गौरवशाली भारत - 3
201. ईजिप्त के इतिहासकार Bengsch Bey लिखते हैं, “अति प्राचीनकाल में भारत से लोग आकर ईजिप्त में नील नदी के किनारे बसे. स्वयं ईजिप्त के लोगों में यह भावना व्याप्त है कि वे किसी अन्य अद्भुत देश से ईजिप्त में आ बसे. वह देश हिन्द महासागर के किनारे का पवित्र पन्त देश (पंडितों का देश) था. वह उनलोगों के देवताओं का मूल देश था. वह पन्त देश भारत के अतिरिक्त अन्य कोई हो ही नहीं सकता. (Pg. 123, The Theosophist मासिक, मार्च १८८१)
२०२. ईजिप्त के शिलालेखों से पता चलता है कि फराओ संकर्राह (राजा शंकर) ने कई प्रजाजनों को नौकाओं में बैठाकर सागर पार पन्त देश (भारत) की यात्रा पर भेजा था. वे लोग Ophir (सौवीर, सिन्धु नदी के मुहाना के पास) तट पर उतरे थे और ढाई वर्ष के पश्चात वापस लौटे. यह ईसापूर्व लगभग १८०० की घटना है. उस बेड़े में कई नौकाएँ थी. वे लोग देवताओं के उस देश (भारत) में कुछ समय रहे. राजा पुरुह से उनकी भेंट हुई.
उपर्युक्त शिलालेख फराओ संकर्राह की रानी ने लिखवाया था.
२०३. ईजिप्त के लोग भी पृथ्वी को गौ रूप मानते थे और वैदिक परम्परा के अनुसार शेष के माथे के आधार पर स्थित भी मानते थे-पी एन ओक
204. वैदिक प्रथा के अनुसार ईजिप्त के राजा अपने आपको भगवान का प्रतिनिधि मानते थे. ग्रीक इतिहासकार हेरोडोटस का कहना है कि ईजिप्त के राजा या तो ब्राह्मण होते थे या क्षत्रिय. वे धर्मयुद्ध करते थे. शरण आनेवालों या निःशस्त्र व्यक्ति के साथ छल करना या उसे ताडन करना या कोई अन्य हानि पहुंचाना ईजिप्त की राज्यप्रथा में अयोग्य माना जाता था. (पी एन ओक, वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास, भाग-२)
205. ईजिप्त के लोग वरिष्ठ लोगों का चरणस्पर्श करते थे, फलज्योतिष का अध्धयन करते थे. वे प्रदोष, अमावस्या, एकादशी, संक्रांति, महाशिवरात्रि आदि व्रत का पालन करते थे. ईजिप्त के पुरोहित दिन में तिन बार स्नान करते थे. प्राचीन ईजिप्त में स्त्रियों का सम्मान किया जाता था. क्षत्रियों को ईजिप्त में खत्ती कहा जाता था. ह्ब्रू भाषा में उसी को हित्ताइत लिखते थे. मित्तनी प्रदेश के एक राजा का नाम तशरथ (दशरथ) था. हित्ताइत और मित्तनी राज्यों की सेनाओं में युद्ध होने के पश्चात् जो संधि हुई उसमें वरुण आदि वैदिक देवताओं को साक्षी कहकर संधि की शर्तें लिखी गयी है.
(पी एन ओक, वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास, भाग-२)
206. सीरिया के पामीरा (Palmyra) स्थित मन्दिर के अंदर दुर्भाग्यवश तोड़-फोड़ दिखती है. धर्मान्ध मूर्ति भंजक मुसलमानों को सुंदर कलाकृतियों को छिन्न-भिन्न करने में एसा आसुरी आनंद होता था कि मानो वे अल्लाह की बड़ी सेवा कर रहे हैं. वहां का मन्दिर मस्जिद के रूप में प्रयोग किए जाने से उसकी और भी दुर्दशा हो गयी थी. वहां की नक्काशी, मूर्ति आदि पर कीचड़ का लेप चढ़ा दिया गया है. वहां के विशाल केन्द्रीय दालान में टहनियों, घास-फूस आदि से एक छत बना दी गयी है और उसके निचे पशु बांध दिए जाते हैं. (Remains of Lost Empires, Writer P.V.N. Myers, Page-34)
News18india.com के अनुसार हाल ही में ISIS के आतंकियों ने सीरिया में मन्दिरों के उन सभी अवशेषों को ध्वस्त कर दिया है जो मस्जिद के रूप में प्रयोग नहीं हो रहे थे. उनमे पामीरा के महाकाल शिव का विशाल मन्दिर भी शामिल है.
२०७. असीरिया के धनुर्धारी कमर से आरम्भ होकर घुटनों से उपर आधे अंतर तक ही शरीर ढकते थे. एक चौड़े पट्टे से वह कमर पर कसी जाती थी. स्कोटलैंड के लोग जिस प्रकार कमर से निचे मध्य में Philibeg लटकाते है उसी प्रकार उसके कमरबंध से भी मध्य में एक पदम्-सा लटका करता. भारत का कोई भी व्यक्ति उस चित्र को देखते ही कहेगा की “अरे भाई यह हमारी धोती ही तो है”. (Indian Antiquary, खंड-१, पृष्ठ-१८१ वर्ष १८७८)
208. इस्लाम थोपे जाने से पूर्व अरब के लोगों में हिन्दू नाम का बड़ा प्रभाव तथा सम्मान दिखाई पड़ता है. वे अपनी सुंदर और लाडली बेटियों को “हिन्दा” या “सैफी हिंदी” कहकर पुकारा करते थे. संख्या और गणित की जननी भारत होने के कारण वे उसे “हिन्दिसा” कहते थे. भारतियों के प्रति अरब लोग बड़ी श्रद्धा और आदर रखते थे-पी एन ओक
209. सिद्दीकी के लेख में उल्लेख है कि अंकगणित, दशमलव पद्धति, बीजगणित, त्रिगुनमिति, भुमिति आदि गणित की विविध शाखाएँ अरब लोग भारतियों से ही सीखे-पी एन ओक
210. भारतीय विद्वान फलज्योतिष और गणित में बड़े प्रवीन हैं. आयुर्वेद में भी वे बड़े कुशल है और जटिल रोगों कि अच्छी चिकित्सा करते हैं. वे कुशल मूर्तिकार और चित्रकार होते हैं. सर्वोत्तम बौद्धिक खेल शतरंज के निर्माता भारतीय लोग ही हैं. भारतियों की तलवारें बड़ी धारदार होती है और वे तलवार बड़ी सफाई से चलाते हैं. मन्त्रों से विष उतारने का कौशल्य भारतीयों में है. (रियासत ई-फ्खरुस्सौदन अल-अल बेदन, लेखक-अबु उमर जाहिझ, बसरा, अरब)
211. चार हिंदी या संस्कृत शब्द कुरान में बार बार उल्लिखित है. वे हैं अम्बर, कस्तुरी, झंझाबिल (सोंठ या अदरख) और कपूर. बुद्ध का भी उल्लेख कुरान में फिल-किफ़े (यानि कपिलवस्तु नगर का निवासी) नाम से हुआ है-इस्लामी लेखक सुलेमान नदवी
212. सिद्दीकी के लेख में उल्लेख है कि बगदाद नगर (जो हिन्दू वैदिक और वेदविद्या का केंद्र था) स्वयं संस्कृत नाम है. भग (उर्फ़ बग यानि ईश्वर) और दाद (यह दत्त यानि दिया हुआ इस अर्थ का संस्कृत शब्द है) का मतलब ईश्वर का दिया हुआ अर्थात भगवददत नगर है.
बगदाद नगर का निर्माण खलीफा अल मंसूर ने ७६२-६३ में भारतीय स्थपति (इंजिनियर) और नगर-निर्माताओं के सहायता से करवाया था इस बात में सच्चाई नहीं है-पी एन ओक
213. अरब के लोगों को कुशाई (Cushites) और श्यामई (Semites) कहा जाता है. कुश राम के पुत्र थे और Cushites खुद को कुश का प्रजाजन कहते हैं. इसी प्रकार श्याम कृष्ण का नाम है और कृष्ण श्याम रंग के भी हैं. Semites श्याम कृष्ण के अनुयायी ही थे. वास्तव में इस्लाम पूर्व काल में अरब के लोग भी भगवान राम और कृष्ण के अनुयायी ही थे क्योंकि ईसाई इस्लाम से पहले पुरे विश्व में केवल वैदिक धर्म ही था-पी एन ओक
214. कुश के कुल वाले नाम के कई वंशज निसंदेह अनादिकाल से अर्बस्थान में बसे हुए थे. कुश राम का पुत्र था. अफ्रीका और अर्बस्थान का कुश के साम्राज्य में अंतर्भाव था. (Origins, Part-3, Page-294, Writer-Sir William Drummond)
इसी ग्रन्थ के पृष्ठ ३६४ पर अर्बस्थान की एक नदी का नाम “राम” बताया गया है.
215. Amru-Chief of one of the most ancient tribes…compelled to cede Meeca to the Ishmelites, threw the black stone and two Golden antelopes into the nearby well, Zamzam. अर्थात जब एक अतिप्राचीन टोली के मुखिया अमरु को, इशमायिलियों (मुसलमानों) को मक्का शहर सौंप देना पड़ा, तब उसने शिवलिंग और बारहसिंगों की दो स्वर्ण मूर्तियों को जमजम कुँए में फेंक दिया. (Origines, Part-3, Page-268, Writer-Sir William Drummond)
शिव को पशुपति कहे जाने के कारन काबा मन्दिर में शिव के साथ पशुओं की भी मूर्तियाँ थी-पी एन ओक
216. प्राचीनकाल में Tsabaism (शैवइज्म अर्थात शिवपंथ) ही अरबों का धर्म था. वही Tsabaism समस्त मानवों का धर्म था…उस धर्म के तत्व उस समय के सारे ही सुबुद्धजन मानते थे. (Origins, Part-3, Page-411, Writer-Sir William Drummond)
अर्थात प्राचीन समय में वैदिक धर्म ही सभी मानवों का धर्म था.
217. काबा के मन्दिर को विश्व का नाभि कहा जाता था. इससे हमारा अनुमान है कि जिस विष्णु भगवान की नाभि से ब्रह्मा प्रकट हुए और ब्रह्मा द्वारा सृष्टि-निर्माण हुई उन शेषशाई भगवान विष्णु की विशालकाय मूर्ति काबा के देवस्थान में बीचोबीच थी और इर्दगिर्द अन्य ३६० मन्दिरों में सैकड़ों देवी देवताओं की मूर्तियाँ थी-पी एन ओक
218. गोरखपुर के किसी पीर के एक मुसलमान रखवाले ज्ञानदेव नाम लेकर आर्यसमाजी प्रचारक बन गये थे. ईरान के शाह के साथ वे चार-पांच बार हज कर आए थे. उनके कथन के अनुसार काबा के प्रवेश द्वार में एक Chandelier यानि कांच का भव्य द्वीपसमूह लगा है जिसके उपर भगवद्गीता के श्लोक अंकित हैं-पी एन ओक
219. संस्कृत “ईड” का अर्थ है पूजा जैसे अग्निम इडे पुरोहितं अर्थात अग्नि को पूजा में अग्रस्थान दिया है. संस्कृत का यह ईड शब्द पूजा के अर्थ में पुरे विश्व में प्रचलित था जो मुसलमानों में ईद के नाम से सुरक्षित है. रोमन साम्राज्य में भी वर्षारम्भ की अन्नपूर्ण की पूजा को Ides of March अर्थात मार्च की पूजा कहा जाता है-पी अन ओक, वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास
220. अरबी में “बकर” का अर्थ है गाय. संस्कृत “ईड” का अर्थ है पूजा. अतः “बकर ईद” का मतलब है गौ पूजा. इस्लामिक काल के पूर्व अर्बस्थान में वैदिक संस्कृति थी इसलिए अरब के लोग भी बकर ईद उत्सव अर्थात गौ पूजा उत्सव मनाते थे परन्तु जबरन मुसलमान बना दिए जाने के कारन उनका बकर ईद उत्सव गौ पूजा से वैसे ही पथभ्रष्ट हो गया जैसे मूर्तिपूजक अरब लोग मुसलमान बनने से मूर्तिविध्वंसक बन गये. कुरान में भी बकर अर्थात गाय नाम से एक पूरा खंड है-पी एन ओक
221. यहूदी की तरह इस्लामी परम्परा के अनुसार भी एडम (आदिम) स्वर्ग से भारत में ही उतरा. भारत में उतरते ही आदम को परमात्मा का प्रथम दिव्य संदेश भारत में ही पहुंचा. मुसलमानों की धारणा है कि आदम का ज्येष्ठ पुत्र शिथ अयोध्या में दफनाया हुआ है. सिजदा अर्थात प्रणिपात या साष्टांग प्रणाम, अहरम अर्थात हज यात्रा में सिलाई रहित शरीर ढंकने के धवल वस्त्र और तवायफ अर्थात मन्दिर की प्रदक्षिणा आदि मुसलमानों में इसलिए रूढ़ है क्योंकि इस्लाम के पूर्व अर्बस्थान में वैदिक संस्कृति ही थी. काबा मन्दिर के पुरोहित मोहम्मद के चाचा के महादेव और भारत की प्रशंसा में लिखी गयी कवितायेँ ताम्र पत्र में अभी भी सुरक्षित है ही मोहम्मद ने भी एकबार खुद कहा था, “भारत से ईश्वरीय सुगंध की वायु आती है.” (वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास, लेखक-पी एन ओक)
222. सूफी मंसूर की “अनल हक” अर्थात मैं ही सत्य हूँ घोषणा उपनिषदों की “सो अहम अस्मि” है. मंसूर का “हुलूल” यानि मानवी आत्मा परमात्मा का अंश है हिन्दू दर्शन है. वैदिक एकात्मता के सिद्धांत को अरबी में “वहदत उल वजूद” कहते हैं. आध्यात्मिक पंथ या मार्ग को “सुलूक” कहा जाता है. चार अवस्थाओं में से किसी भी अवस्था में परम सत्य का ज्ञान किया जा सकता है, ऐसी वैदिक धारणा है. वे अवस्थाएं हैं-जागृत, स्वप्न, सुप्त और तुरीय. अरबी में इन अवस्थाओं के नाम हैं-नासूत, जाबृत, मलकत और लुहुत. योग का अरबी शब्द “जिक्र” यानि शारीरिक नियमन है. प्राणायाम को कहते हैं– हब्त-ई-दम. इस्लामपूर्व काल में अर्बस्थान के लोग इन सारी वैदिक आध्यात्मिक परम्पराओं का पालन करते थे. (वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास, लेखक-पी एन ओक)
223. अफगानिस्तान में हिन्दू बड़ी संख्या में हैं. अर्बस्थान तक के प्रदेशों में और उत्तरी ईरान में भी हिन्दू बड़ी संख्या में पाए जाते हैं. ये लोग वहीँ के प्राचीन निवासियों के वंशज हैं. वे किन्हीं अन्य देशों से आकर यहाँ नहीं बसे. जब हजारों की संख्यां में स्थानीय जन मुसलमान बनाए जाने लगे तो उनमें जिन्होंने किसी भी दबाब व प्रलोभन में फंसकर इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं किया, वे यह लोग हैं. (Memoirs of India, Writer-R.G. Wallace)
224. प्राचीनकाल से भारत और समरकंद में लोगों का आना-जाना बड़े प्रमाण में बराबर होता रहा है. बलख और अन्य उत्तरी नगरों में अनादिकाल से हिन्दुओं की बस्तियां हैं. हिन्दुओं का यहाँ एक प्राचीन तीर्थस्थल भी है जिसका नाम ज्वालामुखी है. वह काश्यपीय (Caspian) सागर तट पर स्थित है. (letters on India, Writer-Marie Grahams)
225. इराक की राजधानी बगदाद के संग्रहालय में एक प्राचीन मूर्ति है. उसमे सिंह पर आरूढ़ तीन देवियाँ हैं. स्पष्टतया वे लक्ष्मी, दुर्गा और पार्वती होंगी-पी एन ओक
226. रमजान, रामदान वास्तव में रामध्यान शब्द है. अर्बस्थान के लोग प्राचीन समय से रमझान के पुरे महीने में उपवास रखकर भगवान राम का ध्यान पूजन करते थे. इसीलिए रमझान का महीना पवित्र माना जाता है-पी एन ओक
227. मक्का की देवमूर्तियों के दर्शनार्थ प्राचीन (इस्लामपूर्व) काल में जब अरब लोग यात्रा करते थे तो वह यात्रा वर्ष की विशिष्ट ऋतू में ही होती थी. शायद वह यात्रा शरद ऋतू में (यानि दशहरा-दीपावली के दिनों में) की जाती थी. प्राचीन अरबी पंचांग (वैदिक पंचांग के अनुसार) हर तिन वर्षों में एक अधिक मास जुट जाता था. अतः सारे त्यौहार नियमित ऋतुओं में ही आया करते थे. किन्तु जब से अरब मुसलमान बन गये, कुरान ने आधिक मास पर रोक लगा दी. अतः इस्लामी त्यौहार, व्रत, पर्व आदि निश्चित ऋतू में बंधे न रहकर ग्रीष्म से शिशिर तक की सारी ऋतुओं में बिखरे चले जाते हैं. (Travels in Arabia, Writer-john Lewis Burckhardt)
228. मुसलमानों की हज यात्रा एक इस्लामपूर्व परम्परा है. उसी प्रकार Suzafa और Merona भी इस्लामपूर्व काल से पवित्र स्थल माने जाते रहे हैं क्योंकि यहाँ Motem और Nebyk नाम के देवताओं की मूर्तियाँ होती थी. अराफात की यात्रा कर लेने पर यात्री Motem और Nebyk का दर्शन किया करते हैं. (Pg. 177-78, Travels in Arabia, Writer-john Lewis Burckhardt)
229. इस्लामी ज्ञानकोष में लिखा है कि महम्मद के दादा काबा मन्दिर के पुरोहित थे. मन्दिर के प्रांगण के पास ही उनके घर में या आँगन में खटिया पर बैठा करते. उनके उस मन्दिर में ३६० देव मूर्तियाँ हुआ करती थी.
महादेव उनके कुल देव थे. महम्मद काबा की सभी देव मूर्तियाँ भंग कर दी केवल शिवलिंग सुरक्षित रखा जिसे हज करने वाले आज भी माथे से लगाते हैं और चुमते हैं-पी एन ओक
230. महम्मद संस्कृत शब्द है. अरबी में इसका कोई अर्थ नहीं होता है. यह नाम नहीं उपाधि है. महान मद: यस्य असौ महमद: अर्थात प्रतिभाशाली व्यक्ति या बड़ा घमंडी व्यक्ति. महम्मद के समर्थक उन्हें प्रतिभाशाली व्यक्ति के रूप में और महम्मद के विरोधी उन्हें बहुत घमंडी व्यक्ति के रूप में महम्मद सम्बोधित करते थे-पी एन ओक
231. महम्मद के घराने का नाम कुरैश था. कुरैश का मतलब होता है कुरु ईश अर्थात कुरु प्रमुख. महाभारत युद्ध समाप्त होने पर बचे खुचे कौरव वंशियों में से कुछ पश्चिम एशिया की ओर चले गये थे. कुरैश उनके ही वंशज हैं. यह भी सम्भव है कि कौरवों के वंशज वहां शासन करते हों. ऐसा ही एक कुरुईश कुल अर्बस्थान में काबा मन्दिर परिसर का स्वामी था. उसी कुल में महम्मद का जन्म हुआ था-पी एन ओक
232. नमाज के समय मुसलमान लोग झुकना, मुड़ना आदि जो शारीरिक क्रियाएँ करते हैं वे उनके प्राचीन योगासनों की प्रथा दर्शाते हैं. प्रतिदिन नमाज पढने वाले लोग अनजाने योगासन ही करते हैं. अरबी में नमाज को सलाट कहते हैं. उसका वही अर्थ है जो योग का है-आत्मा को परमात्मा से जोड़ना. (Namaz: The Yoga of Islam, Writer- Ashraf A Nizami)
233. विश्व में कहीं भी मस्जिद का रुख मक्का की दिशा में होना अनिवार्य है. परन्तु विश्व भर में एतिहासिक मस्जिद कहलाने वाली लगभग किसी भी इमारत का रुख मक्का की दिशा में नहीं है. काबा स्वयं ज्योतिषीय आधार पर इस प्रकार बना है कि उसकी चौडाई की मध्य रेखा की एक नोक ग्रीष्म ऋतू के सूर्योदय क्षितिज बिंदु की सीध में है और दूसरी शरद ऋतू के सूर्यास्त बिंदु की सीध में है. महम्मद के समय उसमे ३६० मूर्तियाँ होती थी. वह सूर्यपूजा का स्थान था. वायु के प्रचलन की आठ दिशाओं से उसके आठ कोने सम्बन्धित हैं. David A King, Prof. HKCES, Newyork City.
234. काबा का आकार सृष्टि के लगभग सभी तत्वों के सम्मिलित हिसाब के आधार पर बना है. अतः उसमे ब्रह्माण्डविद्या, रसायनविद्या, भौतिकशास्त्र, वायु ऋतमानशास्त्र, आयुर्वेद आदि सभी का विचार अंतर्भूत है (प्राइस)
हिझाज की प्रारम्भिक मस्जिदों का रुख पूर्व दिशा में था क्योंकि इस्लामपूर्व मुर्तिभक्त अरबों को पूर्व दिशा का महत्व था. काबा मन्दिर की प्रत्येक दीवार या कोना विश्व की एक-एक विशिष्ट दिशा से सम्बन्धित था. (Berthold).
235. अरबी इतिहास में सिन्धु पार के भारतियों को तुर्क और समनी (समानिद) कहा गया है क्योंकि उस समय तुर्क और समनी यानि शाहमनी सारे वैदिकधर्मी थे. समानिद क्षत्रिय राजवंश था जो मुस्लिम बन जाने के बाद भी अपने नाम के साथ मनु: का इस्लामी संक्षेप नूह शब्द लगाते थे जिससे पता चलता है कि वे जब हिन्दू थे तो खुद को स्मृतिकार मनु के वंशज कहलाने में गर्व महसूस करते थे-पी एन ओक
236. मक्का के ओकथ में कवि सम्मेलन हुआ करता था. उस सम्मेलन में पुरस्कृत कविता स्वर्ण थालों पर लिख मक्का में लटकाया जाता था. उन्ही कविताओं का संग्रह सैर उल ओकुल में किया गया है. उसके पृष्ठ ३१५ पर महम्मद से १६५ वर्ष पूर्व के कवि जिपहम बिन्तोई का सम्राट विक्रमादित्य की प्रशंसा में लिखी कविता है जिसका अर्थ निचे दिया जाता है:
भाग्यशाली हैं वे जो विक्रमादित्य के शासन में जन्मे. वह सुशील, उदार, कर्तव्यनिष्ठ शासक प्रजाहित दक्ष था. किन्तु उस समय हम अरब परमात्मा का अस्तित्व भूलकर वासनासक्त जीवन व्यतीत करते थे. हममें दूसरों को निचे खींचने की और छल की प्रवृति बनी हुई थी. अज्ञान का अँधेरा हमारे पुरे प्रदेश पर छा गया था. भेड़िये के पंजे में तड़फड़ाने वाली भेड़ की भांति हम अज्ञान में फंसे थे. अमावस्या जैसा गहन अंधकार सारे अरब प्रदेश में फ़ैल गया था. किन्तु उस अवस्था में वर्तमान सूर्योदय जैसे ज्ञान और विद्या का प्रकाश, यह उस दयालु विक्रम राजा की देन है जिसने हम पराये होते हुए भी हमसे कोई भेदभाव नहीं बरता. उसने निजी पवित्र (वैदिक) संस्कृति हममें फैलाई और निजी देश (भारत) से यहाँ ऐसे विद्वान, पंडित, पुरोहित आदि भेजे जिन्होंने निजी विद्वता से हमारा देश चमकाया. यह विद्वान पंडित और धर्मगुरु आदि जिनकी कृपा से हमारी नास्तिकता नष्ट हुई, हमें पवित्र ज्ञान की प्राप्ति हुई और सत्य का मार्ग दिखा वे हमारे प्रदेश में विद्यादान और संस्कृति प्रसार के लिए पधारे थे. (वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास भाग-२)
237. जैसे हिन्दुओं में ३३ कोटि (प्रकार) के देवता होते हैं वैसे ही इस्लामपूर्व एशिया माईनर प्रदेश में रहने वाले लोगों के भी ३३ देवता होते थे. इस्लामपूर्व काल में शिवव्रत होता था. वह शिवव्रत काबा मन्दिर में बड़ा धूमधाम से मनाया जाता था. उसी का अपभ्रंश इस्लाम में शवे बारात हुआ है-पी एन ओक
238. महम्मद का चाचा उमर-बिन-ए-हज्जाम एक प्रसिद्ध कवि था. शिव की स्तुति में लिखी उसकी एक कविता भी सैर-उल-ओकुल ग्रन्थ में है. कवि जिपहम बिन्तोई की विक्रमादित्य की प्रशंसा में लिखी कविता और यह कविता दोनों दिल्ली के लक्ष्मी नारायण मन्दिर के यज्ञशाला की दीवारों पर उत्कीर्ण है. महम्मद का चाचा उमर-बिन-ए-हज्जाम के कविता का अर्थ निचे है:
यदि कोई व्यक्ति पापी या अधर्मी बने,
यह काम और क्रोध में डूबा रहे,
किन्तु यदि पश्चाताप कर वह सद्गुणी बन जाए
तो क्या उसे सद्गति प्राप्त हो सकती है?
हाँ अवश्य! यदि वह शुद्ध अंतःकरण से
शिवभक्ति में तल्लीन हो जाए तो
उसकी आध्यात्मिक उन्नति होगी.
हे भगवान शिव! मेरे सारे जीवन के बदले,
मुझे केवल एक दिन भारत में निवास का
अवसर दें जिससे मुझे मुक्ति प्राप्त हो.
भारत की एकमात्र यात्रा करने से
सबको पुण्य-प्राप्ति और संतसमागम का लाभ होता है.
(वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास भाग-२)
239. सैर उल ओकुल के पृष्ठ २५७ पर मोहम्मद से २३०० वर्ष पूर्व जन्मे अरबी कवि लबी बिन-ए-अख्त्ब-बिन-ए-तुरफा की वेदों की प्रशंसा में लिखी हुई कविता का अर्थ निचे दिया है:
हे भारत की पवित्र भूमि तुम कितनी सौभाग्यशाली हो.
क्योंकि ईश्वर की कृपा से तुम्हे दैवी ज्ञान प्राप्त है.(१)
वह दैवी ज्ञान चार प्रकाशमान ग्रन्थद्वीपवृत सारों का मार्गदर्शक है.
क्योंकि उनमे भारतीय दिव्य पुरुषों की वाणी समाई है.(२)
परमात्मा की आज्ञा है कि सारे मानव उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करें.
और वेदों के आदेशानुसार चलें.(३)
दैवी ज्ञान के भंडार हैं साम और यजुर जो मानवों की देन हैं.
उन्ही के आदेशानुसार जीवन बिताकर मोक्ष प्राप्ति होगी.(४)
दो और वेद हैं ऋग और अक्षर, जो भ्रातृता सिखाते हैं.
उनके प्रकाश से सारा अज्ञान अंधकार लुप्त हो जाता है.(५)
(वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास भाग-२)
२४०. सऊदी अरब से हंसवाहिनी देवी सरस्वती की एक प्राचीन प्रस्तर मूर्ति प्राप्त हुई है जो ब्रिटिश म्यूजियम, लन्दन में रखा हुआ है-पी एन ओक
241. भारत में डाक व्यवस्था चालू है.उस डाक-सेवा का नाम है “अंजला”. प्राचीनकाल में ईरान में भी एक प्रकार की डाक-व्यवस्था उपलब्ध थी. उसे “अंगरस” कहा जाता था. उसमें और अंजला में कुछ समानता दिखती है. सम्भावना एसी लगती है की ईरानी डाक-सेवा भारतीय डाक-सेवा का अनुकरण रूप हो. (Page-147, A Voyage to East Indies, Writer-Fra Panoline da Tan Bartolomeo)
242. जबसे भारतीय राजाओं को विदेशी आक्रमणकारियों ने परास्त किया और लूटपाट का शिकार हुआ तब से भारतीय शस्त्र और विद्याओं का स्तर गिर गया है. अनेक व्यवसायों की मिलावट हो गयी है. आक्रमणों के पूर्व भारतीय लोग धनी और सुखी होते थे. नीति नियमों का पालन हुआ करता और न्याय तथा शांति का वातावरण हुआ करता था. मैंने स्वयम देखा है की त्रावणकोर नरेश राम वर्मा की संतानों को उसी तरह से शिक्षा दी जाति थी जैसे शूद्रों को. (Page-262-267, A Voyage to East Indies, Writer-Fra Panoline da Tan Bartolomeo)
243. Fra Panoline da Tan Bartolomeo के A Voyage to East Indies के अनुवादक ने टिपण्णी में लिखा है कि ग्रीक दर्शनशास्त्री पाईथोगोरस ने निजी शिक्षा भारत में ही प्राप्त की होगी क्योंकि उसके शिष्यों पर भी पांच वर्ष तक कोई प्रश्न नहीं पूछने का बंधन था जो भारत के वैदिक शिक्षण प्रणाली का हिस्सा है.
244. संस्कृत भाषा के प्रति जर्मन विद्वानों को बड़ी श्रद्धा, आदर और प्रेम होता है. उदाहरनार्थ आकाशवाणी द्वारा संस्कृत में क्रायक्रम आधुनिक युग में भारत से भी पहले जर्मन देश द्वारा आरम्भ किया गया. जर्मन भाषा का ढांचा संस्कृत जैसा ही होता है. प्रथमा से सम्बोधन तक की विभक्तियाँ, संस्कृत जैसी जर्मन भाषा में भी होती है क्योंकि प्राचीनकाल में जर्मनी में संस्कृत भाषा का प्रचलन था-पी एन ओक
245. सन १८१८ में W. Von Schlegel बॉन विश्वविद्यालय में संस्कृत का प्राध्यापक बना. उसने १८२३ में भगवद्गीता और १८२९ में रामायण का जर्मन में अनुवाद किया. १८१९ में एक जर्मन विद्वान Frammy Bapp का निष्कर्ष प्रकाशित हुआ की ग्रीक, लैटिन, फारसी और जर्मन भाषाओँ का संस्कृत से बड़ा गहरा सम्बन्ध है.
246. यूरोप में एतिहासिक और पुरातत्वीय उत्खनन ईसाई व्यक्तियों के द्वारा किये जाने के कारन प्राप्त वैदिक अवशेष या तो जानबूझकर छिपा दिए जाते हैं, नष्ट कर दिए जाते हैं या उनका गलत और विकृत अर्थ लगाते हैं. जैसे ग्रीस में भगवान कृष्ण की प्रतिमाएं इमारतों में पाई गयी, सिक्कों पर भी दिखाई दी फिर भी उनका कोई रिकार्ड नहीं रखा गया. इटली में उत्खनन में पाए गए प्राचीन घरों में रामायण प्रसंगों के चित्र अंकित होते हुए भी इटली के पुरातत्वविद उनकी बाबत पूर्णतया अनजान बने हुए हैं-पी एन ओक
247. ऋषिय प्रदेश (Russia) में अष्टांग आयुर्वेद का एक संस्कृत ग्रन्थ पाया गया है. साइबेरिया के कुछ क्षेत्रों में अभी भी रोगमुक्ति और लम्बी आयु के लिए अयुर्देवता की पूजा होती है. यह ग्रन्थ और एक आयुर्देवता की मूर्ति दिल्ली के हौज खास भवन में International Academy of Indian culture में प्रदर्शित है.
248. Asimov नामक एक रशियन विद्वान के अनुसार रशिया में जो विविध एतिहासिक वस्तु संग्रहालय है उनमे प्रदर्शनार्थ ब्रोंज धातु की परशु एवं विष्णु भगवान की मूर्तियाँ आदि है जो उस साईबेरिया प्रदेश के निवासी आदिघई लोगों की कलाकृतियाँ है. उनमे जो नक्काशी है वह भारतीय नक्काशी परम्परा से मिलती है. उनमे गज प्रतिमाएं भी हैं जबकि शीत प्रदेश में हाथी नहीं पाए जाते.
(वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास, भाग-३, लेखक-पी एन ओक)
249. रशियन लेखागारों में लगभग ६०० प्राचीन दस्तावेज, ग्रन्थ, गाथाएं आदि हैं जो संस्कृत में या प्राचीन भाषाओँ में है. भारत सरकार को उसे मंगवाकर उसके अध्ययन शोधन की व्यवस्था करना चाहिए. वे वैदिक विश्व संस्कृति के धरोहर हो सकते हैं-पी एन ओक
250. जर्मन लोग अपने देश को Deutschland (डाइत्श लैंड) कहते हैं जो संस्कृत दैत्य स्थान का अपभ्रंश है-पी एन ओक
The German term Deutschland, originally diutisciu land (“the German lands”) is derived from deutsch, descended from Old High German diutisc “of the people” (from diot or diota “people”)-Wikipedia, Germany
Duetsch, Diot, Diota आदि दैत्य शब्द के ही अपभ्रंश हैं.
251. होलैंड देश के लोग जो डच (Dutch) कहलाते हैं वे भी वैदिक दैत्य वंश के ही हैं. जैसे प्राचीन नगर ब्रिह्दादित्य का नाम अब बहराईच है यानि आदित्य अब इच शब्द बन गया है-पी एन ओक
इसी तरह जर्मन Duetsch, Diot, Diota आदि दैत्य शब्द के ही अपभ्रंश हैं.
252. जर्मन मैक्स मुलर ने ऋग्वेद का अनुवाद अंग्रेजी में किया है जिसमे उसने अपना परिचय लिखा है-“मया शर्मन देश जातेन गोतीर्थ निवासिना मोक्षमूलर नाम्ना”
जर्मन को उन्होंने शर्मन लिखा है. सम्भवतः जर्मन शब्द संस्कृत शर्मन से ही बना हो. दूसरा शब्द गोतीर्थ है जो उन्होंने Oxford का अनुवाद लिखा है जो उचित ही है-पी एन ओक
253. Ancient humans were present in Germany at least 600,000 years ago. Similarly dated evidence of modern humans has been found in the Swabian Jura, including 42,000-year-old flutes which are the oldest musical instruments ever found and the 40,000-year-old Lion Man. (Wikipedia “Germany”)
जर्मनी में ६ लाख वर्ष पहले मानव की उपस्थिति प्राम्भिक मानव के वंशज को निर्देशित करता है. ४२००० वर्ष पुरानी बांसुरी जिसकी उत्पत्ति क्षेत्र भारतवर्ष निर्विवाद रूप से है तथा ४०००० वर्ष पुरानी नृसिंह भगवान की मूर्ति दोनों जर्मनी में वैदिक आर्य संस्कृति के द्योतक हैं.
254. Tacitus नाम के एक प्राचीन ग्रीक इतिहासकार लिखता है की जर्मन लोग प्रातः उठते ही प्रथम शौच और मुखमार्जन करते हैं जो निश्चित ही पूर्ववर्ती लोगों की प्रथा है. वे लम्बे, ढीले वस्त्र परिधान धारण करते हैं और लम्बे बाल रखकर सिर के उपर बालों की गांठ बांधते हैं जो ब्राह्मणों की प्रथा है. (पृष्ठ ६३ खंड १, Annals and antiquities of Rajsthan, by James Tod)
255. Tacitus यह भी लिखता है की “९ वीं सदी में अगस्टस के नेतृत्व में ईसाईयों के हमले के पूर्व जर्मन लोग मुख्यतः राईन और डेन्यूब नदी के किनारे बसे हुए थे.” डेन्यूब नदी के किनारे दनु के वंशज बसे हुए थे.
यूरोपीय परंपरा में देवी दनू एक नदी देवी थी. देन्यूब (डेन्यूब), दोन, डनीपर और डिनिएस्टर नदियां दनु अथवा दानव के नाम पर ही रखी गयी है-News18India
256. जर्मन लोग स्वास्तिक को स्वस्तिक ही कहते हैं. वह संस्कृत सु-अस्ति-क यानि मंगल करने वाला एसा शब्द है. यह स्वास्तिक चिन्ह केवल जर्मनी में ही नहीं अपितु सारे विश्व में प्रचलित था. रोमन राजघराने के खाने पिने के चांदी के बर्तनों पर भी स्वास्तिक खुदा होता था-पी एन ओक
257. महाभारतीय युद्ध से पहले ही हिन्दू लोग स्कन्दनाविय प्रदेश (Scandenevia) में जा बसे थे. यहाँ के लोगों की पौराणिक कथाएं भी वैसी ही है जैसे हिन्दुओं की. (The Theogony of Hindus, Count Biornstierno)
258. आयरलैंड की काउंटी मीथ में एक तारा हिल है. इसी इलाके में दुनिया के सबसे रहस्यमय शिव लिंग है जिसे पत्थर के चौड़े ईंटों का घेरा बनाकर उसे स्थापित किया गया था. कब स्थापित किया गया था, इसके बारे में लोगों को सही सही अंदाज नहीं है. वहां के लोग इसे रहस्यमय पत्थर के रूप में जानते हैं. लोग इसकी पूजा करते हैं.
द माइनर्स ऑफ द फोर मास्टर्स के अनुसार, कुछ खास जादुई ताकत रखने वाले एक ग्रुप के नेता “तुथा डि देनन” ने इसे स्थापित किया था. “तुथा डि देनन” का मतलब होता है देवी दनू के बच्चे. वैदिक परंपरा में दनू देवी का जिक्र मिलता है, जो दक्ष की बेटी और कश्यप मुनि की पत्नी थीं. यह इतना महत्वपूर्ण पत्थर था कि 500 ईस्वी तक सभी आयरिश राजाओं के राज्यभिषेक यहीं पर किया गया. 500 ईसवी में ईसाई आक्रमणकारियों ने आयरलैंड पर अधिकार कर लिया उसके बाद यह प्रथा बंद हो गई. (News18India.com)
259. एडवर्ड पोकोक अपने ग्रन्थ India in Greece के पृष्ठ ५३ पर लिखते हैं की यूरोपीय क्षत्रिय, स्कैंडिनेविया के क्षत्रिय और भारतीय क्षत्रिय सारे एक ही वर्ग के लोग है. पी एन ओक लिखते हैं की स्कैंडिनेविया वास्तव में “स्कन्दनावीय” है जो दैत्यों से लडाई के समय “स्कन्द की नावसेना” का बेस क्षेत्र या छावनी था. शंड नामक दानव ने स्कैंडिनेविया बसाया था. हालैंड देश के निवासी भी डच (Deutch) यानि दैत्य कहलाते हैं. होलैंड के लोगों केलिए एक और शब्द है Demonym जो Demon अर्थात दानव से ही बना हुआ लगता है.
260. पुराणों में दनु और मर्क का उल्लेख आता है जिनकी शिव के पुत्र स्कन्द से लडाई होती रहती थी. उसी दानव मर्क की स्मृति डेनमार्क देश के नाम में है. कुछ विद्वानों का मत है की दानव मर्क ने ही डेनमार्क बसाया था. मर्क हिरण्यकश्यप का पुरोहित और प्रह्लाद का शिक्षक था. कोलाहल युद्ध में शुक पुत्र शंड एवं मर्क का वध हुआ था. (वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास, भाग-३) और (पेज ५, http://oldisrj.lbp.world/UploadedData/4692.pdf )
261. ईरान का वेद जेंदा (अवेस्ता) की तरह स्केंडिनेविया में भी पवित्र ग्रन्थ “एद्दा” है जो वेद शब्द का ही अपभ्रंश है और इसमें वेद का ही विकृत अवशेष अभी तक बचा हुआ है इसका कारन यह है की स्केंडिनेविया पर ईसाईयों का हमला बहुत बाद में हुआ था जो लगभग ३०० वर्षों तक चला. डेनमार्क ने १५० वर्ष, नार्वे और आईसलैंड लगभग २०० वर्ष और स्वीडन ने ३०० वर्ष ईसाई आक्रमणकारियों से कठिन संघर्ष किया था.
262. Sanskrit and its kindred Literatures-Studies in Comparative Mythology ग्रन्थ में लॉरा लिखती है की “स्केंडिनेविया के Norse लोगों को सैकड़ों वर्ष बाद ईसाई बनाया गया. अतः उनकी विश्वोत्पति सम्बन्धी धारणाएं तथा पौराणिक कथाएं आदि मूलरूप में सुरक्षित हैं. दो एद्दा उनके पवित्र ग्रन्थ हैं. एक पद्य में है और दूसरा गद्य में. वे उसी प्राचीन norse (इंडो-यूरोपियन) भाषा में लिखे हुए हैं जो स्केंडिनेविया के चारों शाखाओं में बोली जाती थी. पद्य एद्दा अधिक प्राचीन है, उसमें ३७ मंडल हैं. उनमें से कुछ आध्यात्मिक हैं जो विश्वोत्पति का वर्णन करता है अन्य अध्यायों में देव और मानवों के आपसी व्यवहार तथा प्रादेशिक ख्यात व्यक्तियों का इतिहास है.”
263. इतिहासकार पी एन ओक लिखते हैं “स्केंडिनेविया में दफन शिलाओं पर Assur नाम कई बार लिखा मिलता है. वह इस कारन की यूरोप में दानव, असुर उर्फ़ दैत्य लोगों का ही शासन था. स्वीडन में उपशाला नाम का विशाल स्वर्ण मन्दिर था. १०७० ईसवी तक उसमें त्रिमूर्ति Thor, Odin और Frey (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की पूजा होती थी, यज्ञ होता था, प्रसाद चढ़ाया जाता था. यहाँ प्रति नौ वर्ष पर उत्सव मनाया जाता था. उसके बाद ईसाई आक्रमणकारियों ने इस मन्दिर को नष्ट कर वहां ईसाई ध्वज फहरा दिया.”
264. कैस्पियन सागर के दक्षिणपूर्व में एस्ट्राबाद नामक आधुनिक नगर के पास प्राचीन नगर हिरकेनिया था. इसका प्राचीन नाम हिरण्यपुर था. यह नाम कश्यप ऋषि और दिति के पुत्र हिरण्यकश्यप के नाम पर पड़ा माना जाता है. राजा बलि का महल ‘सुतल’ सम्भवतः ट्रांसकैस्पियन जनपद में था.
(page-5, http://oldisrj.lbp.world/UploadedData/4692.pdf)
265. कश्यप ऋषि का आश्रम काश्यपीय सागर के कहीं निकट ही था. काश्यपीय सागर के आसपास ही असीरिया (असुर प्रदेश) है. असीरिया का ही एक राजा असुर बेनीपाल इराक तक के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था. असुर बेनीपाल की मूर्ति आज भी इराक के एक संग्रहालय में रखा हुआ है. सीरिया, इराक, जॉर्डन, इजिप्त के आसपास असुर राज करते थे. दनु के पुत्र दानव भी आस पास ही रहते थे. हयग्रीव उसमें सबसे शक्तिशाली था. हयग्रीव का मतलब होता है घोड़े जैसा मुख या गर्दन वाला. दनु के अन्य चार पुत्रों के नाम भी घोड़ा शब्द से शुरू होता है-अश्वगिरी, अश्वपति, अश्वसंकू और अश्वसिरास. अर्ब का मतलब भी घोड़ा होता है. अतः यह सम्भव है की अर्बस्थान नाम इन दानवों के नाम पर ही पड़ा हो.
266. बेबिलोनिया (इराक) में नरसिंह अवतार हुआ था और बाइबिल के Genesis यानि जन्म अथवा आरम्भ XI-7 नाम के भाग में इसका उल्लेख है. एसा थॉमस मॉरिस का मानना है. उन्होंने अपने ग्रन्थ में लिखा है कि इसमें कोई संदेह नहीं की जब मानवजाति तितर-बितर हुई तब जो लोग ईजिप्त में गए वे उस भयंकर (नरसिंह अवतार की) इतिहास की स्मृतियाँ साथ ले गए. उनका वही (नरसिंह) नाम था जो भारतीय परम्परा में है. (The History of Hindustan, its arts and its sciences as connected with the history of the other great empires. Writer-Thomas Maurice, Republished by Navrang, New delhi, 1974)
267. महर्षि पुलस्त्य का कार्यक्षेत्र पेलेस्टाईन (फिलिस्तीन) में था. वहीँ उनका आश्रम था और वृश्रवा वहीँ रहते थे. कैकसी से उनके तिन पुत्र रावण, कुम्भकरण और विभीषण तथा पुत्री सूर्पनखा हुई. रावण की मृत्यु के बाद शंखद्वीप (अफ्रीका) का समस्त उपरी भाग श्रीराम के पुत्र कुश के अधीन आ गया. इथियोपिया के पाठ्यपुस्तकों में कुछ सौ वर्ष पहले तक इथियोपिया के लोगों को कुशाईट अर्थात कुश की प्रजाजन पढ़ाया जाता था और कुश के पिता को हाम (राम का अपभ्रंश) बताया जाता था-पी एन ओक
268. इतिहासकार पी एन ओक लिखते हैं “इथोपिया के क्रिश्चयन, हब्शी सम्राट स्वर्गीय हेल सलासी को भारत के एक स्वामी कृष्णानंद ने एक अनोखी पवित्र वस्तु कहकर जब रामायण की प्रति भेंट की तो हेल सलासी ने यह कहकर कृष्णानंद को चकित किया की “हम अफ़्रीकी लोगों को राम की जानकारी कोई नई बात थोड़े ही है. हम सारे कुशाईट हैं.” उस भेंट के पश्चात स्वामी कृष्णानंद ने बाजार से शालेय इतिहास की कुछ पुस्तकें खरीदकर उन्हें बड़ी उत्कंठा से पढ़ा तो उसमे स्पष्ट लिखा था की अफ़्रीकी लोग कुशाईट हैं.”
269. Origin of the Pagan idols नाम के ग्रन्थ के भाग ४, अध्याय ५, पृष्ठ ३८० पर Rev. Faber लिखते हैं की “गाल (फ़्रांस) और ब्रिटेन के सेल्ट उर्फ़ केल्ट लोगों का धर्म वही था जो हिन्दुओं का या ईजिप्त के लोगों का था. Cananites, Phrygians Greeks तथा रोमन लोगों का भी वही धर्म था. Phoenicians, Anakim, Philistine, Palli तथा इजिप्तिशियन लोगों के राजा लोग सारे कुश के वंशज होने से कुशाईट कहलाते थे. उन्ही को Septuagent के अनुवादकों ने इथियोपियंस भी कहा है. ग्रीक भाषा में इथियोपियंस का अर्थ होता है काले किन्तु हब्शी नहीं.”
270. ईसापूर्व यूरोप में अम्बा, शिव, सरस्वती, गणेश, लक्ष्मी, अन्नपूर्णा आदि देवी देवताओं का पूजन होता था जिनकी स्मृति अभी भी “मदर गोडेस” और “फादर गॉड” आदि शब्दों में मिलता है. मरिअम्मा उर्फ़ मरिमाता वैदिक देवी थी जो यूरोप में आज कृष्ट की माता “मदर मेरी” के नाम से प्रचलित है. अन्नपूर्णा को “अन्ना पेरिना” कहकर पूजते हैं-पी एन ओक
271. एक हंगेरियन विद्वान Osnia Decoro लिखते हैं, “मेरे अपने देशवासियों को यह जानकारी देने में मुझे गर्व होता है की अन्य किसी यूरोपीय देश की अपेक्षा संस्कृत के अध्ययन से हंगेरी की जनता को बड़ा लाभ होगा. संस्कृत के अध्ययन से हंगेरियन जनता को निजी स्रोत, रहन सहन, रिवाज, भाषा आदि के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होगी क्योंकि संस्कृत का ढांचा हंगेरियन भाषा के ढांचे के समान है जबकि पश्चिमी यूरोपीय भाषाओँ से अलग. (पृष्ठ-३९४, इंडिया इन ग्रीस, एडवर्ड पॉकोक)
272. पोलैंड के Czestochowa नगर में एक प्राचीन देवी का स्थान है. उस देवी का नाम ब्लैक वर्जिन है जो वास्तव में काली माता है. वह देवी की मूर्ति Asna Gora नाम के मठ में प्रतिस्थापित है जो वास्तव में ईशान गौरी अर्थात शंकर गौरी मठ है. इससे निष्कर्ष निकलता है की वह प्राचीन समय में प्रसिद्ध शिव तीर्थक्षेत्र रहा होगा-पी एन ओक
273. शक स्लावकीय यह एक प्राचीन दैत्य वंशीय जमात यूरोप में थी. उन्ही की दूसरी शाखा शकसेनी (Saxseny) कहलाती थी. उसके कुछ लोग आंग्लभूमि में जा बसने से Anglo Saxson कहलाए. (खंड-४, पृष्ठ-६६)
274. द्वारिका और द्वारिकावासियों के समुद्र सम्पूर्ण तबाही के दौरान कुछ को छोड़कर यदुवंशी २२ जत्थों में द्वारिका से विभिन्न क्षेत्रों में प्रस्थान कर गये. उनमे से कुछ भगवान कृष्ण के आदेश पर युधिष्ठिर के राज्य चले गये. कुछ जत्थे अगस्त्य ऋषि के साथ दक्षिण भारत में प्रस्थान कर गये. प्राचीन भारत के इतिहास पुस्तक में झा और श्रीमाली लिखते हैं की, “अगस्त्य ऋषि द्वारा द्वारका से अट्ठारह राजाओं के समूह, वेलिर के अठारह कुलों एवं अरुवालरों का नेतृत्व किया. इन्होने मार्ग में आने वाले वनों का नाश कर कृषि योग्य बनाया और बसते गये. दक्षिण के वेलिर जाति द्वारिकाधीश कृष्ण के वंशज माने जाते हैं.”
275. यदुवंशियों के कुछ जत्थे उत्तर की ओर बढे और कश्मीर, तुर्किस्तान होते हुए इलावर्त (रूस) चले गये. १२ जत्थे पश्चिम एशिया की ओर निकले. उनमे से एक जत्था इराक के मोसूल में आकर रहने लगा. पश्चिम की ओर आने वाले ये सम्भवतः पहले यदुवंशी जत्थे थे जो मूसल युद्ध से हताहत होकर इस प्रदेश में आकर बसे थे (आधुनिक यजदी?). अन्य ग्यारह जत्थे भी मध्य एशिया से लेकर ग्रीक तक विभिन्न देशों में बस गये-पी एन ओक
276. इतिहासकार पी एन ओक के दिए आंकड़े के अनुसार यहूदी लोगों का ईसवी सन २०१९-२० में ५७८० वा वर्ष चल रहा है. उनके संवत को Passover वर्ष कहते हैं. Passover का अर्थ है देश छोड़कर निकल जाना. अर्थात उन्हें द्वारिका राज्य छोड़े और कृष्ण से बिछड़े हुए ५७८० वर्ष हो गये. वे जब द्वारिका से बिछड़े तब से उन्होंने निजी सम्वत गणना आरम्भ की. अतः महाभारतीय युद्ध हुए लगभग ५७८१ वर्ष होना चाहिए.
277. महान ज्योतिषाचार्य और गणितज्ञ पंडित आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध ३१३६ ईसवी पूर्व (एहोल अभिलेख के अनुसार ३१३७ ईसवी पूर्व) में हुआ था और भगवान श्रीकृष्ण का परिनिर्वाण १८ फरवरी, ३१०२ ईसवी पूर्व हुआ था और यही सर्वमान्य तिथि है.
278. यहूदि अपने केलेंडर को सृष्टि निर्माण के समय से प्रारम्भ मानते हैं और ये मानते हैं की ३७६० ईसवी पूर्व में “एडम” पैदा हुआ था और तभी से उसका केलेंडर शुरू हुआ. अतः प्रारम्भिक यहूदी का पञ्चांग वैदिक पञ्चांग का ही हिस्सा था क्योंकि उनका नया साल भी पहले वैदिक पञ्चांग की तरह बसंत ऋतू में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही प्रारम्भ होता था. ये अभी भी passover week बसंत ऋतू के प्रारम्भ में मार्च-अप्रैल में ही मनाते हैं. वैदिक पञ्चांग ही सृष्टि के आरम्भ से प्रारम्भ होता है.
इसके अतिरिक्त यहूदी केलेंडर भी भारतीय पञ्चांग चन्द्रमास के अनुसार ही बारह चन्द्र मासों का होता है और प्रत्येक तिन वर्ष पर एक मल मास जुड़कर १३ महीने का वर्ष हो जाता है. दिन भी भारतीय पञ्चांग की तरह फिक्स नहीं है. भारतीय पञ्चांग की तरह सूर्यास्त से सूर्योदय तक रात्रि और सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन कहा जाता है.
279. The Chosen People ग्रन्थ के लेखक अलेंग्रो लिखते हैं की, “यहूदियों के प्रख्यात पूर्वज तथा उनके भगवान के नाम सेमेटिक (अर्थात अरबी) परम्परा के नहीं है. वे तो किसी प्राचीनतम पौर्वात्य सभ्यता ही नहीं अपितु प्राचीनतम जागतिक परम्परा के हैं.”
यहूदियों के पूर्वज और भगवान प्राचीनतम पौर्वात्य सभ्यता के होने का मतलब स्पष्ट है भारतीय पूर्वज और कृष्ण भगवान-पी एन ओक
280. यहूदियों के प्रथम नेता अब्राहम माने गये हैं. यह ब्रह्मा शब्द ही है. उनके दुसरे देवता मोज़ेस कहलाते हैं जो महेश शब्द का विकृत उच्चार है. मोज़ेस की जन्मकथा कृष्ण की जन्मकथा से मेल खाती है. श्रीकृष्ण का जैसा विराट रूप कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने देखा वैसा ही विराट रूप यहूदी लोगों ने रेगिस्तान में मोज़ेस का देखा, एसा यहूदियों की दंतकथा है.
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम
श्रीमद्भगवत गीता की यही भविष्यवाणी यहूदी लोगों में भी प्रचलित है. अतः यह महा-ईश भगवान कृष्ण हो सकते हैं-पी एन ओक
281. “यहूदियों के नेता मोझेस के धर्मतत्व एक ईश्वर की कल्पना पर ही आधारित थे. वेदों का तात्पर्य भी वही है. मोझेस की धर्म-प्रणाली और सृष्टि-उत्पत्ति की धारणाएँ कुछ मात्रा में उसी हिन्दू वैदिक स्रोत की दिखती है.” (पृष्ठ १४४, The Theogony of the Hindus by कौन्ट विअन्स्तिअर्ना)
282. एडवर्ड पोकोक अपने ग्रन्थ इंडिया इन ग्रीस के पृष्ठ २२४ पर लिखते हैं, “यहूदी लोगों से यदि कोई पाप होता तो वे पहाड़ के उपर कुञ्जवनों में या वृक्ष के तले मन्दिर बनाते और उसमे “बाल” की मूर्ति स्थापना कर देते. मन्दिर के आगे स्तम्भ होता था. मन्दिर की वेदी पर धुप जलाते थे.”
उपर जिस ‘बाल’ की मूर्तिस्थापना की बात लिखी है वह बालकृष्ण की मूर्ति ही हो सकती है. बायबिल में भी यहूदी लोगों के भगवान का नाम “बाल” उल्लिखित है जो स्पष्टतया बालकृष्ण ही हैं-पी एन ओक
283. बालकृष्ण प्राचीन इराक के लोगों के भी प्रतिष्ठित देवता थे और उनका चित्र अभी भी इराक में सुरक्षित है. ऐसे ही चित्रों पर १९७९ में वसंतोत्सव के अवसर पर डाक टिकट जारी किए गये थे. इराक के मुसलमानों को नहीं पता की वे वास्तव में कौन हैं पर हम भारतवासी उन्हें देखते ही पहचान लेंगे की यह बाल श्रीकृष्ण हैं. (चित्र कमेन्ट में है)
284. यहूदी को अंग्रेजी में Jew कहा जाता है. यह मूल शब्द जदु अर्थात यदु का अपभ्रंश है. यहूदी पंथ को Judaism कहा जाता है, यह Yeduism का अपभ्रंश है. य का ज उच्चारण भी होता है जैसे यादव का जादव या जाधव, यदु-ज से जडेजा, यात्रा से जात्रा आदि. इसी पंथ का एक और नाम है Xionism यह Jewnism या जदुनिज्म अर्थात यदुपंथ शब्द है जिसका मतलब है यदुवंशी श्रीकृष्ण के अनुयायी-पी एन ओक
285. यहूदी का धर्म चिन्ह षटकोण है जो वैदिक अनाहत चक्र या शक्तिचक्र का केन्द्रीय चक्र है. शक्ति के पूजक उसे शक्ति का प्रतीक मानकर पूजते हैं. दिल्ली के हुमायूँ की कब्र कही जाने वाली जो विशाल इमारत है उसमें देवी भवानी का मन्दिर था. उसके उपरले भाग में चारों तरफ बीसों ऐसे शक्तिचक्र बने हुए हैं जो संगमरमर प्रस्तर से ढंक दिए गये हैं-पी एन ओक
बंगाल के त्रिवेणी, हुगली में स्थित विष्णु मन्दिर जो अब जफर खान गाजी मस्जिद और मकबरा कहा जाता है उसके दीवार पर भी ठीक यहूदियों के धर्म चिन्ह जैसा ही वैदिक अनाहत चक्र या शक्ति चक्र बना हुआ है.
286. मार्कोपोलो ने अपने प्रवास वर्णन के ग्रन्थ में पृष्ठ ३४६ पर चीन के कायफुन्गफु नगर में यहूदियों की एक बस्ती में मिले एक यहूदी शिलालेख में लिखी बातों का उल्लेख किया है. उसमें लिखा है, “With respect to the Israelitish religion we find an inquiry that its first ancestor, Adam came originally from India and that during the (period of the) Chau State the sacred writings were already in existence. The sacred writings embodying eternal reason consist of 53 sections. The principles therein contained are very abstruse and the external reason therein revealed is very mysterious being treated with the same veneration as Heaven. The founder of the religion is Abraham, who is considered the first teacher of it. Then came Moses, who established the law, and handed down the sacred writings. After his time this religion entered China”
उपर के उद्धरण से स्पष्ट है यहूदी धर्म का मूलव्यक्ति Adam (संस्कृत आदिम) भारतीय था, sacred writings से वेदों या गीता की बात कही गयी है, संस्थापक अब्राहम कोई और नहीं ब्रह्मा हैं, मोज़ेस विष्णु (या कृष्ण) हैं और अंतिम पंक्ति की अंतिम बात यह की उसके बाद चीन में वह धर्म अर्थात वैदिक धर्म प्रवेश किया अर्थात चीन वैदिक आर्य संस्कृति और वैदिक धर्मी हो गया था-पी एन ओक
287. मुम्बई के कट्टर ईसाईयों द्वारा लिखी गयी पुस्तक The Plain Truth, Worldwide Church of God P.O. Box 6727, Mumbai द्वारा प्रकाशित की गयी है. उसमें लिखा है, “कई लोग क्रिसमस की विविध प्रकार से सराहना करते रहते हैं किन्तु क्रिसमस का समर्थन न तो New Testament करता है, न बाईबल में उसका कोई स्थान है और न ईसामसीह ने जिन्हें धर्मोपदेश दिया उन मूल शिष्यों ने भी क्रिसमस त्यौहार का कोई उल्लेख किया है. ईसाई प्रचार के पूर्व रोमन लोगों का जो धर्म था उसका यह त्यौहार चौथी शताब्दी में ईसाई परम्परा में सम्मिलित हुआ, क्योंकि क्रिसमस मनाने की प्रथा रोमन कैथोलिक चर्च की है. Catholic Encyclopedia देखिये जिसमें क्रिसमस शीर्षक के निचे लिखा है, “आरम्भ के ईसाई पर्वों में क्रिसमस का अंतर्भाव नहीं था. उसका प्रवेश प्रथम ईजिप्त में हुआ. सूर्य उत्तरायण सम्बन्धी तत्कालीन समाज की जो उत्सव विधि थी वह क्रिसमस में सम्मिलित हो गयी.”
288. “रामनगर (रोम) की वाटिका (वेटिकन) हजारों वर्षों से वैदिक आर्य संस्कृति और धर्म का केंद्र होने से वेटिकन में सूर्य उत्तरायण का पर्व २५ दिसम्बर को बड़ी धूम धाम से मनाया जाता था. इस दिन को सूर्य का जन्मदिन की तरह बाल सूर्य की मूर्ति बनाकर उसे सोमलता से सजाया जाता था. उस समय के ईसाईपंथी नेताओं ने चालाकी यह की रोम के सबसे उल्लासपूर्ण और दीर्घतम सूर्य उत्तरायणी उत्सव से ही ईसा के जन्म का नाता जोड़ दिया. The New Schaff Herzog Encyclopaedia of Religious Knowledge में लिखा है की “दीर्घतम रात्रि समाप्त होकर नए सूर्य के उत्तरायणी आगमन का तत्कालीन जनता के मन पर इतना प्रभाव था की उस प्रसंग के Saturnalia तथा Brumalia कहलाने वाले उत्सव को ईसाई लोग टाल नहीं सके”-पी एन ओक
289. सूर्य देवता और सूर्य उत्तरायणी उत्सव सिर्फ इटली के एट्रूस्कन लोगों में ही प्रचलित नहीं था बल्कि यूरोप के ड्रुइडस, ईजिप्त, ग्रीक आदि देशों में भी प्रसिद्ध था. इसका प्रमाण सन १९६४ में प्रकाशित आंग्ल ज्ञानकोश में मिलता है जिसमे लिखा है की “सम्राट Constataine ने रविवार ईसाईयों को धार्मिक दिन तथा विश्रांति और छुट्टी का दिन इसलिए घोषित किया क्योंकि ईसवी पूर्व की धार्मिक प्रणाली में रविवार सूर्यपूजन का तथा छुट्टी का दिन होता था.”
290. १७ वीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में क्रिसमस मनाने पर यह कहकर प्रतिबन्ध लगा दिया गया की “क्रिसमस त्यौहार Pagan, Papish, Saturnalian, Satanic, Idolatrous और leading to idleness है.” जरा शब्दों पर गौर कीजिये क्रिसमस पर क्या क्या आरोप लगाये गये थे. Pagan यानि मूर्तिपूजक या भगवानवादी लोग, Papish यानि पापहर्ता वैदिक धर्मगुरु (वेटिकन के वैदिक पीठाधीश) का चलाया हुआ, Saturnalia यानि सूर्य के मकर राशी में प्रवेश का, Satanic यानि शैतानी, idolatrous यानि मूर्तिपूजा प्रणाली का तथा आलस्य को प्रोत्साहन देने वाला पर्व है.
291. ब्रिटिश ज्ञानकोष का कथन है की “ईसाई धर्मविधियों में अनेक ईसा पूर्व की है; विशेषकर क्रिसमस. उस त्यौहार द्वारा सूर्य का मकर राशी में प्रवेश तथा नए सूर्य (मित्र) के जन्म पर मिष्टान्न भोजन और आनंदोत्सव मनाए जाते थे.” P. N. Oak
292. Encyclopaedia Americana ने लिखा है की “उस दिन (२५ दिसम्बर) पहले से उत्तरायण उत्सव भगवानधर्मी (Pagan) लोग मनाते थे.” The New Catholic Encyclopaedia भी कहता है की क्रिसमस उत्तरायण का उत्सव था.
293. Preface of Oriental Religious ग्रन्थ में लेखक लिखते हिं, “इसमें कोई संदेह नहीं की ईसाईपंथ के कुछ विधि और त्यौहार मूर्तिपूजकों की प्रणाली का अनुकरण करते हैं. चौथी शताब्दी में क्रिसमस का त्यौहार २५ दिसम्बर को इसलिए माना गया की इस दिन प्राचीन परम्परानुसार सूर्यजन्म का उत्सव होता था.
294. The Celtic Druids के लेखक Godfrey Higgins लिखती है, “पहाड़ियों पर आग जलाकर २५ दिसम्बर का त्यौहार ब्रिटने और आयरलैंड में मनाया जाता था. फ़्रांस में ड्रुइडस की परम्परा वैसी ही सर्वव्यापी थी जैसे ब्रिटेन में. हरियाली और विशेषतया Mistletoe (यानि सोमलता) उस त्यौहार में घर-घर में लगायी जाती थी. लन्दन नगर में भी लगायी जाती थी. इससे यह ड्रुईडो का त्यौहार होने का पता चलता है. ईसाई परम्परा से उसका (क्रिसमस का) कोई सम्बन्ध नहीं है.” (पेज १६१,)
२9५. “इशानी (Esseni) पंथ के साधू ईसाई बनाए जाने के बाद पतित और पापी रोमन और ग्रीक साधू कहलाने लगे. उनके ईसाई बनने से पूर्व के मठों में एक विशेष दिन सूर्यपूजा होता था. सूर्य को ईश्वर कहते थे. वह दिन था २५ दिसम्बर, मानो सूर्य का वह जन्मदिन था. ड्रुइड लोग भी इसे मनाते थे. भारत से लेकर पश्चिम के सारे देशों तक सूर्य के उस उत्तर संक्रमन का दिन जो मनाया जाता था उसी को उठाकर ईसाईयों ने अपना क्रिसमस त्यौहार घोषित कर दिया.” (पेज १६४, The Celtic Druids लेखक Godfrey Higgins)
296. “इशानी (Esseni यानि शैव) पंथ के साधू ईसाई बनाए जाने के बाद पतित और पापी रोमन और ग्रीक साधू कहलाने लगे. उनके ईसाई बनने से पूर्व के मठों में एक विशेष दिन सूर्यपूजा होता था. सूर्य को ईश्वर कहते थे. वह दिन था २५ दिसम्बर, मानो सूर्य का वह जन्मदिन था. ड्रुइड लोग भी इसे मनाते थे. भारत से लेकर पश्चिम के सारे देशों तक सूर्य के उस उत्तर संक्रमन का दिन जो मनाया जाता था उसी को उठाकर ईसाईयों ने अपना क्रिसमस त्यौहार घोषित कर दिया.” (पेज १६४, The Celtic Druids लेखक Godfrey Higgins)
297. ग्रीक तथा भारतीय पौराणिक कथाओं की गहरी समानता देखकर एसा लगता है की ग्रीक लोग और हिन्दुओं में किसी समय अतीत में घनिष्ठ सम्बन्ध रहा होगा और शायद पायथागोरस ने आत्मा के विविध जन्मों का जो उल्लेख किया है वह भारतीय देवी-देवताओं की कथाओं से सीखकर ग्रीक देव-कथाओं में जोड़ दिया है. (Page-61-62, Narratives of a journey Overland from England to India, Writer-Mrs. Colonal Edwood)
298. ग्रीस में वैदिक देवताओं के गुण धर्म वाले देवता
भारतवर्ष ग्रीस
इंद्र के वज्र प्रहार की कथा ज्यूपिटर द्वारा वज्र प्रहार
कृष्ण और गोपियों की कथा अपोलो और उनकी गोपियाँ
कामदेव Cupid
सौन्दर्य की देवी माया/लक्ष्मी वीनस
सूर्य तथा अर्जुन Phoebus और Aurora
अश्विनीकुमार Castor और Pollux
काली की कथा Hecate उर्फ़ Prosperine की कथा
नारद Mercury
गणेश Gonus
हनुमान और वानर सेना Pon और उसके वन देव
Sir William Gones & P N Oak की किताब
299. महाभारत काल में ग्रीस में वैदिक सभ्यता और संस्कृति होने के कारण वहां कृष्णभक्ति का बड़ा प्रभाव रहा है. Barbara Wingfield Stratford नाम की आंग्ल महिला ने इंडिया एंड द इंग्लिश नाम की पुस्तक लिखी है. उस ग्रन्थ के पृष्ठ १११-११२ पर लिखती है की, “कई बातों में कृष्णभक्ति और कृस्त परम्परा एक जैसी है. उसी प्रकार कृस्त की जन्मकथा तथा बालजीवन और कृष्ण की जन्मकथा भी समान है. बाल कृस्त को जैसे उसके जन्मस्थान से अत्याचारी अधिकारीयों के भय से नाजरेथ में आश्रय लेना पड़ा वैसे ही कृष्ण को निजी जन्मस्थान से निकलकर गोकुल में बचपन बिताना पड़ा.”
300. केवल कृस्त ही नहीं यहूदियों के नेता Moses की जन्मकथा भी कृष्ण जन्मकथा की नकल ही है. अतः हमारा स्पष्ट मत है की यहूदी और कृस्ती पूर्व में वैदिक समाज के अंग थे. कालांतर में जब वैदिक संस्कृति से बिछड़ गए तो प्रचलित कृष्ण जन्मकथा की ही नकल मारकर अपने अपने अलग पंथ, नेता और ग्रन्थ बना लिए-पी एन ओक