Tuesday, May 17, 2016

The best village in world


Worlds best village in india – आपको जानकर हैरानी होगी दुनिया का सबसे बेहतरीन गाँव अमेरिका इंगलैंड में नहीं आपके भारत में है, देखें तस्वीरें और जाने इस गाँव के बारे में

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प्राकृतिक रूप से बने ये पुल मेघालय की पहचान माने जाते हैं, ये पुल देखने में ना ही मात्र बेहद सुंदर बल्कि बेहद मजबूत भी होते है

कहा जाता है असली भारतवर्ष गाँवों में बसता है और वास्तव में भी हमारे गाँव ऐसे लाजवाब स्थल होते हैं जो ना ही मात्र शहरों की व्यस्ततम भीड़ से परे होने का खुशनुमा एहसास कराते हैं बल्कि असली भारतवर्ष का दर्शन कराते हैं।

गाँवों का देश माने जाने वाले भारत में एक से बढकर एक ‘लाजवाब’ गाँव हैं। ऐसे ही एक बेहतरीन गाँव के बारे में बता रहे हैं हम आपको जो अपनी खूबसूरती के कारण अक्सर चर्चा का विषय रहता है।

जिसकी गिनती ना ही मात्र भारतवर्ष के बेहतरीन गाँवों में होती है बल्कि उसे एशिया व दुनिया के सबसे बेहतरीन तथा साफ़ सुथरे गांवों में गिना जाता है।

ये गाँव स्थित है भारत के उत्तर पूर्व राज्य मेघालय में, वही मेघालय जिसे ‘बादलों का घर’ कहा जाता है। क्योंकि वहां हमेशा बारह महीने बारिश होती रहती है।

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ज्ञात हो भारतवर्ष में सबसे ज्यादा बारिश वाला राज्य भी मेघालय ही है।

मेघालय स्थित इस महान गाँव को “मावलिननांग” नाम से जाना जाता है, इस गाँव को ‘भगवान का अपना बगीचा’ (God’s Own Garden) भी कहा जाता है।

यह गाँव मेघालय की राजधानी शिलांग से थोड़ी दूरी पर स्थित खासी हिल्स क्षेत्र में आता है, जो ना ही मात्र अपनी खूबसूरती के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है बल्कि यहाँ पूरी दुनिया से पर्यटक इसके दर्शन करने आते हैं।

जानकर हैरानी होगी सफाई व्यवस्था के लिए इस गाँव के लोग किसी भी तरह प्रशासन पर आश्रित नहीं है। बल्कि इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है की यहाँ की सारी सफाई ग्रामवासी स्वयं ही करते है।

इस गाँव में सफाई को लेकर लोग बेहद जागरूक हैं। इसलिए सफाई के बेहद कड़े नियम बनाये गये हैं। जिनका हर ग्रामवासी को पालन करना होता है।

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ना ही मात्र सफाई में बल्कि यह गांव शिक्षा के क्षेत्र में भी अव्वल है। यहां की साक्षरता दर पूर्णतया 100 फीसदी है, अर्थात यहां के सभी लोग पढ़े-लिखे हैं।

वैसे तो इस गांव में ज्यादातर लोग हिंदी अंग्रेजी व स्थानीय सहित कई भाषाएँ जानते हैं पर आमतौर पर यहाँ के निवासी अंग्रेजी में ही बात करना पसंद करते हैं।

पर्यटन की दृष्टि से तो गाँव वालों की अच्छी आय होती ही है । इसके साथ ही इस गाँव के लोग जीवन यापन के लिए ज्यादातर सुपारी की खेती पर निर्भर हैं और यही इस गाँव के लोगों की आजीविका का मुख्य साधन है।

इस गाँव के साफ सफाई का एक राज यह भी है कि इस गाँव के लोग घर से निकलने वाले कूड़े-कचरे को बांस से बने डस्टबिन में जमा करते हैं और उसे एक जगह इकट्ठा कर खेती के लिए खाद की तरह इस्तेमाल करते हैं।


वैसे तो हमारा पूरा पूर्वोत्तर भारत और मेघालय खूबसूरती से लाबालब हैं लेकिन खासकर मेघालय का खासी क्षेत्र अपने साफ़ जल के झरनों व् छोटे छोटे प्रपातों तथा नदियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

साफ़ पानी के ऐसे झरने और प्रपातों के खूबसूरत नजारे लगभग पूरे मेघालय में देखने को मिलेंगे। इसके साथ ही जो इस स्थान का सबसे मशहूर हिस्सा यहाँ स्थित हरे भरे पहाड़ भी हैं।

गुरुकुल शिक्षा


गुरुकुल के इन पुराने मॉडल पर पढ़ाई करने वाले बच्चों के सामने आधुनिक शिक्षा ने टेके घुटने

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अमेरिका के हॉवर्ड विश्वविधालय से लेकर भारत के आई आई टी में क्या कोई ऐसी शिक्षा दी जाती है कि छात्र की आंख पर पट्टी बांध दी जाये और उसे प्रकाश की किरने भी दिखाई ना दे, फिर भी वो सामने रखी हर वस्तु को पढ़ सकता हो? है ना चौकाने वाली बात? पर इसी भारत में किसी हिमालय की कंदरा में नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के गृहराज्य गुजरात के महानगर में यह चमत्कार आज साक्षात् हो रहा है I

3 हफ्ते पहले मुझे को देखने के सुअवसर मिला मेरे साथ अनेक वरिष्ठ लोग भी थे हम सबको अहमदाबाद के हेमचन्द्र आचार्य संस्कृत गुरुकुल में विद्यार्थियों की अदभुत मेधाशक्तियों का प्रदर्शन देखने के लिये बुलाया गया था हम सबको निमंत्रण देने वालो के ऐसे दावे पर यकीन नहीं हो रहा था पर वो आश्वस्त थे कि अगर हम अहमदाबाद चले जाये, तो हमारे सब संदेह दूर जायेगे और वही हुआ, छोटे छोटे बच्चे इस गुरुकुल में आधुनिकता से कोसों दुर पारंपरिक गुरुकुल शिक्षा पा रहे है। पर उनकी मेधा शक्ति किसी ही महंगे पब्लिक स्कूल के बच्चो की मेधा शक्ति को बहुत पीछे छोड़ चुकी है ।

आपको याद होगा पिछले दिनों सभी टी वी चैनलों ने एक छोटा प्यारा – सा बच्चा दिखाया था, जिसे ‘गूगल चाइल्ड’ कहा गया। यह बच्चा सेकेंड में उत्तर देता था जबकि उसकी आयु 10 वर्ष से भी कम थी । दुनिया हैरान थी ऐसे ज्ञान को देखकर । पर किसी टी वी चैनल ने ये नहीं बताया कि ऐसी योग्यता उसमे इसी गुरुकुल से आई है ।

दूसरा उदहारण उस बच्चे का है जिसे दुनिए के इतिहास की कोई भी तारीख पूछो, तो वह सवाल ख़त्म होने से पहले उस तारीख को क्या दिन था, ये बता देता है। इतनी जल्दी तो कोई आधुनिक कंप्यूटर भी जवाब नहीं दे पाता । तीसरा बच्चा गणित के 50 मुश्किल सवाल मात्र अढाई मिनट में हल कर देता है। यह विश्व रिकॉर्ड है । यह सब बच्चे संस्कृत में वार्ता करते है, शास्त्रों का अध्यन करते है, देशी गाय का दूध-घी खाते है । बाजारू सामान से बचकर रहते है । यथासंभव प्राकृतिक जीवन जीते है और घुड़सवारी, ज्योतिष, शास्त्रीय संगीत, चित्रकला आदि विषयों का इन्हें अध्यन कराया जाता है । इस गुरुकुल में मात्र 100 बच्चे है पर उनको पढ़ाने के लिये 300 शिक्षक है । ये सब वैदिक पद्धति से पढ़ाते है । बच्चो की अभिरूचि अनुसार उनका पाठयक्रम तैयार किया जाता है । परीक्षा की कई निर्धारित पद्दति नहीं है ।

पढ़कर निकलने के बाद डिग्री भी नहीं मिलती यहाँ पढने वाले ज्यादातर बच्चे 15-16 साल से काम आयु के है और लगभग सभी बच्चे अत्यंत संपन्न परिवारों से है इसलिये इन्हें नौकरी की भी चिंता नहीं है । वैसे भी डिग्री वालो को भी नौकरी कहाँ मिल रही है? इस गुरुकुल के संस्थापक उत्तम भाई ने फैसला किया कि उन्हें योग्य संस्कारवान मेधावी व देशभक्त युवा तैयार करने हैं जो जिस भी क्षेत्र में जाएं अपनी योगिता का लोहा मनवा दे और आज यह हो रहा है दर्शक इन बच्चों की बहुआयामी प्रतिभाओं को देखकर दांतो तले उंगली दबा लेते हैं, खुद डिग्री वहीन उत्तम भाई का कहना है कि उन्होंने सारा ज्ञान स्वाध्याय और अनुभव से अर्जित किया है उन्हें लगता है कि भारत की मौजूदा शिक्षा प्रणाली जो कि मेकाले की देन है, भारत को गुलाम बनाने के लिए लागू की गई थी इसलिए भारत गुलाम बना और आज तक बना हुआ है ये गुलामी की जंजीरें तब टूटेगी जब भारत का हर युवा प्राचीन गुरूकुल परंपरा से पढ़कर अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं पर गर्व करेगा तब भारत फिर से विश्व गुरु बनेगा आज की तरह कंगाल नहीं |


उत्तम भाई चुनौती देते हैं कि भारत के सबसे साधारण बच्चों को छांट लिया जाए और 10-10 की टोली बनाकर दुनिया के 10 सर्वश्रेष्ठ विद्यालय में भेज दिया जाए 10 छात्र उन्हें भी दे दिए जाएं| साल के आखिर में मुकाबला हो| अगर उत्तम भाई के गुरुकुल के बच्चे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विद्यालयों के विद्यार्थियों के मुकाबले कहीं गुना ज्यादा मेधावी ना हो तो उनकी गर्दन काट दी जाए| भारत सरकार को चाहिए कि वह गुलाम बनाने वाले देश के इस शब्द स्कूलों को बंद कर दे और वैदिक पद्धति से चलने वाले गुरुकुलो की स्थापना करें

जय गौ माता


दूध नहीं दे सकती, फिर भी 3.5 करोड़ रु. मुनाफा दे चुकी है ये 1100 गायें

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भारत : बिहार चुनाव ही ले लीजिए! गाय छाई रहीं। नेताओं ने भाषणों में धर्म ग्रंथों से उठाए गोधन, कामधेनु, गोवर्धन, गोरक्षा, जननी जैसे शब्द बोल-बोलकर गायों को बूचड़खानों में जाने से रोकने के संकल्प लिए। कैसे रोकेंगे? ये कोई नहीं बता पाया।

अलग-अलग संस्थाओं के मुताबिक, पंजाब-हरियाणा में एक लाख से ज्यादा लावारिस पशु हैं। इन्हें पालेगा कौन? दूध न देने वाली देसी गायों
को कोई पाल भी ले तो क्या सिर्फ धर्म के नाम पर? ऐसा मुमकिन नहीं दिखता। लेकिन लाडवा (हरियाणा में एक जगह) के इन लोगों ने इसे विशुद्ध व्यापार के नजरिए से देखा और एक ऐसी मिसाल पेश की, जो सही मायनों में लावारिस देसी गायों को बचाने की सार्थक पहल हो सकती है।

पंजाब-हरियाणा में इम्पोर्टेड नस्लों की गायों पर खड़े करीब 10 हजार करोड़ के जमे-जमाए डेयरी बिजनेस के बीच लाडवा के लोगों का ये डेयरिंग फैसला चौंकाने वाला लग सकता है। इन्होंने पैसा कमाने के लिए उन गायों को चुना, जिन्हें दूध न दे पाने के कारण लावारिस छोड़ दिया गया था। कई तरह की बीमारियों के कारण सड़कों पर पड़ी रहती थीं।

एक-एक कर गोशाला में लाकर सबका इलाज किया। ये दूध नहीं देतीं, बावजूद इसके गोशाला का साल का मुनाफा 3.50 करोड़ रु. पार कर गया है। पूरा व्यापार गोबर और गोमूत्र का है।

गोशाला के प्रधान आनंद राज सिंह बताते हैं, ‘गाय को जब तक आस्था या राजनीति से जोड़कर रखेंगे, तब तक इनकी यही हालत होगी। हमें समझना होगा कि गौपालन शुद्ध बिजनेस है। हम गाय के गोबर से बायोगैस बनाते हैं। फिर बायोगैस से निकले वेस्ट से जैविक खाद।

गाय के मूत्र से कीटनाशक बनाते हैं। अर्क भी बनता है, जो विभिन्न दवाओं में प्रयोग होता है। इसकी सही मार्केटिंग से हम मुनाफा कमा लेते हैं।

फायदा सिर्फ गोशाला नहीं, किसान-कंज्यूमर का भी.
मालवा बेल्ट में करीब 50 किसानों की खुदकुशी का मामला अभी सुर्खियों से हटा ही है। कारण था फसलों पर कीटनाशकों का छिड़काव। जमीन विषैली हुई सो अलग। अनाज से यही कीटनाशक हमारे शरीर में जा रहा है, इसीलिए ऑर्गेनिक उत्पादों की डिमांड इतनी है कि मुंह मांगे दाम मिल रहे हैं। जैविक खाद होगी तो ये समस्या हल हो जाएगी।

लाडवा गोशाला में एक गाय औसतन 10 किलो गोबर व 10 लीटर मूत्र देती है। 10 किलो गोबर से 7 किलो खाद बनती है, जो 35 रुपए में बिकती है। 10 लीटर मुत्र से 10 लीटर अलग-अलग उत्पाद बनते हैं, जो सौ रुपए प्रति लीटर के हिसाब से बेचे जाते हैं। इस तरह से गोशाला से हर रोज 11 लाख से ज्यादा की आमदनी है। लावारिस गाय खरीदनी नहीं पड़ती। चारे पर 50 रुपए/प्रति गाय खर्च आता है।

Mobile No : 093153-20285, 099921-86600
098966-00713

Shree Ladwa Gaushala, Ladwa

Village & Post office : Ladwa
Distt. : Hisar
Haryana (india)
Pin Code : 125006

अच्छा काम


एक अकेली बुजुर्ग महिला ने राजमार्ग पर लगा दिए 384 बरगद के पेड़

May 9, 2016
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सालूमरदा थिमक्का … जी हाँ, यही नाम है उनका. कर्नाटक की हैं और राज्य के रामनगर जिले में हुलुकल और कुडूर के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों तरफ करीब चार किलोमीटर की दूरी में अब तक 384 बरगद के पेड़ लगा चुकी हैं.

जीवन के खालीपन को दूर करने के लिए पेड़ लगाना शुरू किया और फिर यह उनका जूनून बन गया. एक एक करके 384 बरगद के वृक्ष लगा दिए.

तो ऐसा नहीं है कि उनके इस काम को किसी ने नोटिस न किया हो ! अनेकों अवार्ड पुरुस्कार मिल चुके हैं उन्हें. 1995 में नेशनल सिटीजन्स अवार्ड तो 1997 में इंदिरा गाँधी प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र अवार्ड और वीरचक्र प्रशस्ति अवार्ड.

साल 2000 में कर्नाटक कल्पवल्ली अवार्ड मिला तो 2006 में गोडफ्रे फिलिप्स ब्रेवरी अवार्ड से सम्मानित किया गया.

सम्मानों की फेहरिस्त और भी लम्बी है. श्री श्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ़ लिविंग द्वारा भी उन्हें विशालाक्षी अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है.

और बात सिर्फ सम्मानों की नहीं है. प्रकृति की सेवा करने में, उसके सानिध्य में जो आनंद है वह और कहीं नहीं है. लगता है थिमक्का इस बात को अच्छी तरह से समझ गईं हैं तभी तो पेड़ पर पेड़ लगाए जा रहीं हैं.

उनके इस अद्भुत, अनुपम प्रयास को गुस्ताखी माफ़ का नमन !