Tuesday, October 7, 2014

मीडिया

   मीडिया, जनाकांक्षा और जनतंत्र 



एक व्यक्ति से दूसरे तक या एक स्थान से दूसरे स्थान पर किसी वस्तु को पहुंचाने के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता होती है। समाचारों और विचारों को फैलाने के लिए प्रयोग हो रहे माध्यम के लिए ही इन दिनों मीडिया शब्द रूढ़ हो गया है।


मीडिया को विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के साथ ही लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है। लोग विधायिका और कार्यपालिका की खुली आलोचना करते हैं। न्यायपालिका की आलोचना करते समय शब्द प्रयोग में थोड़ी सावधानी रखनी पड़ती है, चूंकि उससे मानहानि के मुकदमे का भय रहता है। इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र के जिन नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों या उद्योगपतियों पर मुकदमे चल रहे हैं, वे सदा यही कहते हैं कि उन्हें भारत के न्यायालय पर विश्वास है। यद्यपि न्यायालय द्वारा विपरीत निर्णय आने पर उनके मन के विपरीत भाव मुखर होते देर नहीं लगती। 


पर मीडिया की आलोचना से प्रायः सब बचते हैं, मानो वह कोई मजहबी किताब है, जिसकी आलोचना से तूफान आ जाएगा। अतः मीडिया का स्तर लगातार गिर रहा है; लोगों का उससे विश्वास घट रहा है और लोकतंत्र तथा जनाकांक्षा की कसौटी पर उसकी भूमिका संदेह के घेरे में है।


भारत में समाचार प्रकाशन का इतिहास छापेखाने के आविष्कार से ही प्रारम्भ होता है। अंग्रेजी काल होने के कारण पत्र-पत्रिकाओं का उद्देश्य उस समय स्वाधीनता की अलख जगाना था। इसीलिए जान और जेल का खतरा उठाकर सैकड़ों पत्रकारों ने उस समय काम किया। कुछ पत्र खुलेआम छपते थे, तो कुछ गुप्त रूप से। कई पत्र विदेशों में छपकर भारत के साथ ही अनेक देशों में वितरित होते थे। उनका रूप कई बार एक-दो पृष्ठों के पत्रक जैसा ही होता था। ये पत्र जिसके पास मिलते थे, उस पर मुकदमा और फिर उसे कई वर्ष की जेल होती ही थी। इस पर भी ये छपते और बंटते थे। लोकप्रियता के कारण लोगों को इनकी प्रतीक्षा रहती थी। यद्यपि चाटुकार तब भी थे। फिर भी स्वाधीनता से पूर्व का अधिकांश मीडिया तंत्र जनाकांक्षा की कसौटी पर खरा उतरा था।


1947 के बाद देश के वातावरण में जो क्षरण हुआ, उसका प्रभाव मीडिया पर भी पड़ा। नेहरू जी स्वभाव से अंग्रेजी और उर्दूपरस्त थे। भारतीय भाषाओं से वे घृणा करते थे। अंग्रेजों ने षड्यन्त्रपूर्वक अंग्रेजी पत्रों को राष्ट्रीय (छंजपवदंस) तथा भारतीय भाषा वाले पत्रों को भाषायी (टमतदंबनसंत) कहा। नेहरू ने भी इसी नीति का पालन किया। अतः शासकीय विज्ञापन ऐसे ही पत्रों को मिलने लगे। अतः अंग्रेजी पत्र खूब फले-फूले। दुर्भाग्य से आज भी यही स्थिति है। शासकीय विज्ञापनों का 80 प्रतिशत अंग्रेजी पत्रों को ही मिलता है। 


लेकिन जहां तक जमीनी समाचारों की बात है, अंग्रेजी पत्रों में उनका प्रायः अभाव दिखता है। यह बात 1947 की तरह आज भी सत्य है। अपने गांव और जिले के समाचार के लिए लोग अपनी भाषा में निकलने वाले पत्रों पर ही निर्भर हैं। यद्यपि बुद्धिजीवी वर्ग तथा शासन-प्रशासन के क्षेत्र में पढ़े जाने के कारण अंग्रेजी पत्रों का प्रभाव अधिक है; पर प्रसार की दृष्टि से भारतीय पत्रों से वे बहुत पीछे हैं। अर्थात अंग्रेजी पत्र भारत के शिक्षित, सम्पन्न और सम्पन्न वर्ग की मानसिक भूख भले ही शांत कर देता हो; पर जनाकांक्षा की पूर्ति तो भारतीय पत्रों से ही होती है।


26 जून, 1975 को इंदिरा गांधी ने देश में तानाशाही थोपकर सभी पत्र-पत्रिकाओं पर नियन्त्रण हेतु सेंसर लगा दिया गया। कई पत्रों ने अपनी-अपनी शैली में इसका विरोध किया; पर यह विरोध अधिक समय तक नहीं चल सका। शर्म की बात तो यह है कि बड़े कहे जाने वाले कई पत्रों के सम्पादकों ने जुलूस निकालकर इसका समर्थन किया। उस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने गुप्त रूप से 500 से लेकर 1,000 प्रसार संख्या वाले सैकड़ों पत्र प्रकाशित किये। अंगारा, सौगन्ध, स्वाधीनता...आदि नामों से ये पत्र एक नगर या जिले तक सीमित होते थे। ये हाथ से चलने वाली साइक्लोस्टाइल मशीन पर छपते थे, जबकि कुछ साहसी प्रेस मालिक रात में इन्हें बड़ी मशीनों पर भी छाप देते थे। उस समय भी जनाकांक्षा की पूर्ति इन स्थानीय पत्रों द्वारा ही हुई, तथाकथित बड़े पत्रों द्वारा नहीं। 


आपातकाल हटने के बाद पत्रों को पूर्ववत स्वाधीनता मिली। तब एक कांग्रेसी नेता ने कहा था कि हमने उन्हें सिर्फ झुकने को कहा था, पर वे लेटकर दंडवत करने लगे। बड़े पत्रों की इस रीढ़विहीनता का कारण यह था कि सभी बड़े पत्र पूंजीपतियों के थे, और पूंजीपति कभी सरकार का विरोध नहीं कर सकते। जो स्थिति कल थी, वही आज भी है। बड़े कहलाने वाले अंग्रेजी या भारतीय पत्रों के मालिक आज भी बड़े व्यापारी ही हैं। उनके मुख्य कारोबार कुछ और है। पत्र उनके कारोबार को मीडिया रूपी ढाल प्रदान करते हैं।


मीडिया पूरी तरह बाजार के चंगुल में है, इसे वर्तमान पत्रों की भाषा से समझ सकते हैं। अस्सी के दशक में जब राजीव गांधी और उनकी दून मंडली सत्ता में आई, तो देश में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ने लगा। धीरे-धीरे हिन्दी माध्यम से चलने वाले विद्यालयों ने भी अपने बोर्ड बदलकर उन पर अंग्रेजी माध्यम लिखवा दिया। आज उस बात को 25 वर्ष हो चुके हैं और एक ऐसी पीढ़ी अस्तित्व में आ गयी है, जो न ठीक से हिन्दी जानती है और न अंग्रेजी। हिन्दी अंकावली तो प्रायः पूरी तरह से ही गायब हो गयी है। 


इस पीढ़ी तक पहुंचने के लिए कई हिन्दी पत्रों ने अपनी भाषा में जबरन अंग्रेजी शब्दों और रोमन लिपि की घुसपैठ करा दी है। कई पत्र तो शीर्षक ही अंग्रेजी में लगाने लगे हैं। कोई समय था, जब इन पत्रों के माध्यम से लोग अपनी भाषा सुधारते थे; पर अब वही मीडिया भाषा बिगाड़ने में लगा है। दूरदर्शन के समाचारों तथा नीचे आने वाली लिखित पट्टी में हिन्दी के साथ जैसा दुर्व्यवहार होता है, उसे देखकर सिर पीटने की इच्छा होती है। स्पष्ट है कि मीडिया का उद्देश्य इस समय केवल पैसे कमाना हो गया है।


पत्र-पत्रिकाओं से लेखक व साहित्यकारों को एक पहचान मिलती है। पहले कई पत्र प्रयासपूर्वक नये और युवा लेखकों को प्रोत्साहित करते थे; पर अब अधिकांश पत्र किसी गुट से बंधे हैं। वे उस गुट के लेखकों को ही स्थान देते हैं। विरोधी या तटस्थ लेखकों की रचनाएं अच्छी होने पर भी फेंक दी जाती हैं। यहां तक कि उनको जवाब भी नहीं दिया जाता। अंग्रेजी लेखकों की अनुवादित जूठन परोसने में भी कई पत्रों में होड़ लगी है। वे भूलते हैं कि हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में लिखने वाले कम नहीं हैं; पर जब उद्देश्य केवल पैसा हो, तो इस ओर ध्यान कैसे जा सकता है ? 


अपने विचार से इतर संस्थाओं के कार्यक्रमों के बहिष्कार की प्रवृत्ति भी इसी मानसिकता के कारण बढ़ रही है। गत 27 फरवरी को दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव और अन्य समाजसेवियों को सुनने एक लाख लोग आये। सरकारी दूरदर्शन ने इसका समाचार ही नहीं दिया, तो दिल्ली के अधिकांश पत्रों ने भी दूसरे-तीसरे पृष्ठ पर इसे स्थान दिया। विज्ञापन का लालची मीडिया शासन से कितना डरता है, इसका यह एक उदाहरण है।


इस बाजारवाद ने ही ‘पेड न्यूज’ (विज्ञापन को समाचार की तरह छापने) के चलन को बढ़ाया है। चुनाव के समय यह प्रवृत्ति बहुत तीव्र हो जाती है। 100 लोगों की बैठक को विराट सभा बताना तथा विशाल सभा के समाचार को गायब कर देना, इसी कुप्रवृत्ति का अंग है। दुर्भाग्य से वे समाचार पत्र ही इस होड़ में लगे हैं, जिनके मालिकों के पास अथाह सम्पत्ति है। उनकी देखादेखी छोटे पत्र भी इसकी नकल कर रहे हैं। यद्यपि कुछ पत्रकारों और संस्थाओं ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई है, जो एक शुभ लक्षण है। 


मीडिया में समाचार और विचार दो अलग धारणाएं हैं। यदि संवाददाता या संपादक किसी समाचार के पक्ष या विपक्ष में कोई विचार देना चाहे, तो उसके लिए सम्पादकीय पृष्ठ का उपयोग होता है। कुछ पत्र इस नीति का पालन करते हैं; पर अधिकांश में इसका अभाव है। संवाददाता अपने विचारों के अनुसार समाचार को तोड़-मरोड़ देता है। इससे पत्र की विश्वसनीयता कम होती है।


जब समाज में हर ओर गिरावट आती है, तो उसका प्रभाव मीडिया पर भी पड़ना स्वाभाविक है। समाचार पत्रों को शासन भरपूर विज्ञापन देता है। इस लालच में हजारों पंजीकृत पत्र केवल सौ प्रतियां छाप कर ही स्वयं को जीवित रखते हैं। जिस दल का शासन, उसकी प्रशंसा कर विज्ञापन लेना ही इनकी नीति होती है। पति सम्पादक, पत्नी प्रबंधक, बेटा मुख्य संवाददाता और बेटी विज्ञापन प्रबंधक...। ऐसे पत्र मीडिया की प्रतिष्ठा को गिराते हैं; पर कोई कठोर कानून न होने के कारण ऐसे दलाल लगातार बढ़ रहे हैं। ये पत्र लोकतंत्र और जनाकांक्षा दोनों के लिए ही हानिकारक हैं।


अंतरजाल के सहारे न्यू मीडिया की एक नई लहर भी इन दिनों जोर पकड़ रही है। बड़ी संख्या में लेखक और पत्रकार ब्ल१ग लिख रहे हैं। यह अपने विचारों को फैलाने का एक प्रबल माध्यम बन गया है। अतः सभी समाचार पत्र इन्हें स्थान देने लगे हैं; पर कोई नियन्त्रण न होने से जहां एक ओर इसकी विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है, वहां भाषा की मर्यादा का उल्लंघन भी अत्यधिक हो रहा है। चूंकि अभी यह प्रारम्भिक अवस्था में है, इसलिए इसका भविष्य क्या होगा, कहना कठिन है। 


अंतरजाल और मोबाइल के मेल ने ट्विटर और फेसबुक को एक सशक्त सामाजिक मंच बना दिया है, जहां लोग अपने विचारों को बांट सकते हैं। यह एक दुधारी तलवार है, जो दूसरों के साथ स्वयं पर भी वार करती है। भारत में पूर्व विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर और क्रिकेट के व्यापारी ललित मोदी को ट्विटर पर की गयी टिप्पणियों के कारण ही पद छोड़ना पड़ा। इन दिनों भाजपा नेता सुषमा स्वराज का एक ट्वीट चर्चा में है।


मीडिया एक सतत प्रवाहमान संस्था है। इसने अनेक बार अपने रंग और रूप बदले हैं। कोई समय था, जब उत्तर से दक्षिण तक समाचार पहुंचने में छह महीने लग जाते थे; पर आज छह सेकेंड में पूरी दुनिया में बात फैल जाती है। इस तेजी के कारण लोकतंत्र और जनाकांक्षा के प्रति इसकी जिम्मेदारी भी बढ़ी है; पर उसकी पूर्ति सही तरह से नहीं हो पा रही है। इसका दोषी केवल मीडिया तंत्र ही नहीं, पूरा समाज और राजनीतिक वातावरण है। 


चुनाव में हर बार लाखों नये मतदाता बनते हैं। नये होने के कारण इनका प्रशिक्षण आवश्यक है। युवा पीढ़ी नई सोच और नई उमंग वाली होती है। अतः मीडिया इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभा सकता है। वह नये लोगों को जाति, क्षेत्र, भाषा और प्रांत की राजनीति से मुक्त करने तथा वंशवादी, भ्रष्टाचारी और अपराधी प्रत्याशियों का विरोध करने की प्रेरणा दे सकता है; पर प्रायः मीडिया इस बारे में चुप रहता है। कहीं विज्ञापन उसका मुंह बंद कर देते हैं, तो कहीं प्रत्याशी का भय। फलतः वह भी हर चुनाव क्षेत्र के जातीय और मजहबी समीकरण देकर ही अपने कर्तव्य की पूर्ति कर लेता है। इससे सर्वहित की बजाय जाति और मजहबी राजनीति को बल मिलता है। यही कारण है कि 60 वर्ष का होने के बाद भी भारतीय लोकतंत्र जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं कर पा रहा है।


किसी भी वस्तु के निर्माण में कच्चे माल और मशीनों की गुणवत्ता का बहुत महत्व है। यही स्थिति मीडिया की है। पत्रकार भी इसी समाज से आ रहे हैं। भौतिकता की होड़ और राजनीति की चमक-दमक से वे भी प्रभावित होते हैं। उन्हें भी अपने परिवार के लिए कार, मकान, मनोरंजन और बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा व अन्य सुविधाएं चाहिए। खाली पेट साइकिल पर घूमते हुए अब पत्रकारिता नहीं हो सकती। ऐसे में उनका क्षरण होगा ही। पिछले दिनों राडिया-राजा प्रकरण से पता लगा कि पत्रकार जगत के कई बड़े लोग कितनी गहराई तक कीचड़ में धंसे हैं। 


भ्रष्टाचार जिस तरह सर्वव्यापी, सर्वस्पर्शी और समाज में स्वीकार्य हो गया है, वह आश्चर्यजनक है। राजनीति तो काली थी ही; पर अब सेना और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के किस्से भी खुल रहे हैं। ऐसे में मीडियाकर्मियों से बहुत आशा नहीं करनी चाहिए। यद्यपि न्यायपालिका और सेना के भ्रष्टाचार को भी मीडिया ने ही उजागर किया है। इसलिए उनकी जिम्मेदारी बाकी सबसे अधिक है। 


पर यह नहीं भूलना चाहिए कि मीडिया भी समाज का ही एक अंग है। उसे लोकतंत्र और जनाकांक्षा की कसौटी पर कसने से पहले समाज और उसके नेताओं को स्वयं को कसौटी पर कसना होगा। भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था, पैसा कमाने की मशीन बनाने वाली अनैतिक शिक्षा और अनुशासनहीन समाज में से 24 कैरेट वाले पत्रकारों की खोज व्यर्थ है।

गुरु पूर्णिमा

गुरुपूर्णिमा (15 जुलाई) पर


                                        तस्मै श्री गुरवे नमः

भारतीय जीवन परम्परावादी है। हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुत सोच विचार कर, ज्ञान, विज्ञान और समय की कसौटी पर सौ प्रतिशत कस कर कुछ परम्पराओं का निर्माण किया। इन्हीं के कारण हजारों सालों के विदेशी और विधर्मी आक्रमण के बाद भी भारत बचा हुआ है। ऐसी ही एक परम्परा है श्री गुरुपूर्णिमा उत्सव।


आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाये जाने वाले इस पर्व को ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहते हैं। वेदों के संकलनकर्ता और सम्पादक तथा महाभारत के लेखक महर्षि व्यास का जन्म इसी दिन हुआ था। व्यास जी का महत्व इससे भी प्रकट होता है कि संपूर्ण विश्व के साहित्य को उनकी जूठन कहा जाता है (व्यासोच्छिष्टम् जगत्सर्वम्)। 


इसका अर्थ स्पष्ट है कि व्यास जी ने अपने जीवन में इतना अधिक काम किया कि उनका नाम एक संस्था और पदवी ही बन गया। आज भी जब कोई कथा होती है, तो प्रवचनकार को कथा व्यास और उसके मंच को व्यासपीठ कहा जाता है। यह व्यास जी के महान कार्यों को आज तक दिया जाने वाला तुच्छ सम्मान ही है।


ऐसे श्रेष्ठ महापुरुष के जन्मदिवस को व्यास पूर्णिमा और आदि गुरु होने के कारण गुरु पूर्णिमा कहना स्वाभाविक ही है। प्राचीन काल में इसी दिन विद्यार्थी अपनी विद्या आरम्भ करते थे। उनके अभिभावक बच्चे को गुरु के पास ले जाकर उसे गुरु को सौंपते थे। गुरु भी बच्चे को अपनी संतान के समान प्रेम देने के आश्वासन के साथ स्वीकार करते थे। छोटी अवस्था में तो बच्चे अपने घर के निकटवर्ती विद्यालय में जाते थे; पर कुछ बड़े होने पर वे गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। इस प्रकार व्यास पूर्णिमा का पर्व हर गांव और मोहल्ले में विद्यारम्भ का एक बृहत् उत्सव बन जाता था। 


शिक्षा का प्राचीन भारत में कितना महत्व था, इसे इसी से समझा जा सकता है कि गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक के 16 संस्कारों में ‘विद्यारम्भ’ को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। बच्चा किसी भी वर्ग, वर्ण या लिंग का हो, उसके लिए शिक्षा अनिवार्य और निःशुल्क थी। निर्धन बालक सुदामा और राजपरिवार के श्रीकृष्ण सांदीपनि गुरु के पास एक साथ पढ़ते थे। गुरुकुल में गुरु और गुरुपत्नी के सान्निध्य में सब बच्चे एक परिवार की तरह रहते थे। इस प्रकार मिले संस्कार जीवन भर अमिट रहना स्वाभाविक ही है। 


एक बार और, तब शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान नहीं था। इसीलिए भाषा, राजनीति, भौतिकी, कला, चिकित्सा, रसायन विज्ञान, कूटनीति और तंत्र-मंत्र की शिक्षा के साथ ही लकड़ी काटने, खेती करने, गोपालन से लेकर रसोई तक के काम छात्र प्रसन्नता से करते थे। शिक्षा पूरी होने पर बच्चे के अभिभावक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार गुरु को जो भी देते थे, वे उसे प्रेम से स्वीकार करते थे। वह गांवों की जागीर से लेकर लौंग के दो दाने तक कुछ भी हो सकता था। साम्यवादी भले ही कितना ढिंढोरा पीटें; पर समता और समानता का ऐसा उदाहरण इतिहास में मिलना कठिन है। 


यहां हमें शिक्षा और विद्या का अंतर भी समझना होगा। शिक्षा का अर्थ जहां व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी ज्ञान है, वहां विद्या का अर्थ व्यावहारिक के साथ ही सामाजिक ज्ञान भी है। विद्या में वह सब संस्कार आते हैं, जिनसे व्यक्ति सामाजिक और राष्ट्रीय प्राणी बनता है। विद्या हर व्यक्ति को ‘मैं और मेरा’ से ऊपर उठकर ‘हम और हमारा’ की ओर जाने को प्रेरित करती है। इसीलिए कहा है सा विद्या या विमुक्तये। अर्थात विद्या व्यक्ति को उसके जीवन में व्याप्त दूषित पूर्वाग्रहों से मुक्त करती है। इसीलिए इस महत्वपूर्ण संस्कार का नाम विद्यारम्भ रखा गया, शिक्षारम्भ नहीं।


गुरु का भारतीय जीवन पद्धति में और भी अनेक कारणों से महत्व है। सबसे पहली बात तो यह कि न केवल शिक्षा अपितु समाज जीवन के हर क्षेत्र में गुरु की आवश्यकता बताई गयी है। मां अपने बच्चों की प्रथम गुरु कही जाती है। क्योंकि वही उन्हें चलना, बोलना और किस से क्या व्यवहार करना, यह बताती है। बालिकाओं को मां और बालकों को प्रायः पिता भावी जीवन के लिए तैयार करते हैं। इसलिए बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर है, यह कहा जाता है।


इस घर के बाद किताबी ज्ञान के लिए बच्चा घर से कुछ दूर के विद्यालय में अध्यापक के निर्देशन में शिक्षा पाता है। भारतीय परम्परा में शिक्षा समाप्ति के बाद दीक्षा का भी बड़ा महत्व है। दीक्षा से ही शिक्षित युवा यह जान पाता है कि उसे शिक्षा का उपयोग किस दिशा में करना है। दीक्षा के अभाव में शिक्षा का कैसा दुरुपयोग होता है, इसके हर दिन सैकड़ों उदाहरण हम देखते हैं। बंदूक चलाने की शिक्षा के बाद यदि दीक्षा न हो, तो वह किसी निरपराध की हत्या करा देती है। जबकि सही दीक्षा हो, तो उससे देश की रक्षा की जा सकती है। इसलिए शिक्षा के बराबर ही दीक्षा का भी महत्व है।


केवल किताबी ज्ञान ही क्यों, गीत-संगीत, लेखन, सम्पादन से लेकर कपड़े सिलने और मिस्त्री बनने जैसे काम भी गुरु के निर्देशन में ही सीखे जा सकते हैं। आज भारत में जो भी ख्यातिप्राप्त कलाकार हैं, वे अपने गुरु का स्मरण कर धन्यता का अनुभव करते हैं। 


सच तो यह है कि जीवन को कोई भी क्षेत्र हो, गुरु के सान्निध्य के बिना उद्धार संभव नहीं है। इसीलिए जब दशरथ के दरबार में विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को मांगने आये, तो वे संकोच में पड़ गये। ऐसे में गुरु वशिष्ठ ने राजा को आश्वस्त किया, क्योंकि वे जानते थे कि राम का अवतार जिस काम के लिए हुआ है, उसके लिए उन्हें विश्वामित्र जैसे गुरु का सान्निध्य मिलना आवश्यक है।


कौरव और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य और कर्ण के गुरु परशुराम की कहानी कौन नहीं जानता ? शिवाजी के जीवन में परिवर्तन तब ही हुआ, जब उन्हें समर्थ स्वामी रामदास जैसा श्रेष्ठ गुरु मिला। विजयनगर साम्राज्य के निर्माता हरिहर और बुक्क के जीवन में स्वामी विद्यारण्य ने परिवर्तन किया। बन्दा बैरागी की जीवन को सही दिशा गुरु गोविंद सिंह ने दी। 


रामकृष्ण परमहंस के कारण विवेकानंद का; विवेकानंद के कारण मार्गरेट नोबेल (भगिनी निवेदिता) का और स्वामी विरजानंद के कारण ऋषि दयानंद का जीवन बदल गया। भाई परमानंद, वीर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा ने न जाने कितने युवकों के मन में क्रांति का बीज बोया। गुरु शिष्य के अन्तर्मन में छिपी प्रतिभा को पहचान कर उसे पल्लवित, पुष्पित और प्रस्फुटित होने का अवसर प्रदान करता है। वह शिष्य की कमियों को प्रेम से दूर करता है और फिर उसे अपने से भी आगे बढ़ता देखकर प्रसन्न होता है। 


गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़-गढ़ काढ़े खोट
अंदर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।।


पश्चिमी चिंतन में गुरु का इतना महत्व नहीं है। वहां शिक्षक और छात्र तो हैं; पर गुरु और शिष्य नहीं। वहां शिक्षा तो है; पर विद्या और दीक्षा नहीं। शिक्षक अपने परिवार का पेट भरने के लिए पढ़ाता है और छात्र भी इसीलिए पढ़ता है कि वह भविष्य में परिवार पाल सके। इसी में से वेतन, ट्यूशन, नकल, नंबर बढ़ाने और हिंसक आंदोलन जैसी प्रवृत्तियां जन्मी हैं, जिन्होंने शिक्षा जगत का कबाड़ा कर दिया है। इसीलिए अब शिक्षक छात्रों से डरते हैं। विद्यालय नग्नता, गुंडागर्दी, दलाली और राजनीति के अड्डे बन गये हैं। यदि इस दृश्य को बदलना है, तो गुरु परम्परा को पुनर्जीवित करना होगा।


भारत जगद्गुरु है। एक समय उसने विश्व को दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य किया था; पर काल की गति ने उसकी दशा और दिशा बदल दी। अब वह हर जगह पिछलग्गू बना है। कभी ब्रिटेन का, तो कभी रूस का और अब अमरीका का। गुरुपूर्णिमा वह पावन पर्व है, जब हमें और हमारे देश दोनों को ही अपने इस कर्तव्य का स्मरण करना होगा; पर यह कर्तव्य भाषणों से नहीं, अपने चरित्र और व्यवहार से पूरा होगा। हमारे पूर्वजों ने हमें स्मरण भी कराया है -


एतद्देश प्रसूतस्य, सकाशादग्रजन्मनः
स्वं स्वं चरित्रन् शिक्षेरन, पृथिव्यः सर्वमानवः।। (मनुस्मृति)


गुरु की महिमा अपार है। इसका न वर्णन संभव है और न लेखन। यह शब्दातीत है। गुरु की वाणी ही नहीं, उसका स्पर्श और दृष्टि ही व्यक्ति के जीवन को बदलने के लिए पर्याप्त है।


सब धरती कागद करूं, लेखनी सब वनराय
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाय।।


खालसा पंथ में तो श्री गुरु ग्रंथ साहिब को ही सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उसमें गुरु शब्द 8836 बार आया है। गुरु को साक्षात परमेश्वर मानते हुए कहा है - 

गुर परमेसरु एको जाणु, जो तिस भावै सो परवाणु।। (864 म.5)

तथा

गुर गोविंद गोविंद गुर है नानक भेद न भाई।। (442 म.4)


इसीलिए जब वाणी मौन हो जाती है और मस्तिष्क विचार शून्य; तब यही कह कर संतोष करना पड़ता है -


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।। स्कन्दपुराण (गुरु गीता)


गुरुपूर्णिमा का पर्व हमें यही याद दिलाने आया है। 

मकर संक्रांति

परिवर्तन का संदेश देती मकर संक्राति



भारत एक उत्सवप्रिय देश है। शायद ही कोई दिन बीतता हो, जब किसी पंथ, सम्प्रदाय या क्षेत्र में उत्सव न हो। उत्सव न हों, तो जीने की इच्छा-आकांक्षा ही समाप्त हो जाये। अपने चारों ओर बिखरे संकटों, अव्यवस्थाओं और निराशाओं के बीच उत्सव हमें हंसाकर जीवन में फुलझड़ियां छोड़ देता है। ऐसा ही एक पर्व है मकर संक्रांति, जो केवल उल्लास ही नहीं, परिवर्तन का संदेश भी देता है।


क्रांति और संक्रांति


क्रांति की चर्चा समाज में बहुत होती है। युवक से लेकर वृद्ध तक, पुरुष से लेकर महिला तक, सब क्रांति करने को तत्पर दिखायी देते हैं; पर बिना इनका सही अर्थ समझे वे भ्रांति में फंस जाते हैं। क्रांति का अर्थ है परिवर्तन। जब किसी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के जीवन में कोई मूलभूत परिवर्तन होता है, तो उसे क्रांति कहते हैं। अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी कहलाते थे। जयप्रकाश नारायण ने 1974-75 में राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन के लिए जो आंदोलन चलाया था, उसका उद्देश्य वे ‘समग्र क्रांति’ ही बताते थे।


पर जब यही परिवर्तन किसी सार्थक दिशा में हो, तो उसे संक्रांति कहा जाता है। किसी ने जुए या शराब की आदत पकड़ ली और इस चक्कर में अपना घर-परिवार बरबाद कर डाला, तो यह भी क्रांति ही हुई; पर यदि उसने इन्हें छोड़ दिया, तो यह संक्रांति हुई। इसीलिए भारतीय मनीषा ने क्रांति के बदले संक्रांति की कल्पना की है।


भौगोलिक मान्यताएं


यों तो भारत में अनेकों संक्रांति पर्व आते हैं। जब भी पक्ष, राशि, अयन या ऋतु आदि बदलती हैं, तब वह संक्रांति ही है; पर सूर्यदेव के मकर राशि में प्रवेश करने वाली संक्रांति का विशेष महत्व है। भारत में कालगणना मुख्यतः चन्द्रमा की गति के आधार पर होती है; पर सूर्य का महत्व भी कम नहीं है। जबकि अंग्रेजी कालगणना का आधार सूर्य ही है। मकर संक्रांति सूर्याेपासना का पर्व है। इसलिए इसकी अंग्रेजी तिथि भी प्रायः 14 जनवरी ही रहती है। वैसे प्रति 50 वर्ष में एक दिन का अंतर इसमें भी आ जाता है। 12 जनवरी, 1863 को विवेकानंद के जन्म के समय मकर संक्रांति ही थी।


इस दिन से सूर्य का प्रकाश तीव्र एवं दिन बड़े होने लगते हैं। यद्यपि शीत का प्रकोप इसके बाद भी बना रहता है। ‘धन के पन्द्रह मकर पचीस, चिल्ला जाड़ा दिन चालीस’ वाली कहावत इसी ओर संकेत करती है। मकर संक्रांति से 15 दिन पूर्व और 25 दिन बाद तक ‘चिल्ला जाड़ा’ माना जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार ईसा का जन्म भी इसी दिन हुआ था; पर जब पोप ग्रेगरी ने अंग्रेजी कैलेंडर बनाया, तो इसे बीस दिन पीछे ले जाकर 25 दिसम्बर को घोषित कर दिया और फिर उसी को ‘बड़ा दिन’ कहने लगे।


ऐतिहासिक प्रसंग


मकर संक्रांति के साथ कुछ ऐतिहासिक घटनाएं जुड़ी हैं। पहली घटना महाभारत युद्ध से संबंधित है। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। वे दक्षिणायण के बदले उत्तरायण में शरीर छोड़ना चाहते थे। मकर संक्रांति पर जब सूर्य मकर राशि में आकर उत्तरायण हुआ, तब उन्होंने देहत्याग किया। इतने दिन तक वे गंगा तट पर शरशैया पर लेटे रहे, यह प्रसंग सर्वविदित ही है।


जब श्री गुरुगोविंद सिंह जी के प्रायः सभी साथियों ने हताश होकर उन्हें छोड़ दिया था, तब माईभागो नामक एक वीर महिला की प्रेरणा से उनमें से 40 ने महासिंह नामक सरदार के नेतृत्व में फिर उनके साथ चलने का संकल्प लिया। जब मुगल सेना ने अकेले गुरुजी को घेर लिया था, तब उस पर हमलाकर इन वीरों ने ही गुरुजी की प्राणरक्षा की थी। इस युद्ध में माईभागो सहित उन सबको वीरगति प्राप्त हुई। 1705 ई0 की मकर संक्रांति को ‘खिदराना के ढाब’ नामक स्थान पर हुए उस संग्राम का साक्षी वह तालाब आज भी ‘मुक्तसर’ कहलाता है। 1761 में इसी दिन पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा सेना की पराजय से भारत में हिन्दू राज्य का स्वप्न टूट गया।


भारत में अनेक पर्व क्षेत्र विशेष में मनाये जाते हैं; पर मकर संक्रांति पूरे देश में लोकप्रिय है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल आदि में इसे लोहड़ी; दक्षिण में पोंगल; कर्नाटक में सुग्गी, पूर्वोत्तर भारत में बिहू; महाराष्ट्र में तिलगुल; उड़ीसा में मकर चौला; बंगाल में पौष संक्रांति; गुजरात व उत्तराखंड में उत्तरायणी तथा बिहार, बुंदेलखंड और म0प्र0 में सकरात कहते हैं।


इस दिन खिचड़ी और तिल गुड़ से बनी सामग्री खायी जाती है। इनमें प्रयुक्त सामग्री उष्णता देने वाली होने के कारण इसका शीत ऋतु में विशेष महत्व भी है। खिचड़ी में प्रयुक्त दाल, चावल, घी तथा गजक या रेवड़ी में पड़े तिल, गुड़ आदि आपस में इतने मिल जाते हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। इस नाते ये समरसता के भी संदेशवाहक हैं। गोरखपुर के गोरक्षनाथ मंदिर में तो श्रद्धालुजन इस दिन टनों कच्ची खिचड़ी भेंट करते हैं। बाद में वहां प्रसाद रूप में भी खिचड़ी ही वितरित की जाती है।


कैसा परिवर्तन


आज मकर संक्रांति का महत्व भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से भी अधिक सामाजिक क्षेत्र में है। गत एक शताब्दी में भारतीय समाज में इतने दुर्गुण प्रविष्ट हो गये हैं कि उनसे हमारे अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगने लगा है।


हिन्दू समाज में सबसे बड़ा रोग जातिभेद है। जातिप्रथा के पक्षधर कुछ भी तर्क दें; उसे किसी समय समाज संरक्षण के लिए बनायी गयी व्यवस्था या वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप कहें; गीता के उद्धरण देकर उसे जन्म के बदले कर्म के आधार पर बनी हुई बतायें; पर जमीनी सच तो यही है कि आज भी जाति की मान्यता जन्म के आधार पर ही है। बड़ी संख्या में लोग इसी आधार पर किसी को ऊंचा या नीचा मानते हैं। कुछ मूढ़ तो जाति की व्याख्या, जो जाती नहीं, यह कहकर करते हैं। हिन्दू समाज से मुसलमान या ईसाई बनने के लिए जहां निर्धनता, अज्ञानता, अंधविश्वास और विधर्मी षड्यन्त्र दोषी हैं; वहां जन्म के कारण किया जाने वाला भेदभाव इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


अत्यधिक दिखावा


हिन्दू समाज को जिस एक अन्य दुर्गुण ने गत 15-20 साल में तेजी से घेरा है, वह है दिखावा। अपने परिवार में होने वाले विवाह, जन्मोत्सव, वर्षगांठ आदि ने संस्कारपूर्ण हिन्दू पद्धति को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। इनमें अब अंग्रेजियत, काली कमाई, बेहूदे फैशन, आभूषण और राजनीतिक शक्ति का नग्न प्रदर्शन होता है। गरीबों के हमदर्द बनने वाले राजनेताओं के यहां जब हजारों लोग दावत खाते हैं, तो उसके बजट की कल्पना करना ही भयावह लगता है। राजनीति और सामाजिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोग इन आयोजनों में जाकर इस पाखंड को महिमामंडित करते हैं। यदि वे इनका बहिष्कार करें, तो समाज में अच्छा संदेश जा सकता है।


पर्यावरण का संकट


केवल भारत में ही नहीं, तो सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण संरक्षण के प्रति बहुत चिन्ता की जा रही है। एक ओर पेड़ों का विनाश, तो दूसरी ओर वाहनों, विद्युत उपकरणों, दूरदर्शन तथा ध्वनिवर्धक का अत्यधिक प्रयोग इसके प्रमुख कारण हैं। वातावरण में बढ़ रही विषैली गैसों के कारण जहां ओजोन की परत में छिद्र होने के समाचार आ रहे हैं, वहां गरमी बढ़ने और हिमनदों के पिघलने से जल का संकट भी मुंहबाये खड़ा है। जीवन में हर स्तर पर प्रकृति से बढ़ती दूरी इस रोग को कोढ़ में खाज की तरह बढ़ा रही है। इसके कारण छोटे बच्चों को भी उच्च रक्तदाब और मधुमेह जैसे रोग होने लगे हैं।


धार्मिक लोग इसे रोक सकते हैं; पर दुर्भाग्य से धार्मिक स्थल और जुलूस ही शोर के सबसे बड़े अखाड़े बन गये हैं। यदि पर्यावरण की उपेक्षा से प्रकृति का चक्र बदल गया, तो मानव जाति को लेने के देने पड़ जाएंगे। इस संदर्भ में यह कहना भी गलत नहीं है कि जहां ग्रामीण और अल्पशिक्षित लोग पर्यावरण संरक्षण के प्रति परम्परा से ही सजग हैं, वहां नगरीय और स्वयं को शिक्षित कहने वाले इसकी सर्वाधिक उपेक्षा करते हैं। बिजली, पानी और पेट्रोल का अपव्यय कर कुछ लोग स्वयं को शेष लोगों से बड़ा मान लेते हैं; पर सच में वे केवल बड़े मूर्ख हैं, और कुछ नहीं।


इसी प्रकार नारी समाज के प्रति भी दृष्टि बदलनी होगी। किसी समय मुस्लिम आक्रमणकारियों के भय से उन्हें घर में रहने की सलाह दी गयी होगी; पर अब समय बदला है। अब उन्हें भी हर स्तर पर शिक्षित करने की आवश्यकता है। बाल विवाह, पर्दा प्रथा, परिवार नियोजन, अन्तरजातीय एवं विधवा विवाह, बलिप्रथा, मृतक भोज आदि के प्रति भी सार्थक एवं समयानुकूल दृष्टिकोण अपनाना होगा।


मानसिकता में परिवर्तन


सच तो यह है कि ऐसी सब सामाजिक बीमारियों का निदान कानून से नहीं, अपितु मानसिकता में परिवर्तन से होगा। इसके लिए समाज के प्रभावी लोगों को आगे आकर अपने आचरण से समाज के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत करना होगा। कहावत है ‘महाजनो येन गतः, स पन्था’ः। अर्थात महान लोग जिस मार्ग पर चलते हैं, शेष समाज भी उसी का अनुसरण करता है।


मकर संक्रांति का पर्व हमें अपने मानस में व्यापक परिवर्तन कर सही दिशा में जाने की प्रेेेरणा देता है। अपने मौहल्ले, गांव या बस्ती के हर घर से खिचड़ी एकत्र कर किसी मंदिर या सार्वजनिक स्थल पर बड़ा खिचड़ी भोज करें। हर जाति, वर्ग, आयु तथा हर प्रकार का कार्य करने वाले पुरुष, महिलाएं, बच्चे, बड़े वहां आयें। सब मिलकर बनायें, बांटे और खायें। सामाजिक एवं राष्ट्रीय समरसता के पर्व मकर संक्रांति का यही पावन संदेश है।

गौरक्षा

गोरक्षा की उज्जवल परम्परा

भारत एक धर्मप्राण देश है। भारत की आत्मा के दर्शन करने हों, तो तीर्थों और धामों में जाना होगा। गोमाता इसी धर्म का सजीव रूप है। इसलिए किसी भी काम को करते समय गोमाता के दर्शन शुभ माने जाते हैं। यदि उस समय गोमाता अपने बछड़े या बछिया के साथ अर्थात सवत्स हो, फिर तो कहना ही क्या ?

गोमाता की पूजा, रक्षा और सेवा की भारत में सुदीर्घ परम्परा रही है। इस बारे में सबसे प्राचीन प्रसंग राजा दिलीप का मिलता है। राजा दिलीप भगवान श्रीराम के पूर्वज थे। जब बहुत लम्बे समय तक उनके घर में कोई संतान नहीं हुई, तो उन्होंने अपने कुलगुरु से परामर्श किया। कुलगुरु ने उन्हें देवलोक में पूजित कामधेनु की पुत्री नंदिनी गाय की सेवा का आदेश देते हुए कहा कि इसकी सेवा से तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी।


बस फिर क्या था, राजा दिलीप एवं उनकी धर्मपत्नी नंदिनी की सेवा में जुट गये। उन्होंने गोशाला में ही अपना निवास बना लिया। अब वे नंदिनी के जागने से पहले ही उठकर गोशाला की सफाई करते। फिर नंदिनी के घास-चारे आदि का प्रबंधकर उसके खाने के बाद ही अल्पाहार करते। इसके बाद वे नंदिनी को घुमाने के लिए जंगल में ले जाते। जिधर नंदिनी जाती, वे उसके पीछे-पीछे वहां ही जाते थे। नंदिनी के शरीर पर मक्खी या मच्छर न बैठें, इसके लिए वे दोनों अपने अंगवस्त्रों से हवा करते रहते थे। 


जंगल से लौटने के बाद नंदिनी की सेवा के अन्य काम करने के बाद जब वह विश्राम करती, तभी वे दोनों विश्राम करते थे। रात में गुरुदेव की अनुमति से वे नंदिनी का दूध पीकर ही सो जाते थे। अपने राज्य संबंधी आवश्यक कार्य भी वे गोशाला में रहते हुए ही निबटा लेते थे। इस प्रकार सेवा करते हुए लम्बा समय बीत गया।


एक दिन वे नंदिनी के साथ जंगल में थे। नंदिनी कुछ देर को बैठी, तो राजा और रानी भी बैठ गये। वे थके हुए तो थे ही, ऐसे में जंगल की शीतल और सुगंधित हवा से उन्हें झपकी लग गयी; पर अचानक नंदिनी की करुण पुकार सुनकर वे चैंक गये। उन्होंने देखा कि नंदिनी को एक सिंह ने दबोच रखा है। 


उन दिनों मानव, पशु-पक्षी और प्रकृति के बीच सुसमन्वय होने से सब एक दूसरे की भाषा और मनोभाव समझते थे। राजा ने सिंह से कहा कि वे अपने गुरुदेव के आदेश पर नंदिनी की सेवा कर रहे हैं, अतः वह इसे छोड़ दे। सिंह ने कहा कि उसे भूख लगी है और पशु उसका स्वाभाविक आहार है। अतः वह इसे नहीं छोड़ेगा। राजा ने फिर आग्रह किया, तो सिंह ने कहा कि यदि इसके बदले उसे किसी और प्राणी का मांस मिल जाए, तो वह इसे छोड़ देगा। 


अब राजा बड़े असमंजस में पड़ गये। वे किसी अन्य पशु को मारना नहीं चाहते थे। ऐसे में सिंह ने फिर सुझाव दिया कि राजा स्वयं को ही खाने के लिए प्रस्तुत कर दे। इधर रानी भी यह सब सुन रही थी। उसने सिंह से कहा कि वह राजा के बदले उसे खा ले। अब राजा और रानी में इस पर विवाद होने लगा। अंततः दोनों ही आंखें बंदकर सिंह के सम्मुख बैठ गये।


पर यह सब तो वस्तुतः भगवान भोलेनाथ की एक माया था। वे ही सिंह का रूप लेकर राजा और रानी की परीक्षा लेने आये थे। उन्होंने दोनों को भरपूर आशीर्वाद दिया। इस प्रकार राजा दिलीप के घर में पुत्र का जन्म हुआ, जिससे उनका वंश आगे बढ़ा और फिर उसी कुल में श्रीरामचंद्र का जन्म हुआ। अर्थात विश्ववंदित भगवान श्रीराम चंद्र जी वस्तुतः गोमाता का ही प्रसाद हैं।


द्वापरयुग में भगवान जिस रूप में अवतरित हुए, उन श्रीकृष्ण का तो नाम ही गोपाल है। गोमाता और गोवत्सों के बिना उनका चित्र अधूरा सा लगता है। उनका सारा बचपन गोसेवा में ही बीता। इसलिए जब वे वृन्दावन छोड़कर मथुरा गये, तो केवल गोपियों ने ही नहीं, गायों ने भी खाना-पीना छोड़ दिया था।


एक बार जब कंस की ओर से भेजा गया अघासुर नामक राक्षस अजगर का विशाल रूप लेकर उनकी सब गायों और ग्वाल बालों को निगल गया, तो अपने प्राणों का मोह किये बिना बालकृष्ण स्वयं उसके मुंह में घुस गये। अंदर जाकर उन्होंने अपना शरीर इतना बड़ा कर लिया कि उस राक्षस का दम घुट गया। इस प्रकार न केवल सब गायों की, अपितु सब ग्वालों और बृजवासियों की भी रक्षा हुई। 


मुगलों द्वारा जब भारत की धर्मभूमि आक्रांत हो रही थी, गोमाता की सार्वजनिक रूप से हत्या हो रही थी, मंदिर और मठों का विध्वंस हो रहा था, उस काल में छत्रपति शिवाजी के रूप में एक गोरक्षक का  जन्म हुआ। उन्होंने बाल्यावस्था में, बाजार के बीच में ही एक कसाई का सिर अपनी तलवार से उतार कर गोमाता की प्राणरक्षा की थी। आगे चलकर जब उन्होंने हिन्दू पद पादशाही की स्थापना की, तो गोहत्या को पूर्ण प्रतिबंधित कर दिया था। आज भी शिवाजी को ‘गो ब्राह्मण प्रतिपालक’ के रूप में याद किया जाता है।


पंजाब में तो गुरु के प्यारे सिख वीरों ने गोरक्षा को अपने जीवन का परम ध्येय बना लिया था। लाहौर में मुसलमानों द्वारा की जाने वाली गोहत्या से दुखी होकर गुरु नानकदेव ने प्रण किया था कि वे दसवें अवतार में गोघाती मलेच्छों को नाश करेंगे। इसका पालन करते हुए दशमेश गुरु गोविंद सिंह जी ने देवी की उपासना करते हुए यह वर मांगा था - 


यही देह आगिया तुरकन गहि खपाऊं

गऊघात का दोख जग सिऊं मिटाऊं।
यही आस पूरन करहु तुम हमारी
मिटै कसट गऊअन छुटै खेद भारी।
यही बेनती खास हमरी सुणीजै
असुर मार कर रच्छ गऊअन करीजै।। 

(राष्ट्रधर्म, खालसा पंथ स्थापना विशेषांक, अपै्रल 1999, पृष्ठ 82)  


इतना ही नहीं, तो देहत्याग से पूर्व अपने शिष्यों को सावधान करते हुए उन्होंने कहा था कि तेल मे डूबे हाथ पर जितने तिल चिपकें, यदि उतनी बार भी गोभक्षक यवन कसम खाएं, तो विश्वास मत करना।


पंजाब के ही भैणी साहब (जिला लुधियाना) में 1816 ई. की वसंत पंचमी पर जन्मे गुरु रामसिंह कूका का जीवन भी गोसेवा और गोरक्षा को समर्पित था। बैसाखी मेले में जा रहे उनके शिष्यों ने गोहत्यारे कसाइयों को मौत के घाट उतारा था। अतः अंग्रेज शासन ने 68 कूका वीरों को 17 और 18 जनवरी, 1872 को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ाकर मृत्युदंड दिया था।


18 सितम्बर, 1918 को हरिद्वार के पास ग्राम कटारपुर का प्रसंग भी बहुत प्रेरक है, जब मुस्लिम थानेदार और अंग्रेज प्रशासन की शह पर मुसलमानों ने बकरीद पर सार्वजनिक रूप से गोहत्या करने के लिए गायों का जुलूस निकाला था। इस जुलूस पर महंत रामपुरी के नेतृत्व में हिन्दुओं ने हमला किया और सब गायों को छुड़ा लिया। इस संघर्ष में दोनों ओर के कई लोग मारे गये। 


प्रशासन ने 172 हिन्दुओं को गिरफ्तार किया। वह सभी को प्राणदंड देना चाहता था; पर महामना मदनमोहन मालवीय जी ने हिन्दुओं का मुकदमा लड़ा। आठ अगस्त, 1919 को घोषित निर्णय में चार गोभक्तों को फांसी तथा 135 को आजीवन कारावास की सजा हुई। फागुन शुक्ल दो, 1920 ई. को महंत ब्रह्मदास उदासीन एवं चौधरी जानकीदास को प्रयाग तथा डा. पूर्णप्रसाद एवं श्रीमुख चैहान को लखनऊ जेल में फांसी दी गयी। प्रयाग में गोभक्तों के सम्मान में उस दिन पूर्ण हड़ताल रही। जिन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई थी, उन्हें अंदमान भेज दिया गया। 


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार संघ की स्थापना से पहले और बाद में भी स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय रहे। 1930 में जब वे ‘जंगल सत्याग्रह’ में भाग लेने के लिए अकोला गये, तो वहां एक कसाई को गाय को ले जाता देख वे उसे छुड़ाने के लिए अड़ गये। बाजार के मुसलमानों ने इसका विरोध किया, तो वे वहीं सत्याग्रह करने को तत्पर हो गये। यह देखकर मुसलमान ढीले पड़ गये। अंततः डा. जी ने उचित मूल्य देकर वह गाय छुड़ा ली और एक हिन्दू को सौंप दी।


एक बार गांधी जी ने कहा था कि उनके लिए गोरक्षा का प्रश्न स्वाधीनता से भी बड़ा है; पर उनके शिष्य सत्ता पाकर इसे भूल गये। इतना ही नहीं, तो वे मशीनी कत्लखाने खोलकर गोमांस के व्यापार से विदेशी मुद्रा कमाने लगे; पर गोभक्त भी लोकतांत्रिक विधि से इसके विरोध में डटे हैं। सात नवम्बर, 1966 को दिल्ली में लाखों गोभक्तों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर की गयी गोलीवर्षा में सैकड़ों संन्यासी और अन्य गोभक्त बलिदान हुए। गोरक्षा के लिए विनोबा भावे, महात्मा रामचंद्र वीर, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी निरंजनदेव तीर्थ और आचार्य धर्मेन्द्र के लम्बे अनशन विख्यात हैं। 


20 नवम्बर, 1966 से श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी वृन्दावन में तथा स्वामी निरंजनदेव तीर्थ पुरी में अनशन पर बैठे। दिल्ली निवासी श्री मेहरचंद पाहूजा भी वृन्दावन में ही अनशन पर बैठे थे। उनकी स्थिति क्रमशः खराब होती गयी और कई संतों के आग्रह पर भी उन्होंने अनशन नहीं तोड़ा और 31.12.1966 को प्राण त्याग दिये। 20.11.1966 को ही श्री ऋषिस्वरूप ब्रह्मचारी दिल्ली में यमुना तट पर स्थित ‘धर्मसंघ भवन’ में अनशन पर बैठे और दस दिन बाद 30 नवम्बर को प्राण त्याग दिये। वे स्वामी करपात्री जी तथा शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी के परम भक्त थे।


उ.प्र. में सहारनपुर जिले के ग्राम नगला झंडा के डा. राशिद अली का स्मरण भी यहां समीचीन होगा। वे अवैध रूप से बूचड़खाने ले जाई जा रही गायों को छुड़ा लेते थे। इससे गोहत्यारे नाराज हो गये। उन पर कई बार हमले हुए; पर गोमाता की कृपा से वे हर बार बच गये; लेकिन 20 अक्तूबर, 2003 को जब उन्होंने ग्राम खुजनापुर में काटने के लिए ले जाई जा रही गायों को छुड़ाया, तो गोहत्यारों ने उन पर गोली चला दी, जिससे उनका प्राणान्त हो गया। 


गोरक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले ऐसे महामानवों की एक विशाल मालिका भारत में है। इन ज्ञात और अज्ञात गोभक्तों के चरणों में शत-शत प्रणाम। 

शासन और अनुशासन

चुनाव के इस दौर में सब ओर शासन की ही चर्चा है। कोई वर्तमान शासन को ‘कुशासन’ बताकर उसे बदलना चाहता है, तो कुछ उसे ‘सुशासन’ कहकर बनाये रखने के पक्षधर हैं। कुछ इस व्यवस्था को ही ‘दुःशासन’ मानकर इसे पूरी तरह बदलना चाहते हैं। यद्यपि इसके बदले वे कौन सी व्यवस्था लाएंगे, इसका कोई मानचित्र उनके पास नहीं है। किसी समय दूरदर्शन पर हास्य कलाकार असरानी बिजली के एक बल्ब का विज्ञापन करते हुए कहते थे - सारे घर के बदल डालूंगा। इसी तर्ज पर ये ‘अराजकतावादी’ नेता भी सब कुछ बदलने की बात कह रहे हैं। 

कुछ तमाशेबाज इस बहती गंगा का लाभ लेकर अपने दाम बढ़ा रहे हैं। कुछ चुनाव में खड़े हो गये हैं, तो कुछ ने अपनी निजी दुकानें खोल ली हैं, जिसे वे ‘राजनीतिक दल’ कहते हैं। बेसिर पैर की बातें बोलकर, अपने ही प्रायोजित लोगों से चांटे या मुक्के खाकर, और फिर माफ करके यदि मीडिया में निःशुल्क प्रचार मिले, तो क्या बुरा है ? जैसे विवाह में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबको कमर मटकाने का अधिकार होता है, ऐसे ही लोकतंत्र के इस महापर्व में सबको मनमानी करने का हक है। जनता भी इसका पूरा मजा ले रही है। लोकतंत्र का ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका अनुमान तो सबको है; पर अंतिम रूप से तो यह 16 मई को ही पता लगेगा।

लेकिन शासन की इस होड़ में सब लोग ‘अनुशासन’ को भूल रहे हैं, जिसके बिना कोई भी शासन जनहितकारी नहीं हो पाता। यदि समाज अनुशासित न हो, तो शासन की उपयोगी योजनाएं भी व्यर्थ हो जाती हैं। भारत में यही हो रहा है। इसलिए अरबों-खरबों रु. की देशी-विदेशी सहायता और कर्ज के बावजूद सर्वत्र अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, कामचोरी और विचारहीनता व्याप्त है। 

शासन और अनुशासन में शब्दों का मामूली हेरफेर है; पर उसकी भावना में धरती-आकाश का अंतर है। शासन ऊपर से थोपा जाता है। अतः उसके लिए डंडा जरूरी है, जबकि स्वयंप्रेरित होने के कारण अनुशासन का पालन लोग स्वयं करते हंै। प्राचीन काल में राज्यारोहण के समय राजा गद्दी पर बैठकर तीन बार कहता था, ‘अदंडयोस्मि’ (मुझे कोई दंड नहीं दे सकता। मैं दंड विधान से ऊपर हूं।) इस पर धर्मगुरु एक पलाश की लकड़ी का डंडा उसके सिर से छुआकर तीन बार कहता था, ‘धर्म दंडयोसि’ (धर्म तुम्हें भी दंड दे सकता है।) अर्थात धर्म या नैतिकता की सत्ता (अनुशासन) को राजसत्ता (शासन) से ऊपर माना गया है।

शासन के लिए कठोरता निःसंदेह आवश्यक है। चाणक्य, भीष्म, भृर्तहरि, व्यास और विदुर जैसे प्राचीन विद्वानों ने भी शासन का आधार दंड को माना है। जर्मनी के एकीकरण के पुरोधा बिस्मार्क का कथन है, "--- policy cannot succeed through speeches----& songs; it can only be carried out through blood & iron." 1962 में जब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू चीन के षड्यन्त्रों की ओर से आंखें मूंदे हुए थे, तब हिन्दी काव्य मंचों के सिरमौर गोपाल सिंह ‘नेपाली’ ने लिखा था - 

ओ राही दिल्ली जाना तो कह देना सरकार से 
चरखा चलता हाथों से शासन चलता तलवार से।।

पर जनतंत्र में वोट के माध्यम से प्राप्त राजदंड जब सत्ताधीशों की तानाशाही स्थापित करने का उपकरण बन जाए, तो फिर जनता उसे उलटने में देर भी नहीं लगाती। 1975 के आपातकाल में इंदिरा गांधी, संजय गांधी और उनकी दुष्ट मंडली ने शासन के सब सूत्र अपने हाथ में ले लिये थे। जब राज्य की संचालक तीनों शक्तियां (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) एक व्यक्ति, परिवार या समूह के हाथ में आ जाएं, तो उसे ही ‘तानाशाही’ या ‘फासिज्म’ कहते हैं। ऐसे दिन भारत ने अंगे्रजों के समय में भी नहीं देखे थे। विरोधी पक्ष के नेताओं को जेल में डाल दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे देशभक्त संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सारे देश में श्मशान जैसी शांति छा गयी। जनता भी भयवश चुप बैठ गयी।

यह देखकर इंदिरा गांधी ने गर्वोक्ति करते हुए कहा कि आपातकाल लगने पर कहीं एक कुत्ता भी नहीं भौंका। लोग कार्यालयों में समय से आने लगे हैं। रेलगाडि़यां समय से चलने लगी हैं....आदि। गांधी जी के शिष्य, मौनप्रिय, कांग्रेसी साधु विनोबा भावे ने भी जब मुंह खोला, तो आपातकाल को ‘अनुशासन पर्व’ कहा; पर यह सारा ‘अनुशासन पर्व’ तब धरा रह गया, जब इंदिरा गांधी ने लोकसभा के चुनाव घोषित कर दिये। उनके निजी जासूसों ने उन्हें कहा कि इस समय देश का वातावरण बहुत अच्छा है। अनुशासन की शीतल और सुगंधित बयार सर्वत्र बह रही है। चुनाव में बहुमत पाकर इस निरंकुशता पर जनतंत्र की मोहर लगवायी जा सकती है। इससे विदेशों में हमारी खराब छवि भी ठीक हो जाएगी। जनादेश पाकर विरोधियों का दमन और भी अच्छी तरह से हो सकेगा। राजनीतिक उठापटक में माहिर और परदे के पीछे कूटनीतिक चालबाजी में अत्यन्त शातिर इंदिरा गांधी धोखा खा गयीं और उन्होंने 1977 में लोकसभा के चुनाव घोषित कर दिये। 

इस चुनाव पर दुनिया भर की निगाहें लगीं थीं। अतः विपक्षी नेताओं को जेल से छोड़ना पड़ा। जनता को भी कुछ छूट देनी पड़ी; पर तानाशाही डंडे के कुछ नरम होते ही चुप बैठी जनता ने ‘नृसिंह अवतार’ धारण कर लिया और इंदिरा गांधी चारों खाने चित्त हो गयीं। दक्षिण ने उनकी कुछ लाज बचायी; पर उत्तर प्रदेश में तो उनका एक भी सांसद नहीं जीत सका। इंदिरा गांधी और उनके महान सपूत संजय गांधी, जो उन दिनों असली शासक बने हुए थे, दोनों ही खेत रहे। तानाशाही शासन को ‘अनुशासन’ समझ लेने का कैसा दुष्परिणाम होता है, 1977 के चुनाव इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

आपातकाल के बाद कुछ समय तो सब ठीक चला, फिर ‘हम भारत के लोग’ उसी ढर्रे पर आ गये और वातावरण क्रमशः खराब ही होता गया। कामचोरी और भ्रष्टाचार मानो हमारे खून में मिल गये हैं। लोग सब देखते हुए भी सहने को मजबूर हैं। 

तो क्या भारत के लोग ‘अनुशासनहीन’ हैं ? गहराई से सोचें, तो ऐसा नहीं लगता। वस्तुतः यदि लोगों को लगेगा कि गलत काम करने पर सजा मिलेगी और शीघ्र मिलेगी, तो वे गलती नहीं करेंगे; पर हमारी न्याय प्रणाली नेत्रहीन होने के साथ ही कछुए की पीठ पर भी सवार है। इसलिए लोग निश्चिन्त हैं। हां, पिछले दिनों कुछ बड़े नेता, मंत्री, सरकारी अधिकारी, उद्योगपति और तथाकथित धर्मनेताओं के जेल जाने से कानून का भय कुछ व्याप्त हुआ है। यदि इसकी गति तेज हो जाए, तो शासन व्यवस्था सुधर जाएगी।

लेकिन डंडे के भय से ‘अनुशासन’ नहीं आ सकता। इसके लिए तो बड़े लोगों को अपना उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। ‘महाजनो येन गतः स पंथा’ की बात हमारे ग्रंथों ने कही है। 1965 में पाकिस्तानी आक्रमण के समय हमें अमरीका से गेहूं मंगाना पड़ता था। अमरीका ने पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए भारत को धमकी दी। ऐसे में प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री ने अन्न उपजाने और बचाने का आह्नान किया। उन्होंने लोगों से सप्ताह में एक दिन रात का भोजन छोड़ने को कहा। सबसे पहले उन्होंने स्वयं ऐसा किया, तो पूरे देश ने उनकी बात मानी। उन दिनों सरकारी अधिकारियों की कोठियों के खाली पड़े लाॅनों में भी अन्न उगने लगा था। 

जहां तक समयपालन की बात है, तो यदि कोई राजनीतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम चार बजे है, तो लोग उसे अपने आप ही छह बजे मान लेते हैं। कुछ लोग इसे ‘इंडियन टाइम’ कहकर लांछित भी करते हैं; पर जिन संस्थाओं या धार्मिक स्थलों पर कार्यक्रम समय से होते हैं; जहां चप्पल-जूते पंक्तिबद्ध रखे जाते हैं; जहां निर्धारित वेश में ही जाने और निर्धारित स्थान पर ही बैठने की अनुमति होती है, वहां लोग इसका पालन करते हैं। परीक्षा देने या रेलगाड़ी पकड़ने के लिए लोग समय से पहुंचते ही हैं। अर्थात लोग अनुशासनहीन नहीं हैं; पर खराब माहौल देखकर वे इसी में ढल जाते हैं।

इसलिए यदि अनुशासन लाना है, तो अभिभावक तथा अध्यापक इसका पालन करें। इससे बच्चे स्वयं ही अनुशासित हो जाएंगे। यहां समाचार माध्यमों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। प्रायः वे नकारात्मक समाचारों को अधिक महत्व देते हैं। वे यह तो बताते हैं कि अमुक कार्यक्रम दो घंटे देर से शुरू हुआ; पर जो कार्यक्रम समय से शुरू होते हैं, उनकी बात नहीं होती। विदेश में हम लोग सहर्ष नियमों का पालन करते हैं; पर स्वदेश लौटते ही फिर यहां-वहां कूड़ा डालने लगते हैं; सड़कों पर लालबत्ती पार करने लगते हैं; कार्यालय में देर से आकर जल्दी जाने लगते हैं; और वे सब काम करने लगते हैं, जो अनुशासनहीनता की परिधि में आती हैं। 

स्पष्ट है कि शासन बाहरी चीज है और अनुशासन भीतरी। शासक अपने सद्व्यवहार से लोगों को अनुशासित कर सकते हैं और अनुशासित लोग अपने तप से शासन को नियन्त्रित कर सकते हैं। परस्पर पूरक और एक सिक्के के दो पहलू जैसे होने के कारण आवश्यकता दोनों की है। 

इस दृष्टि से देखें, तो जहां वर्ष 2014 का मई मास नये शासन की ओर बढ़ रहा है, वहां 10 मई, 1857 का प्रसंग वीरता और देशप्रेम के उद्रेक के साथ किंचित अनुशासनहीनता की भी याद दिलाता है। यदि मेरठ छावनी के भारतीय सैनिक कुछ दिन और धैर्य रख लेते, तो स्वाधीनता का सूर्य हम 90 वर्ष पूर्व ही देख लेते; पर इतिहास तो अपनी गति से चलता है। वह किन्तु-परन्तु नहीं जानता। हां, भविष्य हमारे अपने हाथ में ही है। हम चाहें, तो उसे स्वयंप्रेरित अनुशासन से युक्त समर्थ शासन में जरूर बदल सकते हैं।

, 3 जनवरी 2014

विवेकानंद सार्धशती का समापन : विवेकानंद की प्रासंगिकता

व्यक्ति का इस धरा धाम पर आना और जाना सृष्टि का सनातन नियम है। जब से जगत नियन्ता ने इस सृष्टि का निर्माण किया, न जाने कितने लोग आये और अपना निर्धारित समय पूरा कर काल के गाल में समा गये; पर इतिहास उनमें से कुछ को ही याद करता है। स्वामी विवेकानंद उनमें से ही एक हैं।

ऐसा कहते हैं कि कुछ लोग जन्म से ही महान होते हैं। कुछ लोग अपने परिश्रम से महानता अर्जित करते हैं और कुछ पर महानता थोप दी जाती है; पर इतिहास की चक्की बहुत महीन पीसती है। जिन पर महानता थोप दी जाती है, वे तभी तक सुर्खियों में रहते हैं, जब तक उनके परिजन या उनसे वैध-अवैध रूप से लाभान्वित हुए लोग सत्ता में रहते हैं। जैसे ही उनके हाथ से सत्ता छूटती है, वे तथाकथित महान लोग भी काल के प्रवाह में तिरोहित हो जाते हैं।

पर जो लोग जन्म से महान होते हैं या जिन्होंने परिश्रम से महानता अर्जित की होती है, उन्हें याद रखना इतिहास की भी मजबूरी होती है। या यों कहें कि उन्हें याद किये बिना इतिहास की गाथा भी अधूरी रहती है। यहां एक श्रेष्ठ विचारक व राजनेता डा. राममनोहर लोहिया की बात याद आती है। उन्होंने कहा था कि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के 300 साल बाद तक उसके नाम पर कोई सरकारी आयोजन नहीं होना चाहिए। यदि उसके नाम और काम में तेजस्विता है, तो इतने वर्ष बाद भी वह जनता के मन-मस्तिष्क से ओझल नहीं होगा। इतिहास उसके व्यक्तित्व को अपनी बाहों में समेट कर स्वयं गौरव का अनुभव करेगा; पर यदि व्यक्ति के नाम और काम में दम नहीं है, तो लोग उसे भूल जाएंगे।

इतिहास पर यदि दृष्टि डालें तो श्रीराम और श्रीकृष्ण के नाम पर भारत ही नहीं, तो विश्व भर में लाखों नगर, गांव, मोहल्ले और कालोनियां हैं। हर दस में से एक व्यक्ति के नाम में भी राम और कृष्ण या उनका कोई पर्यायवाची शब्द मिल जाएगा। इसके लिए कभी किसी सरकार ने दबाव नहीं डाला; पर श्रीराम, श्रीकृष्ण, महावीर, गौतम, नानक... आदि महामानवों के नाम दुनिया भर के मानस पटल पर स्थायी रूप से अंकित है।

पर इसका एक दूसरा पक्ष भी है। और वह यह कि भारत में कुछ नाम केवल सरकारी योजनाओं में ही जीवित हैं। नागरिकों के धन से चल रही योजनाओं में से अधिकांश एक विशेष परिवार को ही समर्पित कर दी गयी हैं। जैसे रावण, हिरण्यकशिपु या कंस.. आदि राक्षस किसी और का नाम सुनना पसंद नहीं करते थे, कुछ ऐसा ही हाल इस राजनीतिक परिवार का भी है। 

इतिहास गवाह है कि हजारों लोगों ने स्वाधीनता के लिए हंसते हुए फांसी का फंदा चूमा। इससे कई गुना लोग अंग्रेज शासन की लाठी और गोली से मारे गये। इससे भी कई गुना लोगों ने जेल की यातनाएं सहीं; पर इनके नाम पर कोई शासकीय योजना नहीं चलाई जाती। ऐसा क्यों है, इसका उत्तर ऊपर दिया जा चुका है। 

कहते हैं कि बड़े लोगों की तुलना नहीं करनी चाहिए; पर निम्न उदाहरण से संदर्भित बात स्पष्ट हो सकेगी।

1989 में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार की जन्मशती मनायी गयी। नेहरू जी के शताब्दी कार्यक्रमों में केन्द्र और राज्य सरकारों ने करोड़ों रुपया खर्च किया। उसके बल पर हर राज्य में सभाएं, विचार गोष्ठियां, विद्यालयों में खेलकूद और वाद-विवाद प्रतियोगिताएं तथा अन्य अनेक प्रकार के आयोजन हुए। देश की सभी पत्र-पत्रिकाओं में बड़े-बड़े विज्ञापन भी दिये गये; लेकिन सरकारी प्रयासों के बावजूद जनता इन कार्यक्रमों से दूर ही रही। 

दूसरी ओर डा. हेडगेवार की जन्मशती संघ के स्वयंसेवकों ने जनता के सहयोग से मनायी। केन्द्र और प्रांत से लेकर जिला, नगर और विकास खंड तक इसके लिए समितियां बनायी गयीं। इस प्रकार एक लाख समितियों में लगभग 10 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से जुड़े। इनके आधार पर हुए कार्यक्रमों में लगभग एक करोड़ लोगों की सहभागिता हुई। दीवार लेखन, भित्तिपत्र (पोस्टर), छोटे पत्रकों आदि से देश भर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और डा. हेडगेवार का नाम गूंजने लगा। इससे सरकार के भी कान खड़े हो गये। स्वयंसेवकों ने समाज से जो ‘सेवा निधि’ एकत्र की, उससे निर्धन बस्तियों में सेवा के छोटे-छोटे हजारों काम प्रारम्भ किये, जिनकी संख्या अब लगभग एक लाख तक पहुंच गयी है। 

विवेकानंद सार्धशती आयोजनों में भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। इसका आयोजन जहां एक ओर संघ ने अपने नाम का मोह न करते हुए समाज के सभी वर्गों के सहयोग से किया है, वहीं दूसरी ओर अनेक संस्थाओं ने अपने बैनर पर इसके कार्यक्रम किये हैं। शासन ने भी इसके लिए एक समिति बनाकर कुछ प्रयास किये हैं। 

‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ विवेकानंद का प्रिय वाक्य था; पर सोनिया मैडम के नेतृत्व वाली केन्द्र की घोर हिन्दू विरोधी सरकार को भी विवेकानंद को मान्यता देनी पड़ी है। यह हिन्दुत्व के बढ़ते हुए ज्वार का ही प्रतिफल है। मैडम जी इन आयोजनों के माध्यम से उस ज्वार का कुछ हिस्सा अपनी झोली में समेटना चाहती हंै। यद्यपि उनका यह प्रयास सफल तो नहीं होगा; पर इससे स्वामी विवेकानंद और उनके विचारों की प्रासंगिकता जरूर स्पष्ट हो जाती है।

स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व स्वयं में महान है। उन पर राजाओं या वंशवादी राजनेताओं की तरह महानता थोपी नहीं गयी। यह प्रश्न  निरर्थक है कि यदि श्री रामकृष्ण परमहंस से उनकी भेंट न होती, तो  क्या होता ? तब भी वे किसी न किसी क्षेत्र में अपनी महानता अवश्य सिद्ध करते; पर हिन्दुओं और हिन्दुस्थान के भाग्य से उनके जीवन में श्री रामकृष्ण आये, जिन्होंने उनकी सुप्त शक्तियों को पहचान कर उन्हें जाग्रत किया और उनके जीवन की दिशा को अध्यात्म और सेवा के मार्ग से विश्व कल्याण की ओर परिवर्तित कर दिया।

विवेकानंद सार्धशती के दौरान शायद ही कोई पत्र-पत्रिका हो, जिसने उन पर विशेष सामग्री प्रकाशित न की हो। हर भाषा में हजारों लेख, कहानियां, नाटक, चित्र कथाएं, प्रेरक प्रसंग आदि लिखे गये हैं। सैकड़ों पुस्तकें भी इस अवसर पर प्रकाशित हुई हैं। भाषण और गोष्ठियों आदि की तो गणना ही नहीं है। रेडियो और दूरदर्शन ने भी विशेष कार्यक्रम प्रसारित किये हैं। 

इन सबके द्वारा जिन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचार सागर में गोते लगाये हैं, उन्होंने स्वयं को ही धन्य किया है। उनमें से यदि कोई यह दावा करे कि उसने विवेकानंद को पूरी तरह समझ लिया है, तो यह उसकी भूल ही होगी। ‘पूर्णमदः पूर्णमिदम्’ की तरह रत्नाकर से चाहे जितने रत्न निकाल लें; पर फिर भी वह पूर्ण ही रहता है। ऐसा ही विवेकांनद का व्यक्तित्व है।   

प्रंसगवश एक और बात का उल्लेख यहां उचित होगा। विवेकानंद का बचपन का नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। कौन जानता था कि यह नरेन्द्र एक दिन हिन्दू और हिन्दुस्थान की विजय पताका विश्वाकाश में फहराएगा ? ऐसे ही एक और नरेन्द्र (मोदी) के निनाद से इन दिनों भारत की धरती और गगन गूंज रहा है। पिछले दिनों सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों ने भी इसकी पुष्टि कर दी है। 

यदि एक और दृष्टि से देखें, तो वह नरेन्द्र भारत के पूर्वी समुद्र को छूती बंगाल की धरती पर जन्मा था और वर्तमान नरेन्द्र का जन्म पश्चिमी समुद्र का आलिंगन करने वाले गुजरात राज्य में हुआ है। स्वामी जी ने पहले सात समुद्र पार किये और वहां से उनकी प्रसिद्धि लौटकर भारत आयी; पर वर्तमान नरेन्द्र की प्रसिद्धि और धमक उनके समुद्र पार करने से पहले ही वहां पहुंच गयी है। 

विवेकानंद ने अपने अनुभव के आधार पर एक बार कहा था कि किसी भी व्यक्ति या विचार को उपेक्षा, विरोध और समर्थन की प्रक्रिया से निकलना पड़ता है। उनका विरोध केवल विदेशियों ने ही नहीं, तो उनके अपने लोगों ने भी किया था। यही स्थिति वर्तमान नरेन्द्र की भी है; पर जैसे उन नरेन्द्र ने सभी बाधाओं को पार किया, ऐसे ही यह नरेन्द्र भी सब अंतर्बाह्य चुनौतियों को पार कर लेंगे, यह विश्वास भारत भर के देशभक्तों में जग रहा है। अब तक लोग उनकी उपेक्षा करते थे; पर अब विरोध करने लगे हैं। आशा है यह विरोध शीघ्र ही समर्थन से होता हुआ समर्पण तक पहुंच जाएगा।

स्वामी जी के विचार कालजयी हैं। युगद्रष्टा होने के नाते उनमें अपने समय से बहुत आगे देखने की क्षमता थी। उन्होंने 1897 में विदेश से लौटकर अगले 50 वर्ष तक केवल और केवल भारत माता को ही अपना आराध्य बनाने का आह्नान किया था। उन्होंने अपनी आंखों से भारतमाता को जगन्माता के रूप में स्वर्ण सिंहासन पर बैठे हुए भी देखा था। उनके पहले स्वप्न की पूर्ति, अर्थात 1947 में प्राप्त स्वाधीनता हमारे पूर्वजों की पुण्यायी का सुफल है; पर अगले स्वप्न को पूरा करने की जिम्मेदारी हमारी पीढ़ी पर है।

स्वामी जी के सार्धशती वर्ष (2014) में यह सुपरिणाम सब देख सकें, तो इससे अच्छा और क्या होगा ? उनके संदेश ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’ (उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको) को यदि सबने समझा और उसे पूर्ण करने में अपनी शक्ति लगायी, तो फिर सर्वत्र ‘विजय ही विजय’ में कोई संदेह नहीं है। क्योंकि इसका आश्वासन भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं श्रीमद् भगवत्गीता में दिया है -

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
तत्र श्रीर्विजयो भूतिधु्र्रवा नीतिर्मतिर्मम।।18/78।।

(जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण और गांडीवधारी अर्जुन हैं, वहां पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति का होना भी निश्चित है।)

आलेख : भरत के अल्पसंख्यक वंशज

पिछले दिनों हिन्दुओं की सशक्त आर्थिक भुजा (जैन समाज) को केन्द्र सरकार ने ‘अल्पसंख्यक’ घोषित किया है। इससे पूर्व भारत की ‘खड्ग भुजा’ के प्रतीक सिख और अध्यात्म व समरसता के संदेशवाहक बौद्ध भी अल्पसंख्यक घोषित हो चुके हैं। इसके लाभ-हानि को विचारे बिना एक भेड़चाल के रूप में अब जैन समाज भी इस अंधेरे मार्ग पर बढ़ गया है। 

वस्तुतः अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की धारणा का संबंध धर्म से नहीं मजहब से है। जब इस्लाम और ईसाई मत के अनुयायी दुनिया भर में गये, तो उन्होंने बंदूक और तलवार के बल पर वहां के स्थानीय लोगों का व्यापक नरसंहार किया। प्राणभय से अधिकांश लोगों ने उनका मजहब स्वीकार कर लिया; पर कुछ लोगों ने भयानक अत्याचार सहे। वे वन और पर्वतों में छिप गये या फिर कई तरह के घृणित कर्म स्वीकार किये; पर अपना धर्म नहीं छोड़ा।

जिन देशों में इस्लाम प्रभावी है, वहां ऐसे अत्याचार आज भी जारी हैं; पर ईसाई देशों में जब शिक्षा का विस्तार और लोकतंत्र का विकास हुआ, तो कुछ समझदार लोगों के आग्रह पर वहां के अल्पसंख्यक हो चुके मूल निवासियों की भाषा, बोली, संस्कृति और रीति-रिवाजों की सुरक्षा की जाने लगी; पर भारत के संदर्भ में यह बात गलत है। 

जब इस्लाम यहां आया, तो उसने अपनी क्रूर परम्परा के अनुसार नरसंहार करते हुए हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया। यद्यपि भारतीय व्यवस्था राजा केन्द्रित न होने के कारण सैकड़ों वर्ष में भी पूरा देश मुसलमान नहीं बना। इसके बाद दो चरणों में ईसाई आये। पहले तो वे धर्म प्रचार के लिए दक्षिण तथा पूर्वोत्तर भारत में आये। यहां उन्होंने भी छल और बल से धर्मान्तरण किया। दूसरी बार वे व्यापार के लिए आये और फिर भारत पर कब्जा कर लिया। इस बार उन्होंने भारतीय व्यवस्थाओं को तोड़कर शिक्षा और शासन सम्बन्धी अपनी व्यवस्थाएं थोपीं। इससे शिक्षित और सम्पन्न लोगों के मन में भारतीय व्यवस्था के प्रति घृणा उत्पन्न हो गयी और वे विदेशी ईसाइयों की बातों को ही प्रमाण मानने लगे।

इन अंग्रेजों का मूल उद्देश्य तो भारत को ईसाई बनाना ही था। अतः उन्होंने हिन्दू समाज को टुकड़ों में बांटने का षड्यंत्र रचा। सबसे पहले उन्होंने वन और पर्वतों में रहने वालों को ‘आदिवासी’ कहकर हिन्दुओं से काट दिया। इसके बाद उन वीर हिन्दुओं को पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित जैसी संज्ञाएं दीं, जिन्होंने विदेशी और विधर्मियों से टक्कर ली थी।

भारत में सदा से ‘एकम् सत्, विप्राः बहुधा वदन्ति’ (सत्य एक है; पर विद्वान उसे अलग-अलग तरह से कहते हैं) की मान्यता है। अतः हिन्दू धर्म के अन्तर्गत जैन, बौद्ध, सिख, शैव, वैष्णव, कबीरपंथी, आर्य समाज, ब्रह्म समाज आदि अनेक पंथ, मत और सम्प्रदाय बने। क्रमशः इन पंथों में भी अनेक उपपंथ बने। यह प्रक्रिया आज भी जारी है। नये पत्तों का आना और पुरानों का जाना पेड़ के जीवन का सूचक है, मृत्यु का नहीं। जैसे दस-बीस लोटे पानी डालने या निकालने से समुद्र को कुछ नहीं होता, ऐसे ही हजारों मत-पंथों के उदय और अस्त होने से हिन्दू धर्म के प्रवाह में कोई अंतर नहीं आया।

मुस्लिम शासक तो हिन्दुओं से या फिर आपस में ही लड़ने में व्यस्त रहे। इसलिए धर्मान्तरण के बावजूद वे हिन्दुओं को विभाजित नहीं कर सके; पर अंग्रेजों ने षड्यन्त्रपूर्वक लोगों को भाषा, भूषा, बोली, जाति, उपजाति, क्षेत्र आदि के आधार पर बांट दिया। हिन्दू और मुसलमानों के बीच विभाजन और भयानक मजहबी दंगों के कारण उन्हें फिर देश को ही बांटने में सफलता मिल गयी।

1947 में स्वाधीन होने पर भी ये षड्यंत्र चालू रहे, चूंकि सत्ताधीश लोग अंग्रेजों के ही मानसपुत्र थे। उन्होंने थोक मुस्लिम वोटों के लिए अल्पसंख्यकवाद को पुनर्जीवित कर दिया। इससे चुनाव में सफलता मिलने पर बाकी दलों के भी कान खड़े हो गये। इस प्रकार ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ की एक अंधी दौड़ प्रारम्भ हो गयी। नौकरी में आरक्षण से लेकर मदरसों को सहायता, इमामों को वेतन और आतंकियों के प्रति हमदर्दी जैसी छूट दी जाने लगीं। यद्यपि इसकी मलाई मजहबी नेता और उच्च जाति के मुसलमान ही खा रहे हैं। इसलिए अब निर्धन और पसमांदा (पिछड़े) मुसलमान इसके विरुद्ध लामबंद हो रहे हैं। 

भारत में पारसी और यहूदियों के पूर्वज बाहर से आये थे। इस नाते वे यहां अल्पसंख्यक हैं, जबकि 99 प्रतिशत मुसलमान और ईसाई रक्त और वंश से यहीं के हैं। उनके पूर्वजों ने किसी डर, लालच या अज्ञानवश धर्म बदल लिया था। कई जगह उनके गोत्र और परम्पराएं हिन्दुओं जैसी ही हैं; फिर भी वे स्वयं को अल्पसंख्यक कहते हैं। दूसरी ओर पारसी और यहूदी भारतीय दूध में चीनी की तरह घुल गये हैं। देश की उन्नति में उनका भरपूर योगदान है। अनेक बड़े उद्योगपति, प्रशासक, वकील, शिक्षाविद आदि इन वर्गों से हुए हैं, जिन पर देश को गर्व है।

जहां तक जैन समाज की बात है, शेष हिन्दुओं से उनके रोटी-बेटी के संबंध हैं। उत्तर भारत के जैन मुख्यतः वैश्य हैं, जबकि राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात तथा दक्षिण में ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा अनेक वनवासी वर्ग के लोग भी जैन मतावलम्बी हैं। अहिंसक होने के कारण इन्होंने सेना की बजाय खेती और व्यापार को अपनाया। इसीलिए ये सम्पन्न भी हैं। अलग वंश या रक्त समूह न होने के कारण अधिकांश जैनियों के गोत्र व उपनाम आदि पूर्ववत ही हैं। वे होली, दीवाली जैसे हिन्दू पर्व भी मनाते हैं। आगे चलकर पूजा पद्धति में कुछ अंतर के चलते यहां भी श्वेताम्बर, दिगम्बर, स्थानकवासी, मूर्तिपूजक, तेरापंथी आदि कई उपशाखाएं बनीं। फिर भी ये सब जैन और हिन्दू ही हैं।

पिछले कुछ समय से अल्पसंख्यक के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण होता देख इनके मुंह में भी पानी आ गया है। अल्पसंख्यक संस्थाओं को सरकार पैसा तो देती है; पर उनके संचालन में हस्तक्षेप नहीं करती। यद्यपि इस कारण प्रबन्धकों द्वारा कर्मचारियों का खूब शोषण भी होता है। एक समय आर्य समाज और रामकृष्ण मिशन ने भी स्वयं को अल्पसंख्यक घोषित करने की मांग की थी। अल्पसंख्यक के नाम पर नौकरी में कुछ आरक्षण भी मिलता है। सिख और बौद्ध यह लाभ ले रहे हैं। प्रायः व्यापारी होने से जैनियों को नौकरी की चाह तो नहीं है; पर वे अपनी संस्थाओं में सरकारी हस्तक्षेप नहीं चाहते। इसीलिए कुछ लोगों ने यह मुहिम चलायी है।

जनगणना के समय ऐसे लोग जैन मंदिर और मोहल्लों में जाकर कहते हैं कि वे अपना धर्म जैन लिखाएं, हिन्दू नहीं। लोकसभा चुनाव निकट देख कुछ लोगों ने राहुल बाबा को समझा दिया कि यह मांग मानने से उन्हें कुछ लाख वोट और कई करोड़ नोट मिल जाएंगे। बस, उन्होंने प्रधानमंत्री से कहकर इसकी घोषणा करा दी। अब जैन समाज के ही प्रबुद्ध लोग यह पूछ रहे हैं कि जो दस-बीस राजनेता, उद्योगपति या संत वहां गये थे, उन्हें जैनियों का प्रतिनिधि किसने और कब बनाया, यह भी पता लगना चाहिए।

कुछ को यह शिकायत रही है कि जैनियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में संसद या विधानसभाओं में स्थान नहीं मिलते; पर वे भूलते हैं कि पहले इन सदनों में उनकी संख्या खूब रहती थी। समाजसेवी होने से सभी दल उन्हें टिकट देते थे। हां, उनके गोत्र हिन्दुओं जैसे होने के कारण पता नहीं लगता था कि वे जैन हैं; पर ‘हम हिन्दू नहीं, जैन हैं’ के नारे से हिन्दुओं के मन में भी कटुता बढ़ी है और उनकी संख्या लगातार घट रही है। निःसंदेह अब यह और घटेगी।

कुछ लोग कहते हैं कि अल्पसंख्यक होने से जैन मंदिरों की सुरक्षा होगी तथा जैन युवाओं को आगे बढ़ने के अवसर मिलेंगे। वस्तुतः उन पर हमले हर जगह मुसलमान और उनकी रक्षा हिन्दू ही करते हैं। नौकरी या शिक्षा में किसी जैन बच्चे का हक कभी नहीं मारा गया। हां, प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल होने पर भी अपने पैसे के बल पर निजी संस्थानों में ऐसे मूर्ख छात्र खूब पाये जाते हैं। 

एक प्रसिद्ध बंगला कवि मधुसूदन दत्त अंग्रेजी शिक्षा, रहन-सहन तथा एक लड़की के चक्कर में फंसकर ईसाई हो गये और अपने नाम से पहले माइकेल लगा लिया। जब श्री रामकृष्ण परमहंस ने पूछा, तो उसने कहा कि इसमें मेरा कुछ स्वार्थ था। इस पर परमहंस जी ने मुंह फेर लिया और कहा अपने स्वार्थ के लिए धर्म छोड़ने वाले का मुंह देखना भी पाप है। ऐसे ही कुछ जैनियों का स्वार्थ पूरे समाज को शेष हिन्दुओं की आंखों में नीचे गिराने पर तुला है।

जैसे वटवृक्ष की डालियों से फूटी जड़ें धरती में जम कर वृक्ष का पोषण करती हैं, ऐसे ही हिन्दू धर्म के सैकड़ों मत, पंथ, सम्प्रदाय आदि भी एक-दूसरे को पोषित करते हुए परस्पर सहारे का काम करते हैं; पर कुछ मूढ़ यह व्यवस्था बिगाड़ने पर तुले हैं। हिमालय से हजारों नदी, नाले और झरने निकलते हैं। अपना अस्तित्व अलग रखने पर उन्हें कोई नहीं पूछता; पर गंगा में मिलते ही वे स्वयं भी गंगा हो जाते हैं। हर नदी गंगा से मिलकर गंगासागर पहुंचती है; पर कुछ लोग गंगा में से अपनी धारा को वापस लेना चाहते हैं।

भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत के कारण हमारे देश का नाम भारत पड़ा है। यह कैसी उलटबासी है कि उनके वंशज खुद को अल्पसंख्यक कह रहे हैं। इस निर्णय से अधिकांश जैन लोग दुखी हैं। उन्हें एकजुट होकर ऐसे नेताओं का विरोध और बहिष्कार करना होगा, जिन्होंने उन्हें लाखों वर्ष की परम्परा से काटकर कुछ सौ वर्ष पुराने मुसलमान और ईसाई मजहब के साथ ला खड़ा किया है। जैसे थोड़े से आरक्षण और सरकारी सुविधा के लिए मुसलमानों में जाति, भाषा और फिरकों के नाम पर विवाद बढ़ रहे हैं, ऐसा ही अब यहां भी होगा।

इसलिए बीमारी जहां से पैदा हुई है, वहीं उसे नष्ट करना होगा।  किसी भी समाज का भला उसकी आंतरिक इच्छाशक्ति से ही होता है। मुसलमानों की अशिक्षा, गरीबी और जहालत का कारण यही है कि वे स्वयं आगे बढ़ना नहीं चाहते। इस कारण उन्हें नेता भी ऐसे ही मिलते हैं। क्या जैन समाज भी अब इसी मार्ग पर बढ़ेगा, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय चरित्र


पिछले दिनों अमरीका में ‘कश्मीर अमेरिकन सेंटर’ चलाने वाले डा0 गुलाम नबी फई तथा उसका एक साथी पकड़े गये हैं, जो कुख्यात पाकिस्तानी संस्था आई.एस.आई के धन से अवैध रूप से सांसदों एवं अन्य प्रभावी लोगों से मिलकर कश्मीर पर पाकिस्तान के पक्ष को पुष्ट करने का प्रयास (लाबिंग) करते थे। 


इसके लिए वे गोष्ठी, सेमिनार, सम्मेलन आदि आयोजित कर उसमें भारत से भी बुद्धिजीवी, पत्रकार, लेखक आदि को बुलाते थे। वे समाचार पत्रों में लेख लिखते और लिखवाते थे। इसीलिए उनकी गिरफ्तारी पर पाकिस्तान ने रोष व्यक्त किया है।


फई की गिरफ्तारी के बाद कई नाम सामने आये हैं, जिन्हें उसने समय-समय पर भारत से बुलाया था। इनमें प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे, वरिष्ठ पत्रकार एवं गृह मंत्रालय की कश्मीर पर बनी आधिकारिक समिति के अध्यक्ष दिलीप पडगांवकर, बहुचर्चित सच्चर समिति के अध्यक्ष अवकाश प्राप्त न्यायाधीश राजेन्द्र सच्चर, कश्मीर टाइम्स के संपादक वेद भसीन, हेडलाइन्स टुडे के संपादक हरिंदर बवेजा, मानवाधिकार के नाम पर आतंकियों के अधिकारों के पैरोकार गौतम नवलखा, कमल चिन१य, प्रफुल्ल बिदवई, रीता मनचंदा, नक्सलियों का हमदर्द अग्निवेश, पाकिस्तान परस्त लेखक कुलदीप नैयर, बुकर पुरस्कार विजेता अरुन्धति राय, अंगना चटर्जी, संदीप पांडेय, अखिला रमन, मीरवाइज उमर फारुख एवं यासीन मलिक आदि शामिल हैं। आश्चर्यजनक रूप से इनमें सुब्रह्मण्यम स्वामी का नाम भी है। इस सूची के नाम लगातार बढ़ रहे हैं। 


यद्यपि इनमें से अनेक ने स्पष्टीकरण दिये हैं। हरीश खरे ने समाचार को नकारते हुए समाचार पत्र को कानूनी नोटिस दिया है। दिलीप पडगांवकर के अनुसार उन्हें फई के पाकिस्तानी संबंधों का पता नहीं था। कुलदीप नैयर ने कहा है कि जिस सम्मेलन में वे गये थे, वहां पाकिस्तान के लोग भी थे तथा सबने स्वतंत्रतापूर्वक अपनी बात कही थी। सुब्रह्ममण्यम स्वामी ने कहा है कि वे भारतीय दूतावास की सलाह पर वहां गये थे तथा भारतीय दूतावास के एक कर्मचारी ने उनके भाषण के नोट्स भी बनाये थे। 


स्पष्टीकरण चाहे जो हों; पर इस सूची में अधिकांश लोग सेकुलर बिरादरी के घोषित चेहरे हैं, जो देश में हिन्दू और भारत विरोध का जहर फैला रहे हैं। अब फई की गिरफ्तारी से यह भी सिद्ध हो गया है कि इनके आवास, प्रवास एवं आतिथ्य का प्रबंध कौन करता था ? यह प्रकरण हमें व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र पर विचार करने को भी विवश करता है। 


भारत में छात्र जीवन में ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थ जीवन में निष्ठापूर्वक एक पति या पत्नीव्रत का पालन करने वाले को लोग चरित्रवान मानते हैं। दूसरी ओर रिश्वतबाज, मिलावटखोर, टैक्सचोर, लुटेरे या हत्यारे को व्यक्तिगत चरित्र की दृष्टि से खराब नहीं माना जाता। जयप्रकाश जी ने चंबल के जिन डाकुओं का आत्मसमर्पण कराया था, उनमें से एक ने अपना उज्जवल चरित्र बखानते हुए कहा था कि उसने हत्या तो कीं; पर न तो कभी किसी महिला को हाथ लगाया और न ही किसी छोटी जाति वाले के हाथ से पानी पिया। 


भारत में 99 प्रतिशत लोग व्यक्तिगत रूप से चरित्रवान ही होते हैं। यद्यपि अब पश्चिमी प्रभाव, गंदे दूरदर्शनी कार्यक्रम और फिल्मों के कारण सार्वजनिक रूप से लिपटना, चूमाचाटी तथा समलैंगिकता आदि को भी धीरे-धीरे मान्यता मिल रही है।


दूसरी ओर राष्ट्रीय चरित्र को देखें, तो दुख के साथ कहना पड़ता है कि मुगल, तुर्क, पुर्तगाली, डच, अंग्रेज आदि का साथ मानसिंह, जयचंद या मिर्जा राजा जयसिंह जैसे हमारे पूर्वजों ने ही दिया था। यों तो ये सब बड़े पूजापाठी थे; पर अपने प्रतिद्वन्द्वी हिन्दू राजा को हराने के लिए विदेशी तथा विधर्मियों का साथ देने में इन्हें संकोच नहीं हुआ। अंग्रेजों ने सेना में भारतीयों को लेने के साथ आई.सी.एस के नाम पर सर्वश्रेष्ठ बुद्धिजीवियों को अपना राज्य सुदृढ़ करने में लगा दिया। पहला और दूसरा विश्वयुद्ध अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों के बल पर ही जीता था। 


इस संदर्भ में जवाहरलाल नेहरू और लेडी माउंटबेटन के चर्चित संबंधों को देखें। कहते हैं कि गांधी जी विभाजन नहीं चाहते थे; पर अंग्रेज भारत को बांटकर कमजोर करना चाहते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मित्र देशों ने जर्मनी को बांटकर भी ऐसा ही किया था। अंग्रेजों की सोच यह थी कि भारत और पाकिस्तान लड़ते रहेंगे और इससे उनके हित सदा पूरे होते रहेंगे। उनका यह चिंतन कितना सत्य सिद्ध हुआ, यह किसी से छिपा नहीं है।


इसके लिए उन्होंने अधिकार और सत्ताप्रेमी नेहरू पर दांव लगाया। अंग्रेज उसके व्यक्तिगत चरित्र की दुर्बलता जानते थे। अतः माउंटबेटन ने अपनी पत्नी की नेहरू से मित्रता करा दी। इससे नेहरू उसके रंग में रंग कर विभाजन को तैयार हो गये। उनके कहने पर ही नेहरू कश्मीर समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गये, जिससे वह आज तक गले में हड्डी की तरह अटका है।


इस प्रसंग पर विचार करें, तो माउंटबेटन दम्पति का व्यक्तिगत चरित्र खराब कहा जाएगा; पर उन्होंने देशहित में यह लांछन स्वीकार किया। अर्थात उनका राष्ट्रीय चरित्र बहुत उज्जवल था, जबकि नेहरू दोनों कसौटियों पर घटिया सिद्ध हुए। 


पश्चिमी देशों में बहुत खुलापन होने से व्यक्तिगत चरित्र पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। विवाह पूर्व शारीरिक संबध, तलाक तथा कई बार पति या पत्नी बदलना, किशोरावस्था में मां-बाप बनना वहां आम बात है; पर उनका राष्ट्रीय चरित्र अनुकरणीय है। 


यहां अमरीका के दो प्रसंगों की चर्चा उचित होगी। राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन पर वाटरगेट कांड में दूसरों के फोन टेप करने के आरोप लगे थे। अमरीका में लोकतंत्र एवं वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहुत महत्व दिया जाता है। निक्सन ने इस मर्यादा को भंग किया था, अतः उन्हें महाभियोग का सामना कर त्यागपत्र देना पड़ा। इसी प्रकार राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पर उनके कार्यालय की एक कर्मचारी मोनिका लेंविस्की से अवैध संबंध बनाने पर महाभियोग चला। क्लिंटन द्वारा अपराध मान लेने पर न्यायालय ने उन्हें त्यागपत्र देने पर विवश नहीं किया और उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया।


व्यक्तिगत चरित्र अच्छा होने पर भी निक्सन के दुष्कर्म से अमरीका का राष्ट्रीय चरित्र लांछित हुआ, अतः उन्हें पद छोड़ना पड़ा, जबकि क्लिंटन का मामला व्यक्तिगत चरित्र का था, अतः उन्हें शासन ने ही नहीं, उसकी पत्नी और बेटी ने भी क्षमा कर दिया। 


अमरीका में पिछले राष्ट्रपति चुनाव से पूर्व वहां की व्यवस्था के अनुसार पार्टी के अंदर प्रत्याशी बनने के लिए हिलेरी क्लिंटन और ओबामा में कांटे की टक्कर हुई। इसमें ओबामा को सफलता मिली। इसके बाद वे राष्ट्रपति निर्वाचित हुए और उन्होंने पुरानी प्रतिद्वंद्विता को भुलाकर हिलेरी क्लिंटन को विदेश मंत्री बना दिया। पिछले राष्ट्रपति बुश के साथ काम कर रहे रक्षामंत्री राबर्ट गेट्स ने भी ओबामा के आग्रह पर फिर से वही पद संभाल लिया। 


ब्रिटेन में क्लीमेंट एटली के प्रधानमंत्री काल में विपक्षी नेता चर्चिल का अमरीका प्रवास हुआ। वहां पत्रकारों ने शासकीय नीति के बारे में उनसे तीखे प्रश्न पूछे। चर्चिल ने एटली की नीति का समर्थन यह कहकर किया कि मैं अपने देश में विपक्ष का नेता हूं; पर बाहर ब्रिटेन का प्रतिनिधि हूूं। ऐसा ही प्रसंग इंदिरा गांधी के शासनकाल में विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी के विदेश प्रवास का भी है। दूसरी ओर रामविलास पासवान तथा तीस्ता (जावेद) सीतलवाड़ जैसे भ्रष्ट लोग हैं, जो गोधरा कांड के बाद हुई प्रतिक्रिया को वैश्विक मुद्दा बनाकर नरेन्द्र मोदी और देश की बदनामी करते हैं।


1977 में अटल जी के विदेश मंत्री बनने पर शासन की ओर से चीन से संबंध सुधारने का प्रयास कर रहे श्री करंजिया अपना त्यागपत्र लेकर अटल जी के पास आये। अटल जी ने उनसे कहा कि आप जो काम कर रहे हैं, उसका दलीय निष्ठा से कोई संबंध नहीं है, अतः उसे पूर्ववत करते रहें। पर भारत में ऐसे राष्ट्रीय चारि×य एवं उदार हृदयता के उदाहरण बहुत कम हैं। यहां राष्ट्रीय और राष्ट्रवादी कहे जाने वाले दल वालों का छोटी सी बात पर लड़ना तथा सत्ता सुख के लिए रातोंरात पाला बदलना किसने नहीं देखा ? क्या हमें राष्ट्रीय चरित्र भी दूसरों से सीखना पड़ेगा ?


यहां शिवाजी के एक साथी खंडोबल्लाल का उदाहरण भी स्मरणीय है। शिवाजी के पुत्र शम्भाजी ने उनकी विधवा बहिन से दुर्व्यवहार किया। बहिन ने भाई से इसका बदला लेने को कहा। खंडोबल्लाल ने खून का घूंट पीकर कहा कि इससे शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिन्दू साम्राज्य नष्ट होकर फिर मुस्लिम राज्य स्थापित हो जाएगा, जिसमें हर दिन सैकड़ों बहिनों का अपमान होगा। इसलिए उन्होंने दिल पर पत्थर रखकर बहिन को ही दूसरी जगह भेज दिया। 


दुनिया के इतिहास में ऐसे प्रसंग भरे हैं। यद्यपि व्यक्तिगत चरित्र पर भी समझौता नहीं हो सकता; पर राष्ट्रीय चरित्र से हीन व्यक्ति तो अक्षम्य है। इसलिए फई और पाकिस्तान के पैसे पर मौज उड़ाने वाले इन मानसिक गुलामों के देशी और विदेशी संबंधों की पूरी जांच होनी चाहिए। 


क्या हमारी सेक्यूलर सरकार और मजबूर प्रधानमंत्री ऐसा साहस दिखाएंगे ?