अंकित है. वह बड़ा क्रूर, दुराचारी, अत्याचारी था. उसने बेशुमार पशुहत्या और नरहत्या की. मुख से ज्वाला निकालने वाले कराल नरसिंह अवतार की जो कथा है उससे बेबिलोनिया नगर पर आ पड़ी आपत्ति का स्मरण होता है. परमात्मा ने कहा, “चलो हम पृथ्वी पर अवतार लेते हैं”. एसा कहकर भगवान नरसिंह अवतार में बेबिलोनिया में उतरे. बायबल के जेनेसिस यानि जन्म या आरम्भ XI-7 नाम के भाग में उल्लेख है. (थोमस मोरिस का ग्रन्थ, पेज-२६)
193. इसमें कोई संदेह नहीं की मानवजाति तितर-बितर हुई तब जो लोग ईजिप्त में गए वे उस नरसिंह अवतार की स्मृतियाँ साथ ले गए. उनका वही नाम था जो भारतीय परम्परा में है. मैं यह पूर्ण आत्मविश्वास से कह रहा हूँ की ईजिप्त के शिलालेखों में तथा इतिहास में नरसिंह के पूर्व के तिन वैदिक ईश्वरावतार मत्स्य, वराह, वामन आदि पाए गए हैं. (थोमस मोरिस का ग्रन्थ, पेज-२६-३०)
194. पूर्वकाल में यूरोपीय लोग तथा ग्रीक इतिहासकार आदि ईजिप्त का नाम AEgypt लिखा करते थे. वह संस्कृत अजपति है. रामचन्द्र रघुकुल के होने के कारन रघुपति भी कहे जाते थे उसी प्रकार उनके दादा का नाम अज होने से वे अजपति भी कहे जाते थे. अतः ईजिप्त देश अजपति राम का नाम धारण करता है. राम ही उस देश के राष्ट्रदेवता हैं इसी कारन पिरामिडों के आगे रामसिंह (स्विन्फिक्स) की विशालकाय प्रतिमा उस प्रदेश के रक्षक-देवता के रूप में प्रतिष्ठित है. प्राचीन ईजिप्त के लोग भी खुद को कुशाईट अर्थात कुश के प्रजाजन कहते थे-पी एन ओक
195. ईजिप्त के राजाओं के नाम भी सयामी राजकुल के सामान राम पर ही आधारित थे जैसे रामेशस प्रथम, रामेशस द्वितीय आदि. रामेशस यानि राम+इशस यानि राम ही परमात्मा स्वरूप हैं. प्राचीन ईजिप्त में एक रूपवती नगरी थी. ग्रीक इतिहासकारों ने उसे रापता लिखना प्रारम्भ किया-पी एन ओक
196. Apocryphal Gospel नामक ईसाई धर्मग्रन्थ में भगवान कृष्ण के कालिया नाग से युद्ध का उल्लेख पृष्ठ १३३ इस प्रकार है, “एक नाग द्वारा एक खिलाड़ी को दंश करने के कारन एक अवतारी बालक उस नाग से झपट पड़ा. उस खिलाड़ी के व्रण से विष वापस चूस लेने को बाल भगवान ने नाग को बाध्य किया. तत्पश्चात बाल भगवान द्वारा उस नाग को शाप देने पर तड़फड़ाकर वह नाग मर गया.” इस प्रकार भारतीय दंत कथा तथा कुरान जिसे हम अरबी दंतकथा कह सकते हैं और ईसाई Apocryphal Gospel का निकट सम्बन्ध है. (थोमस मोरिस का ग्रन्थ, पेज-३२२)
197. भारतीय पुराणों के कई नाम ईजिप्त की दंतकथाओं में पहचाने जा सकते हैं. ईजिप्त के हय-गोप (Haye-Goptians) लोगों के परमेश्वर Ammon हिन्दुओं के ॐ ही हैं. शिव देवता ईजिप्त के जिस मन्दिर में हैं उसके दर्शनार्थ सिकन्दर ने जिस नगर की यात्रा की थी उस नगर से अभी भी उसका नाम जुड़ा हुआ है. वह नगर Alexandria है. (पृष्ठ ४३-४६, The Theogony of the Hindus)
198. “Neibuhr, Valentia, Champollion, Waddington आदि विद्वानों के अनुसार ईजिप्त के उत्तर प्रांतीय देवस्थान दक्षिण प्रांतीय देव्स्थाओं से अधिक प्राचीन हैं. उन देवस्थानों से पता चलता है भारत ही ईजिप्त की सभ्यता का स्रोत है. Abydos और Sais के मन्दिरों में पाए गए इतिहासों का उल्लेख Josephus, Julius, Africanus और Eusebius ने किया है. वे सभी कहते हैं की ईजिप्त की धर्मप्रथा भारत वाली ही है. Manetho कहते हैं की ईजिप्त के राजकुलों के इतिहास से हिन्दू राज परम्परा अधिक प्राचीन है. अतः धर्म तथा संस्कृति में ईजिप्त से भी बढ़कर विश्व की प्राचीनतम परम्परा भारतीय ही है.” (Pg. 40-46, The Theogony of Hindus, Count Biornstierna)
199. “भारत और ईजिप्त की धर्मप्रथाओं की तुलना करने पर उनमें बड़ी समानता प्रतीत होती है. दोनों में परमात्मा एक ही कहा गया है. फिर भी अनेक देवताओं की पूजा दोनों में होती है. त्रिमूर्ति की कल्पना, आत्मा का अस्तित्व, पुनर्जन्म, समाज के चार वर्ग-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यह दोनों पद्धतियों के मुख्य लक्षण हैं. गंगा और नील नदी के किनारे दोनों के प्रतीक भी वही हैं. गंगा-तट पर के मन्दिरों में जैसा शिवलिंग है वैसा ईजिप्त के Ammon मन्दिर में भी है. (The Theogony of Hindus, Count Biornstierna)
200. Eusebius नाम के ग्रीक इतिहासकार ने India as seen and known by Foreigners पुस्तक में लिखा है कि सिन्धु नदी के किनारे रहनेवाले लोग ईजिप्त के समीप इथिओपिया प्रदेश में आकर बसे. मैक्समूलर ने कहा है कि ईजिप्त तथा ग्रीक और असीरीय लोगों की दंतकथाएँ हिन्दू पुराणों पर आधारित थी. अन्तर्राष्ट्रीय संस्था Theosophical Society के भूतपूर्व अध्यक्ष कर्नल ओल कोट ने लिखा है कि आजकल जिसे ईजिप्त कहते हैं वहां भारत के प्रगत लोग बसे और उन्होंने निजी कलाओं का प्रसार किया.
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