Saturday, October 15, 2011

Kaun the kisne mara Prashant Bhushan ko


प्रशांत भूषण पर हमला करने वाले संधी कार्यकर्ता थे या अन्य किसी भी संगठन से जुडे़ लोग। तथा यह कार्यवाही सही थी या गलत इसका फैसला तो अदालत मे तय होगा अब इस बहस में उलझना बेकार है लेकिन मेरा एक सवाल है कि जब आप अपनी मॉ के साथ कहीं बाजार जा रहे हों और आपको रास्ते में रोककर कोई आपकी मॉ को यह कहते हुऐ गाली बकेगा कि यह उसके निजी विचार है तो आपका त्वरित रिऐक्शन क्या होगा ? क्या आप उसको शालीनता के साथ गाली नहीं बकने के लिये निवेदन करेंगे ? या आप एकदम आक्रमक कार्यवाही करेंगे ? यही इस प्रकरण में भी हुआ है जब एक व्यक्ति भारत माता के तुकडे़ करने की बात कह रहा हो तो यह भी मॉ को गाली बकने के बाराबर ही हुआ ना तब आपके विचार में इसका उत्तर किस प्रकार दिया जाना चाहिये था

मैं वह हूं जो आप हैं।




आदि शंकराचार्य शिष्यों के साथ नर्मदा नदी तट पर स्नान के लिए जा रहे थे। शिष्य उनके लिए मार्ग साफ करते चल रहे थे। इस दौरान एक पथिक वहां से गुजरा। शिष्यों ने उससे कहा-मार्ग छोड दें। स्वामी जी यहां से गुजरेंगे। शिष्यों के बार-बार आग्रह करने के बावजूद पथिक रास्ते से नहीं हटा। इतने में आदि शंकराचार्य भी वहां आ गए। उन्होंने उस पथिक से पूछा कि आप कौन हैं? पथिक ने अत्यंत धैर्य से उत्तर दिया-मैं वह पथिक के इस कथन को सुनकर शंकराचार्य कुछ क्षण के लिए शांत खडे रहे और फिर झुक कर पथिक के चरणों को स्पर्श कर लिया। उन्होंने कहा-आज आपने मुझे जीवन का वास्तविक ज्ञान दे दिया। मैं आपको अपना गुरु स्वीकार करता हूं।
वह पथिक निम्न कुल का था। शंकराचार्य आजीवन उसे अपना गुरु मानते रहे। पथिक के कथन की उन्होंने दार्शनिक व्याख्या की, जिससे अद्वैत दर्शन का निर्माण हुआ। मानवतावादी चिंतन के लिए अद्वैत दर्शन एक आध्यात्मिक प्रेरणा है। सब एक हैं। कोई दूसरा नहीं है। इसका कारण है सर्वव्यापी ईश्वर और आत्म तत्व का ब्रह्म तत्व का अंश होना।
जब सृष्टि का नियामक एकमेव ब्रह्म है, तो फिर कोई किसी अन्य से पृथक क्यों? सब में वही आत्म तत्व है, जो सभी में है। उपनिषद में ऋषि कहते हैं कि अपने को जान, उसे जान, मुझे जान, और ईश्वर को जान। स्वयं से साक्षात्कार करने की स्थिति व्यक्ति को अमरत्व के दर्शन कराती है। जो आपमें है, उसमें है और हम में भी। छान्दोग्यउपनिषद में ऋषि कहते हैं कि सब कुछ ब्रह्म ही है। मनुष्य उसी से उत्पन्न हुआ है।
तैत्तिरीय उपनिषद में ऋषि ब्रह्म को आनंद का प्रतीक मानते हुए कहते हैं कि जिसने सृष्टि बनाई है, वह सबमेंहै और सब उसमें है। यह विचार भी अद्वैत दर्शन को पुष्ट करते हैं। साथ ही, ब्रह्म में आनंद की उपस्थिति उसके कल्याण रूप का प्रतीक है। ऋषि कहते हैं कि आनंद से ब्रह्म है, आनंद में ही ब्रह्म है, आनंद से ही ब्रह्म जीव पैदा होते हैं, आनंद से ही वे जीवित रहते हैं, आनंद में ही फिर समा जाते हैं।
भारतीय दर्शन में विभेद को मान्यता नहीं दी गई है। समरूपता,समरसता और एकाग्रता आत्मा के लक्षण हैं। उसे स्वीकार करते हुए कहा गया है कि एक ही ईश्वर सब प्राणियों के भीतर विराजमान है। वह सबको गति और ऊर्जा प्रदान करता है। सबके भीतर वही समाया है। वह सभी कर्मो का स्वामी है। वह साक्षी भी है, ज्ञाता भी है और न्यायाधीश भी। ईश्वर निर्गुण और अनंत है।
साधक की इच्छा होती है कि वह जीवन-जगत के रहस्यों को समझें। इसके लिए वह परमपिता परमेश्वर की निकटता चाहता है, क्योंकि उसकी निकटता का अनुभव मात्र ही अनेक रहस्यों को अनावृत्त कर देता है।
ईश्वर को जानने से सारे संशय दूर हो जाते हैं और जीव के मोह भाव नष्ट हो जाते हैं। कोई गैर नहीं होता, किसी से बैर नहीं होता। सब अपने होते हैं और व्यक्ति अद्वैत की स्थिति प्राप्त कर लेता है।

AUM

ऊँ.............................................
अक्षर का अर्थ है जिसका क्षरण न हो। ऐसे तीन अक्षरों -अ उऔर मसे मिलकर बना है ऊँ।माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांडसे सदा ऊँकी ध्वनि निसृतहोती रहती है। हमारी हर सांस से भी ऊँकी ध्वनि ही निकलती है। यही हमारी श्वास की गति को नियंत्रित करता है। माना गया है कि अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली है ऊँ।किसी भी मंत्र से पहले यदि ऊँजोड दिया जाए, तो वह पूर्णतया शुद्ध और शक्ति-सम्पन्न हो जाता है। किसी देवी-देवता, ग्रह या ईश्वर के मंत्रों के पहले ऊँलगाना आवश्यक होता है, जैसे-श्रीराम का मंत्र- ऊँरामायनम:। विष्णु का मंत्र-ऊँ विष्णवेनम:। शिव का मंत्र- ऊँनम: शिवाय,तो प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि ऊँसे रहित कोई मंत्र फलदायीनहीं होता, चाहे उसका जितना भी जाप हो। मंत्र के रूप में मात्र ऊँभी पर्याप्त है। माना जाता है कि एक बार ऊँका जाप हजार बार किसी मंत्र के जाप से अधिक महत्वपूर्ण है।
ऊँका ही दूसरा नाम प्रणव (परमेश्वर) है। योगदर्शन के अनुसार तस्य वाचक: प्रणव: अर्थात उस ईश्वर का वाचक प्रणव है। इस तरह प्रणव अथवा ऊँएवं ब्रह्ममें कोई भेद नहीं है। ऊँअक्षर है, इसका क्षरण अथवा विनाश नहीं होता। छांदोग्योपनिषदमें कहा गया है--ऊँ इत्येतत्अक्षर:, अर्थात् ऊँअविनाशी, अव्यय एवं क्षरण रहित है।
ऊँ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषाथरें का प्रदायक है। मात्र ऊँका जाप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली। माना जाता है कि कौशीतकीऋषि निस्संतान थे। संतान-प्राप्ति के लिए उन्होंने सूर्य का ध्यान कर ऊँका जाप किया, तो उन्हें पुत्र-प्राप्ति हो गई। गोपथ ब्राह्मणमें उल्लेख है कि जो कुश के आसन पर पूर्व की ओर मुख कर एक हजार बार ऊँरूपी मंत्र का जाप करता है, उसके समस्त अर्थ और काम सिद्ध हो जाते हैं-सिद्धयंति अस्यअर्था:सर्वकर्माणिच।श्रीमद्भागवत में ऊँके महत्व को कई बार रेखांकित किया गया है। गीता के आठवें अध्याय में यह उल्लेख मिलता है कि जो ऊँअक्षर रूप ब्रह्मका उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परम गति प्राप्त करता है-
ऊँअर्थात ओम तीन अक्षरों से बना है। ये तीन अक्षर हैं अ,उएवं म।अका अर्थ है आविर्भाव या उत्पन्न होना, उका तात्पर्य है उठना, उडना अर्थात विकास, मका मतलब है मौन हो जाना अर्थात ब्रह्मलीन हो जाना। ऊंसंपूर्ण ब्रह्मांडकी उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है। ऊंमें प्रयुक्त अतो सृष्टि के जन्म की ओर इंगित करता है, वहीं उउडने का अर्थ देता है, जिसका मतलब है ऊर्जा-सम्पन्न होना। किसी ऊर्जावान मंदिर या तीर्थस्थलजाने पर वहां की अगाध ऊर्जा ग्रहण करने के बाद व्यक्ति स्वप्न में स्वयं को आकाश में उडता हुआ देखता है। मौन हो जाने का अपना महत्व है। मौन का महत्व ज्ञानियोंने बताया ही है। अंग्रेजी में उक्ति है-साइलेंस इजसिल्वर ऐंडएब्सल्यूटसाइलेंसइजगोल्ड। गीता में श्रीकृष्ण ने मौन के महत्व को प्रतिपादित करते हुए स्वयं को मौन का ही पर्याय बताया है-मौनं चैवास्मिगुह्यानां।वहीं दार्शनिकोंका मानना है कि अधिक बोलने से शारीरिक और मानसिक दोनों शक्तियों का क्षय होता है।
ध्यान बिंदुपनिषद्के अनुसार, ऊँमंत्र की विशेषता यह है कि पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में जो इसका जाप करता है, उसे लक्ष्य की प्राप्ति जरूर होती है। जिस तरह कमल-पत्र पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी तरह जप-कर्ता पर कोई कलुष नहीं लगता।
सनातन धर्म ही नहीं, भारत के अन्य धर्म-दर्शनों में भी ऊँको महत्व प्राप्त है। बौद्ध दर्शन में ऊँ मणिपेऽहुमका प्रयोग जाप एवं उपासना के लिए प्रचुरतासे होता है। इस मंत्र के अनुसार, ऊँको मणिपुर चक्र में अवस्थितमाना जाता है। यह चक्र दस दल वाले कमल के समान है। जैन दर्शन में भी ऊँके महत्व को दर्शाया गया है। कबीर निर्गुण संत एवं कवि थे। उन्होंने भी ऊँके महत्व को स्वीकारा और इस पर साखियांभी लिखीं। उनकी एक साखी यहां दी जा रही है- ओ ओंकार आदि में जाना। लिखिऔमेंटेताहि न माना। ओ ओंकार लिखैजो कोई। सोई लखिमेटणान होई।।
गुरुनानक ने ऊँके महत्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा- ओम सतनाम कर्ता पुरुष निर्भोनिर्बेरअकालमूर्त।-ऊँ सत्य नाम जपने वाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं अकाल-पुरुष के सदृश हो जाता है। इस तरह ऊँके महत्व को सभी संप्रदाय के धर्म-गुरुओं, उपासकों, चिंतकों ने प्रतिपादित किया है, क्योंकि यह एकाक्षरीमंत्र साधना में सरल है और फल प्रदान करने में सर्वश्रेष्ठ। यह ब्रह्मांडका नाद है एवं मनुष्य के अंतर में स्थित ईश्वर का प्रतीक।