Friday, April 22, 2022

 


गौरवशाली भारत-१


Bharat Mata-1
     1.            भा-रत यानि सूर्य की दैवी आभा के ध्यान में रत रहने वाला देश. वैदिक सम्राट भरत प्रलय के पश्चात विश्व के सम्राट       हुए तब से सारे विश्व का भारतवर्ष नाम पड़ा. “वर्ष” शब्द पूरी गोल पृथ्वी का निदर्शक है. आंग्ल शब्द युनिवर्ष (Universe) में          भी वही संस्कृत शब्द उसी अर्थ से रूढ़ है. बारह मासों का एक वर्ष जब कहा जाता है तो वहां भी “वर्ष” शब्द गोल ऋतुचक्क         द्योतक है-पी.एन.ओक

२.     भारतियों को अरब लेखक हिन्दू कहा करते थे क्योंकि उस समय भारत निवासी सारे हिन्दू होते थे. फ्रेंच लोग भी भारतियों को हिन्दू ही कहते हैं-पी एन ओक

3.            वैदिक संस्कृति महान सिन्धुघाटी में पली बढ़ी और पुरे विश्व में फैली. इसलिए कालान्तर में भारत के वैदिक लोग खुद को गर्व से सिन्धु (सिन्धु प्रदेश के निवासी) अपभ्रंश हिन्दू कहने लगे और हिन्दुओं का मूल प्रदेश भारत हिन्दुस्थान भी कहा जाने लगा. तत्कालीन वैदिक संस्कृति के अनुयायी अरब ईरान के लोग हिन्दुओं का वैसे ही सम्मान करते थे जैसे मुसलमान आज सऊदी अरब के लोगों का करते हैं और हिन्दुस्थान की वे वैसे ही पूजा करते थे जैसे आज मुसलमान मक्का की और ईसाई रोम की करते हैं. महादेव के भक्त मोहम्मद के चाचा द्वारा भारत की गुणगान की कविता आज भी ताम्रपत्र में सुरक्षित है. परन्तु अरब (और ईरान) में वैदिक संस्कृति के विरोध में ईसायत और इस्लाम के उदय के पश्चात वैदिक संस्कृति का स्रोत हिन्दुओं और हिन्दुस्थान से वे घृणा करने लगे और कुछ लोग उनके लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने लगे.

४.            कुछ विद्वानों का मत है की हिन्दू शब्द सिन्धु से नहीं इन्दु (चन्द्रमा) से बना है. यूरोपीय लोग हिन्दू को इन्दु ही कहते थे और हिन्दुओं के देश को इंदीय (चन्द्रमा के समान) अपभ्रंश इंडिया कहते थे. चीनी यात्री हुवेन्त्संग ने लिखा है, “भारत के कई नाम हैं. प्राचीनकाल में भारत को शितु और हिनाऊ कहते थे किन्तु उसका सही उच्चार इन्दु है. उस नाम के प्रति बड़ा आदरभाव है. उस देश का नाम इन्दु इसलिए है की उस देश के विद्वानों ने अपने शीतल, धवल ज्ञानप्रकाश से चन्द्रमा जैसे ही सारे विश्व को उजागर किया.” (हुवेन्त्संग की यात्राकथा, अनुवादक सैम्युएल बील)    

५.     सिन्धु शब्द का ही अपभ्रंश हिन्दू हुआ यह सामान्य धारणा गलत भी हो सकती है. हिन्दू शब्द इन्दु (चन्द्रमा) से भी उत्पन्न हो सकता है जैसा की ह्वेन्त्संग ने भी अपने यात्रा वृतांत में लिखा है. अलबरूनी के ग्रन्थ से भी लगता है सिन्धु और हिन्दू शब्द दो अलग उच्चार है. अलबरूनी ने लिखा है की उसके प्रदेश से “सिंध में जाने केलिए हिमरोझ उर्फ़ सिजिस्थान से होकर जाना पड़ता है किन्तु यदि हिन्द में पहुंचना हो तो काबुल होकर जाना पड़ता है.” (पृष्ठ १९८, खंड १, एडवर्ड सचाऊ द्वारा अनुदित Al Baruni’s India) 

६.     जैसे भारत हि मानव जाति की माता है उसी प्रकार संस्कृत ही विश्व की सारी भाषाओँ की जननी है. संस्कृत में ही हमारा दर्शनशास्त्र पाया जाता है, गणित का भी स्रोत वही है, ईसाईपंथ में गढ़े आदर्शों का उद्गम भी भारत ही है. स्वतंत्रता, जनशासन आदि सारी प्रथाएं भारत-मूलक होने के कारन भारत ही विविध प्रकार से मानवी सभ्यता की जननी है-The Story of Civilization, लेखक-विलियम ड्युरन्ट, अमेरिका    

७.     हिन्दू लोग ग्रीकों से कितने ही अधिक अग्रसर होने के कारन वही ग्रीकों के गुरु रहे होंगे और ग्रीक लोग हिन्दुओं के शिष्य-The Theogony of the Hindus, Writer-Count Bionstiarna    

8.            मानवी सभ्यता का आरम्भ कश्मीर में हुआ. वही स्वर्ग था. मानवता का आरम्भ पूर्ववर्ती प्रदेशों में होने के कारन Iberians और Celts जैसी पश्चिमी जातियां वहीँ से निकली होंगी-Adelung (Origin of the Aryans, Writer-Sir Issac Taylor) 

९.     विश्व में यदि एसा कोई देश है जो मानवता का पलना होने का दावा कर सकता है या आरम्भ से मानव का निवासस्थान रहा और जहाँ से प्रगति और ज्ञान की लहरें सर्वत्र पहुंचकर मानव का पुनर्ज्जीवन होता रहा, तो वह देश भारत ही हो सकता है-Cruiser, a French writer

१०.    प्राचीन सभ्यताओं में जो समानता दिखती है उसका रहस्य समझ में नहीं आता था. अब पता लगता है कि वह किसी उन्नत सभ्यता के अंग-प्रत्यंग रहे और विश्व में फैले. वह उन्नत लोग आर्य कहलाते थे और वे निश्चय ही पूर्व के प्रदेशों के थे. उन्ही का एक भाग फिनिशियंस (यानि पणि या फणि अर्थात व्यापारी) लोग सागर पारकर सर्वत्र जा बसे. (Phoenician origin of the Britons, Scots and Anglo Saxons. Writer-L.A. Waddell, पृष्ठ-१०)     

११.    संस्कृत भाषा के गुण विशेष विश्वभर की भाषाओँ में पाए जाने के कारन उन सबका प्रसार उस एक केंद्र-स्थान से हुआ होगा जहाँ मानव आरम्भ में बसता था. (विष्णु पुराण की भूमिका पृष्ठ-Cii, प्रकाशक ऑक्सफ़ोर्ड, लेखक-एच.एच. विल्सन)             

१२.    बाइबिल के पूर्वभाग (Old Testament) का इतिहास और कालक्रम के बारे में जो आधुनिकतम संशोधन हुआ है उससे हम यह कह सकते हैं की ऋग्वेद प्राचीनतम ग्रन्थ है. केवल आर्यों का ही नहीं अपितु सारे मानवों का. अतः यह निष्कर्ष अनिवार्य हो जाता है की वैदिक आर्यों के उच्च और श्रेष्ठ सिद्धांत प्रारम्भिक दैवी आविष्कार द्वारा ही ज्ञात कराए गए थे. (पृष्ठ २११, The Teaching of Vedas, Writer-Father Philips)

१३.    इब्राहीम अबू अनाजिल उर्फ़ सिन्धवाद द सेलर की जो कथाएँ प्रसिद्ध है वह प्राचीन विश्व में सिन्धप्रांत के एक प्राचीन हिन्दू वैद्य थे जिन्हें रोग चिकित्सा केलिए विश्व के अनेक देशों से निमन्त्रण आता रहता था. अतः उन्हें बार बार सागर पार यात्रा करनी पडती थी-पी एन ओक

१४.    सिन्धु (हिन्दू) का शासन और न्यायव्यवस्था बड़ी तत्पर, सरल और पूर्ण समाधान करने वाली होती थी. मदिरा और स्त्रीलम्पटता का कहीं नामोनिशान नहीं था-विशारी मुकदसी, अरब निवासी

१५.    सिन्धु (हिन्दू) लोग गणित में बड़े प्रवीण हैं. अरब लोग भारतियों से ही गणित सीखे-काजी सईद अदलसी, अरब

१६.    एक हिन्दू राजा ने बेबिलोनिया और इजरायिलों को दण्डित करने केलिए उनके ऊपर चढ़ाई की थी-याकुबी, अरबी इतिहासकार

17.          भारतियों को अरब लेखक हिन्दू कहा करते थे क्योंकि उस समय भारत निवासी सारे हिन्दू होते थे. फ्रेंच लोग भी भारतियों को हिन्दू ही कहते हैं-पी एन ओक

18.          पाश्चात्य विद्वान बाइबिल के कहे अनुसार सृष्टि का निर्माण ४००४ ईसापूर्व मानते रहे जबकि भारतीय पंचांग के अनुसार सृष्टि निर्माण काल १९७२६४८०८४ वर्ष पूर्व है. आधुनिक भौतिक शास्त्रियों का भी यही हिसाब है. कुछ भारतीय विद्वानों का मत है की सतयुग और तत्पश्चात अन्य युगों का काल क्रमशः ४८०० वर्ष, ३६०० वर्ष, २४०० वर्ष और १२०० वर्ष है परन्तु यह दैवी वर्ष है. अतः उन्हें ३६० से गुना करने से प्रत्येक युग का काल मानवी वर्ष में प्राप्त होता है-पी एन ओक

१९.    मानव की प्रारम्भिक अवस्था के सम्बन्ध में सर्वत्र पूरा अज्ञानान्धकार फैला होने के कारन भारत से ही वह पूरी जानकारी प्राप्त होने की अपेक्षा है-फ्राईडिश श्लेगल, जर्मन विद्वान

20.          अनेक इतिहासकारों के कथन से यही निष्कर्ष निकलता है की आंग्लभूमि के मूल निवासी विश्व के पूर्वी भागों से आए थे-A Complete History of the Druids by Lichfield. इससे स्पष्ट है की वे भारत से ही आंग्ल भूमि में जा बसे थे क्योंकि उतने प्राचीन काल में सभ्यता केवल भारत में ही थी-पी एन ओक

21.          अरब स्थान के मक्का नगर में स्थित काबा प्राचीन काल में वैदिक तांत्रिक ढांचे पर बना एक विशाल देवमंदिर था. वैदिक अष्टकोण के आकार का वह मन्दिर था. काबा के मन्दिर में जब किन्ही विशेष व्यक्तियों को प्रवेश कराया जाता है तो उन्हें आँखों पर पट्टी बंधकर ही अंदर छोड़ा जाता है ताकि वह अंदर शेष रही वैदिक मूर्तियों के बारे में किसी को कुछ बता न पाएं. मन्दिर में जो चौकोन है उसके बाएँ वह प्राचीन शिवलिंग दीवार में आधा चुनवाया गया है. उसकी परिक्रमा करने केलिए पुरे मन्दिर की ही परिक्रमा करनी पड़ती है. यहाँ जाने वाले सारे मोहम्मदपंथी एक दो नहीं बल्कि उसी वैदिक प्रथा के अनुसार इस शिवलिंग की सात परिक्रमा करते हैं-पी एन ओक

22.          एकं पदं गयायां तु मकायां तु द्वितीयकम I तृतीयं स्थापितं दिव्यं मुक्त्यै शुक्लस्यम सन्निधौ II अर्थात विष्णु के पवित्र पदचिन्ह विश्व के तिन प्रमुख स्थान में थे-एक भारत के गया नगर में, दूसरा मक्का नगर में और तीसरा शुक्लतिर्थ के समीप. (हरिहरेश्वर महात्म्य, प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ)

२३.   Forum Romanum रोम नगर का प्राचीनतम स्थान है. वह प्रांगणम रामानम यानि भगवान राम का प्रांगण अर्थात राममन्दिर का स्थान था जिसे केंद्र मानकर रोम नगर बसाया गया. रोम भी राम नाम का ही यूरोपीय अपभ्रंश है-पी एन ओक

24.         प्राचीन इटली को एत्रुरिया (Etruria) उर्फ़ अत्रिरिय यानि अत्रि ऋषि का प्रदेश कहते थे. उस प्राचीन इटली की जीवन-प्रणाली का एत्रुस्कन (Etruscan) नाम भी अत्रि ऋषि से पड़ा. इटली के पूर्व तट पर अत्रि ऋषि के नाम पर ही अत्रियाटिक (Atriatic) सागर है-पी एन ओक

रेजिया नाम राजगुरु का संक्षिप्त रूप है. अत्रियम रेजिया इसलिए कहा जाता था की राजगुरु को अत्रि उपाधि प्राप्त थी और अत्रियम वेष्टे का अर्थ विष्णुभक्त अत्रि है. राजगुरु के भवन के प्राचीन रोम नगर में ऐसे वैदिक नाम थे. देव सेनापति मंगल के भाले वहां रखे जाते थे. (रोम अंई दि कैम्प्गना, लेखक आर. बर्न, पृष्ठ ४१)

25.          वेदों की आयु:

मैक्समूलर आदि पाश्चात्य विद्वान-३५०० वर्ष पूर्व

राजापुर के पाटनकर शास्त्री-२१००० वर्ष

लेले शास्त्री-४०००० वर्ष

पंडित सुधाकर द्विवेदी-५४००० वर्ष

पंडित कृष्णशास्त्री गोडबोले-७२००० वर्ष

पंडित दीनानाथ चुलेट-१५ लाख वर्ष

स्वामी दयानंद सरस्वती-लगभग दो अरब वर्ष यानि सृष्टि के प्रारम्भ से

26.         चतुर्युग अर्थात सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग कुल ४३२०००० वर्षों का होता है जिसे एक चक्र कहते हैं. १००० चक्र अर्थात ४३२००००००० वर्ष को एक कल्प कहते हैं जो बिगबैंग सिद्धांत के अनुरूप सृष्टि निर्माण काल और विरामकाल के अनुरूप है. एक कल्प में १४ मन्वन्तर होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक को मनु कहते हैं. वर्तमान मनुस्मृति चालू मन्वन्तर की आचारसंहिता है. वर्तमान विश्व सातवें मन्वन्तर में है जो सौर्यमंडल सिद्धांत और सूर्य के वैज्ञानिक आयु के समकक्ष है.

27.         ईश्वरः सर्व भूतेषु हृदेशे अर्जुन तिष्ठति

भ्राम्यन सर्वभूतानि यंत्ररुढ़ानि मायया.

अर्थात समूचा विश्व एक यंत्र है जिस पर आरूढ़ जीवों सहित वह घूम रहा है. ईश्वर अपनी माया (शक्ति) से उन्हें घुमा रहा है. (श्रीमद्भागवत गीता)

28.         प्राचीन काल से भारतीय लोग सागर पार जाते रहे हैं. विभिन्न देशों में भारतियों के धार्मिक प्रणाली के चिन्ह उसके साक्ष्य है.(Annals and Antiquities of Rajsthan by colonal jems Tod)

हिन्दुस्थान के लोग प्राचीन समय में सागर संचार में बड़े कुशल माने जाते थे. (India in Greece by Edward Pococke)

व्यापारी विभिन्न देशों से माल लाकर भारतीय राजाओं को भेंट दिया करते थे-मनुस्मृति

(नोट-धूर्त वामपंथी इतिहास्याकर बताते हैं की आर्यजन समुद्र देखे नहीं थे और हिन्दू विदेश यात्रा को अशुभ मानते थे इसलिए समुद्र यात्रा नहीं करते थे. ये दोनों बात गलत है. दरअसल आधुनिक ईसायत और इस्लाम के उत्थान के बाद इन हिंसक धर्मान्धों के द्वारा अरब और यूरोप के हिन्दुओं (वैदिक संस्कृति के अनुयायी) के प्रति हिंसा से सशंकित हो या इन देशों में जाकर कहीं वे भी विधर्मी न बन जाये इस डर से वे विदेश गमन और समुद्र यात्रा करने से मना करने लगे जो कालान्तर में अशुभ मान लिया गया.)

२९.   परशुराम ने इक्कीस बार विश्व में संचार कर उत्पातशील क्षत्रियों का दमन किया था. उनमे से एक बार उन्होंने भारतवर्ष का वह हिस्सा जिसे आज ईरान कहा जाता है पर चढ़ाई की. पोकोक ने अपने ग्रन्थ इण्डिया इन ग्रीस पुस्तक के पृष्ठ ४५ पर लिखा है की परशुधारी परशुराम ने ईरान को जीतने पर उस देश का परशु से पारसिक उर्फ़ पर्शिय एसा नाम पड़ा.

30.         ईरान, कोलचिस और आर्मेनिया के प्राचीन नक्शे से उन प्रदेशों में भारतीय बसे थे इसके स्पष्ट और आश्चर्यकारी प्रमाण मिलते हैं. और रामायण तथा महाभारत के अनेक तथ्यों के वहां प्रमाण मिलते हैं. उन सारे नक्शे में बड़ी मात्रा में उन प्रदेशों में भारतियों के बस्ती का विपुल ब्यौरा मिलता है. (Page 47, India in Greece by Edward Pococke)

31.         एडवर्ड पोकोक अपने उसी ग्रन्थ के पृष्ठ ५३ पर लिखते हैं की यूरोपीय क्षत्रिय, स्कैंडिनेविया के क्षत्रिय और भारतीय क्षत्रिय सारे एक ही वर्ग के लोग है. पी एन ओक लिखते हैं की उत्तरी यूरोप के डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन आदि देशों में शिवपुत्र स्कन्द की पूजा होती थी इसलिए उस क्षेत्र को संस्कृत शब्द स्कंदनावीय अपभ्रंश स्कैंडिनेविया नाम पड़ा है.

32.         ग्रीक लोग स्वर्ग को Koilon कहते हैं और रोमन Coelum. ये दोनों संस्कृत शब्द कैलास के अपभ्रंश हैं. (पृष्ठ ६८, पोकाक के ग्रन्थ इंडिया इन ग्रीस)

स्वयं ग्रीस (Greece) संस्कृत शब्द गिरीश का अपभ्रंश है. ग्रीक नाम Cassopoi वस्तुतः संस्कृत शब्द काश्यपीय है जिसका अर्थ होता है काश्यप के अनुयायी या वंशज.

33.         रोम के ईसापूर्व जीतने मूर्तिपूजक पैगन पंथ (हिन्दू, बौद्ध आदि) थे उनके सिद्धांत ईसाई पंथ के सिधान्तों से कहीं अधिक शरीर, मन, बुद्धि, चेतना आदि सभी का समाधान करनेवाले होते थे. उनकी परम्परा बहुत प्राचीन थी. विज्ञान और सभ्यता पर वे आधारित थी. उनकी देवताए बड़ी दयालु कही जाति थी. वह धार्मिक प्रणाली तर्क पर आधारित थी. अगले जन्म में अधिक शुद्धभाव और पुन्य प्राप्ति हो यह ध्येय रखा जाता था. ईसाई पंथ ने उस विरोधी परम्परा से ही अपने तथ्य बनाकर उन पंथों का खंडन करना आरम्भ किया. (Preface of Oriental Religious by Grant Showerman, the prof. of Visconsis University)

34.         इसमें कोई संदेह नहीं की ईसाईपंथ के कुछ विधि और त्यौहार मूर्तिपूजकों की प्रणाली का अनुकरण करते हैं. चौथी शताब्दी में क्रिसमस का त्यौहार २५ दिसम्बर को इसलिए माना गया की इस दिन प्राचीन परम्परानुसार सूर्यजन्म का उत्सव होता था. पूर्ववर्ती देशों में और विशेषतः उनकी प्राचीन धर्म-प्रणाली में हमें उनके व्यवसाय और सम्पत्ति, तांत्रिक क्षमता, कला, बुद्धि और विज्ञान का परिचय प्राप्त होता है.(Preface of Oriental Religious by क्युमोंट)

35.         हिन्दू प्रणाली की प्राचीनता की कोई बराबरी नहीं कर सकता. वहीँ (आर्यावर्त में) हमें न केवल ब्राह्मण धर्म अपितु समस्त हिन्दू प्रणाली का आरम्भ प्रतीत होगा. वहां से वह धर्म पश्चिम में इथिओपिया से इजिप्त और फिनिशिया तक बढ़ा; पूर्व में स्याम से होते हुए चीन और जापान तक फैला; दक्षिण में सीलोन और जावा सुमात्रा तक प्रसारित हुआ और उत्तर में ईरान से खाल्डइय, कोलचिस और हायपरबोरिया तक फैला. वहीं से वैदिक धर्म ग्रीस और रोम में भी उतर आया. (पृष्ठ १६८, The Theogony of the Hindus by कौन्ट विअन्स्तिअर्ना)

36.         इजिप्त का धर्म भी प्राचीन भारत का ही धर्म था. इसका प्रमाण हमें मोझेस (यहूदी लोगों का नेता) के कथन से मिलता है. मोझेस के धर्मतत्व एक ईश्वर की कल्पना पर ही आधारित थे. वेदों का तात्पर्य भी वही है. मोझेस की धर्म-प्रणाली और सृष्टि-उत्पत्ति की धारणाएँ कुछ मात्रा में उसी हिन्दू वैदिक स्रोत की दिखती है. (पृष्ठ १४४, The Theogony of the Hindus by कौन्ट विअन्स्तिअर्ना)

37.         Pantheism, Spinogism, Hegelianism आदि जो आध्यात्मिक धारणाएँ हैं वह कहती है की चराचर में ईश्वर सर्वव्यापी है; उसी परमात्मा का अंश मानव में भी है; मृत्यु के पश्चात जिव की आत्मा परमात्मा में विलीन होती है; जन्म-मृत्यु का चक्र अखण्ड घूमता रहता है-यह सारी कल्पनाएँ हिन्दू परम्परा की ही तो है. (पृष्ठ २९-30, Bharat-India as seen and known by foreigners)

38.         बारीकी से जांच करने पर किसी शुद्ध भाव के व्यक्ति को यह मानना पड़ेगा की हिन्दू ही विश्व-साहित्य और ईश्वरज्ञान के जनक हैं-W. D. Brown

कुछ पाश्चात्य श्रेष्ठियों को अभी इस बात का पता नहीं है की हिन्दू ही विश्व के प्राचीनतम शासक हैं-Sir James Coird

39.         इस बात का संदेह नहीं हो सकता की हिन्दू जाति कला और क्षात्रबल में श्रेष्ठ थी, उनका शासन बड़ा अच्छा था, उनका नीतिशास्त्र बड़ी बुद्धिमानी से बनाया गया था और उनका ज्ञान बड़ा श्रेष्ठ था. प्राचीनकाल में हिन्दू व्यापारी लोग थे इसके विपुल प्रमाण हैं. ग्रीक लेखकों का निष्कर्ष है की हिन्दू बुद्धिमान और सर्वश्रेष्ठ थे. खगोल ज्योतिष और गणित में वे अग्रगण्य थे. (Culcutta Review, दिसम्बर, १९६१)

40.         हिन्दू जाति सर्वप्रथम सागर पार कर अपना माल अज्ञात प्रदेशों में पहुँचाया. उन्होंने ही आकाशस्य नक्षत्रादीयों का प्रगाढ़ अध्ययन कर ग्रह आदि के भ्रमण गतियों का अध्ययन किया, उनका स्थान जाना और उनका नामकरण किया. अनादिकाल से भारत ही निजी अग्रसरत्व केलिए ख्यात है और उसमें प्राकृतिक तथा हस्तकला की सुंदर कृतियों की सर्वदा विपुलता रही है-Dionysius (पृष्ठ १४-१५ देशपांडे जी की पुस्तक)

41.         पृथ्वी पर यदि एसा कोई देश है जहाँ मानव का लालन-पालन सर्वप्रथम हुआ या उस आद्यतम सभ्यता का गठन हुआ जो अन्य प्रदेशों में फैली और मानव को नवजीवन प्रदान करने वाले ज्ञान का प्रसार जहाँ से सारे विश्व में हुआ तो वह देश है भारत-Cruiser, French writer

42.         भारत के दार्शनिक साहित्य में इतने ओतप्रोत तथ्य मिलते हैं और वे इतने श्रेष्ठ हैं की उनकी तुलना में यूरोपियों के तथ्य अति हिन प्रतीत होते हैं. उससे हमें भारत के सामने नतमस्तक होकर यह मानना पड़ता है की मानव के उच्चतम दर्शनशास्त्र की जननी भारत है भारत-Victor Cousin

43.         हिन्दू लोग गिनती में विश्व के अन्य सभी प्रदेशों के लोगों के इतने थे-Ctesias (पृष्ठ २२०,  Volum II Historical Researches)

विश्व के केवल आधे लोग हिन्दू नहीं थे बल्कि अधिकतम लोग हिन्दू ही थे भले ही उनका पंथ अलग अलग हो-पी एन ओक

44.         जिस जीवन प्रणाली का आविष्कार भारत में हजारों वर्ष पूर्व हुआ वह हमारे जीवन का एक अंग बन गयी है और हमारे आसमंत में सर्वत्र हमें उसकी अनुभूति होती है. सभी जगत के कोने-कोने तक वह प्रणाली पहुंची है. चाहे अमेरिका हो या यूरोप हर प्रदेश में गंगाप्रदेश से आई हुई उस सभ्यता का प्रभाव दीखता है-Delbos, फ्रेंच विद्वान, Bharat-India as seen and known by foreigners

45.         जिस प्राचीनतम सभ्यता के अवशेष हमें प्राप्य है वह हिन्दू सभ्यता है. कार्यकुशलता और सभ्यता में वह बेजोड़ रही है. जिन सभ्यताओं का नामनिर्देशन इतिहास में है उनका उदय भी उस समय नहीं हुआ था जब हिन्दू सभ्यता चरम उत्कर्ष पर पहुँच चुकी थी. हम उसकी जितनी अधिक खोज करें उतना ही उसका विशाल और विस्तृत स्वरूप सामने आता है. (The Edinburgh Review, October 1872, England)

46.         विश्व में स्वतंत्र विचार-प्रणाली केवल हिंदुत्व की छत्रछाया में ही रह सकती है-पी एन ओक

47.         विश्व के विविध धर्मों का अध्ययन लगभग चालीस वर्ष तक करने के पश्चात मुझे हिन्दुधर्म के इतना सर्वगुणसंपन्न और आध्यात्मिक धर्म अन्य कोई नहीं दिखा. उस धर्म के बाबत जितना अधिक ज्ञान बढ़ता है उतना ही उसके प्रति प्रेम बढ़ता है. उसे अधिकाधिक जानने का यत्न करने पर वह अधिकाधिक अमोल-सा प्रतीत होता है. एक बात पक्की ध्यान में रखें की हिंदुत्व के बिना हिन्दुस्थान का कोई अस्तित्व नहीं है. हिंदुत्व ही हिन्दुस्थान की जड़ है. यदि हिंदुत्व से हिन्दुस्थान बिछड़ गया तो हिन्दुस्थान उसी तरह निष्प्राण होगा जैसे कोई वृक्ष उसकी जड़ें काटने से होता है- श्रीमती एनी बेसेंट, Hindus, Life Line of India by G.M. Jagtian

48.         भारत में कई धर्म और कई जातियां हैं तथापि उनमे से कोई भी हिन्दुधर्म के इतने प्राचीन नहीं है और भारत के राष्ट्रीयत्व के लिए वे आवश्यक नहीं है. वे जैसे आए हैं वैसे चले भी जायेंगे किन्तु हिन्दुस्थान बना रहेगा. यदि हिंदुत्व ही नष्ट हो गया तो भारत में रह ही क्या जाएगा केवल एक भूमि. यदि हिन्दू ही हिंदुत्व को सुरक्षित नहीं रखेंगे तो और कौन रखेगा? यदि भारत के सन्तान ही हिंदुत्व को नहीं अपनाएँगे तो हिंदुत्व का रक्षण कौन करेगा? भारत और हिंदुत्व एक ही व्यक्तित्व है-श्रीमती एनी बेसेंट, Hindus, Life Line of India by G.M. Jagtian

49.         निःसंदेह सारे विश्व में हिन्दुराष्ट्र प्राचीनतम है. वह आद्यतम और सर्वाधिक तेजी से प्रगत हुआ. जब नीलगंगा की दर्रें पर पिरैमिड खड़ी भी नहीं हुई थी, जब आधुनिक सभ्यता के स्रोत समझे जाने वाले ग्रीस और इटली के प्रदेशों में जंगली जानवर ही निवास करते थे उस समय भारत एक धनी और वैभवसम्पन्न राष्ट्र था. (History of British India by Thornton)

50.         यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम (श्रीमद्भगवत गीता)

यही भविष्यवाणी यहूदी लोगों में भी प्रचलित है. यहूदी लोग वास्तव में भगवान कृष्ण के यदु लोग ही हैं जो द्वारिका के समुद्रमग्न होने के पश्चात पश्चिम चले गये. ईसाई लोगों के बाइबिल के प्राचीन धर्मवाणी (ओल्ड टेस्टामेंट) भाग में भी इस भविष्यवाणी का उल्लेख है. जीसस क्राइस्ट (Jesus Christ) वास्तव में इशस (ईश्वर का संस्कृत) कृष्ण का ही विकृत उच्चारण है. अतः ईश्वरावतार सम्बन्धी मूल भविष्यवाणी वैदिक परम्परा की है-पी एन ओक

51.         यहूदी, ईसाई और इस्लामी पंथ में जिस मूल धर्मप्रवर्तक अब्राहम का उल्लेख हुआ है, वे ब्रह्मा ही हैं. ब्रह्मा को अब्रम्हा कहना वैसी ही उच्चारण विकृति है जैसे स्कूल को अस्कूल और स्टेशन को अस्टेशन कहने में होती है. मुसलमानों में वही वैदिक ब्रह्मा अब्राहम के बजाए इब्राहीम उच्चारा जाता है-पी एन ओक

52.         ईश्वर का संस्कृत शब्द इशस बाइबिल में Jesus, यहूदी में issac (इशस) जबतक c का उच्चारण स होता रहा तब तक इशस; c का उच्चारण क होने पर आयझेक, इस्लाम में इशाक (issac अर्थात इशस) कहलाता है. अतः स्पष्ट है सारे विश्व में प्राचीन काल में भगवान का नाम वैदिक परम्परा के अनुसार इशस ही था-पी एन ओक

53.         वैदिक प्रलय की परम्परा भी सभी पंथों में दिखाई देती है. प्रलय के बाद मनु के द्वारा मानव की उत्पत्ति होती है. संस्कृत में मनु को मनु: अर्थात मनुह उच्चारण होता है. उसी मनुह का अपभ्रंश बाइबिल में नोहा और इस्लाम में केवल नूह बच गया-पी एन ओक 

54.         प्राचीन यूरोप में भी दक्षिण-पूर्व के देशों की तरह रामायण का पाठ होता था. रामलीला भी होता था. जर्मनी और इराक में प्राचीन गुफाओं की खुदाई में भगवान राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान के भित्ति चित्र भी मिले हैं. इसी कारन राम, हनुमान आदि नाम यूरोपीय परम्परा में कायम है. मिस्र का शासक रामसेने; जर्मनी का Haneman, अन्य देशों में Heinemann अर्थात हनुमान ही है-पी एन ओक

55.         वैदिक संस्कृति के साथ साथ संस्कृत ही प्राचीन काल में पुरे विश्व की भाषा रही है. संस्कृत शब्दों के विकृत उच्चार ही प्रत्येक भाषा में रूढ़ है. बाइबिल के Genesis खंड के ग्यारहवें अध्याय में लिखा है, “सारे पृथ्वी की एक ही भाषा, एक ही बोली थी. और जब वे पूर्व से (पश्चिम की ओर) चले उन्हें शिनेर प्रदेश में एक मैदान दिखा और वे वहीं बसे. तब भगवन ने कहा, देखो सब एक ही हैं और सब की भाषा एक ही है….भगवन ने वहीं से उन्हें अलग अलग प्रदेशों में भेजा.” (वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास, भाग-१)

56.         बाइबिल में सृष्टिनिर्माण का वैदिक वर्णन ही है. बाइबिल के प्रथम खंड बुक ऑफ़ जेनेसिस में लिखा है “आरम्भ में ईश्वर ने आकाश और पृथ्वी निर्माण किए. उन्हें प्रथम कुछ विशेष आकर नहीं था. सर्वत्र अंधकार छाया था और शुन्यावस्था थी. और ईश्वर की आत्मा जल के उपर विराजमान थी” (अर्थात क्षीरसागर में लेटे भगवान विष्णु). 

57.         बाइबिल के उत्तरखंड में जॉन विभाग में लिखा है, “सर्वप्रथम एक ध्वनि (शब्द) निकला, वह शब्द ईश्वर का था अपितु वह शब्द ब्रह्म ही था.”

और वह शब्द ॐ ही हो सकता है. NASA ने साबित कर दिया है की सूर्य से ॐ जैसी ध्वनि निकलती है और शून्य आकाश अर्थात ब्रह्माण्ड में भी इसी ध्वनि की तरंगे प्रवाहित हो रही है.

58.         जिस प्रकार वैदिक परम्परा में तुलसी के पौधे को सम्मान दिया गया है, उसी प्रकार यहूदी, मुसलमानों और ईसाईयों में भी प्राचीनकाल में इसे सम्मान प्राप्त था. तुलसी के बारे में फोनी पार्क्स लिखते हैं-“इस पौधे को हिन्दू एवं मुसलमानों में उच्च सम्मान प्राप्त है. यह प्रोफेट में लिखा है की उसने कहा, ‘हसन एवं हुसैन इस दुनिया में मेरे दो प्यारे तुलसी के पौधे हैं.” (Page-43, Oxford University Press, London 1975)

59.         हिन्दू लोगों का दावा है की काबा के दिवार में फंसा पवित्र मक्का के मन्दिर का काला पत्थर (संगे असवद) महादेव ही हैं. मुहम्मद ने तिरस्कारवश उस पत्थर को दीवार में चुनवा दिया था तथापि अपने प्राचीन धर्म से बिछुड़कर नए नए बनाये गये मुसलमान उस देवता के प्रति उनके श्रद्धा भाव को छोड़ ने सके-Fanny Parks, Oxford University Press, London, 1975

60.         संस्कृत ही पूरी पृथ्वी की मूल भाषा है. (Indian Antiquities, Part-IV, Page-455)

संस्कृत सबसे सुंदर भाषा है और लगभग सभी प्रकार से परिपूर्ण है-पिकेट, यूरोपीय विद्वान

61.         सारी प्राचीन भाषाओँ में संस्कृत की एक बड़ी विशिष्टता है. वह इतनी आकर्षक है और उसकी प्रशंसा की गयी है की उसके बडप्पन की बाबत स्त्रियों जैसी मन में असूया की भावना निर्माण होती है. हम भी तो इंडो-यूरोपीय हैं जो एक प्रकार से आज भी संस्कृत में ही बोलते हैं और सोचते हैं. या यूँ कहा जाए की संस्कृत मौसी जैसी हमें प्यारी है और हमारी माता जीवित न होने के कारन संस्कृत ही हमें माँ जैसी लगती है-मैक्समूलर, जर्मन विद्वान

62.         यूरोपीय लोगों का उच्चतम दर्शनशास्त्र, जो ग्रीक साहित्य में आदर्श तर्कवाद कहलाता है, वह प्राच्य (भारतीय) आदर्शवाद के चकाचौंध कर देने वाले प्रकाश की तुलना में इतना फीका दीखता है जैसे प्रखर सूर्यप्रकाश में कोई टिमटिमाता दिया. (History of Literature by A. Schlegal)

63.         सारे विश्व के साहित्य में उपनिषदों जैसा उपयुक्त तथा सत्त्वगुणयुक्त साहित्य नहीं है. मेरे जीवन में उससे मुझे बड़ा समाधान प्राप्त हुआ है और मृत्यु के समय भी वही मेरा सहारा रहेगा-शोपेनहोवर, जर्मन विद्वान

64.         लैटिन भाषा का उद्गम तो संस्कृत में पाया जाता है क्योंकि लैटिन के कई शब्द ग्रीक शब्दों से बड़े विकृत से लगते हैं. अतः यह कहना की लैटिन भाषा ग्रीक से निकली है उचित नहीं है. (Page 61, The Celtic Druids, by Godfrey Higgins)

65.         सारे देशों में भारत में ही प्रथम मानव बस्ती हुई और वे भारतीय ही अन्य सारे जनों के प्रजनेता रहे. प्रलय के पूर्व ही भारतियों की सभ्यता चरम सीमा तक पहुंच चुकी थी. सारे विश्व में फ़ैल जाने से पूर्व मानव की जो श्रेष्ठतम प्रगति हो चुकी थी वह भारत के लोगों में स्पष्ट दीखती थी. यद्यपि हमारे पादरियों ने उस सभ्यता को छुपा देने का बहुत यत्न किए लेकिन वे पादरी उनके कुटिल दाव में यशस्वी रहे. (Page 66, The Celtic Druids, by Godfrey Higgins)

66.         वैदिक संस्कृति और संस्कृत भाषा ही प्राचीनतम है; उनका उद्भव भारत में ही हुआ; उसका सभ्यता स्तर श्रेष्ठ था और पादरियों ने उस सभ्यता के श्रेष्ठत्व को छिपाए रखने का भरसक प्रयत्न किया. (The Celtic Druids, by Godfrey Higgins)

67.         कुछ विद्वान भाषा-उत्पत्ति की प्रचलित पाश्चात्य धारणा से संतुष्ट नहीं है. भाषा-उत्पत्ति के पाश्चात्य विद्वानों के विवरण उन्हें न जंचने के कारन वे अंत में इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं की पहली भाषा प्रत्यक्ष भगवान ने ही मानव को प्रदान करने का चमत्कार किया. और वह भाषा देववाणी संस्कृत हो सकती है. (Encyclopedia Britannica, Edition-1951, Part-13, Page 70)

68.         विश्व में जितनी लिपियाँ है वे सारी एक ही मूल लिपि की शाखाएँ हैं. (Page-195, The Alphabet by Devid Driger)

वह लिपि या लिपियाँ ब्राह्मी और देवनागरी ही हो सकती है क्योंकि प्राचीनतम जो भाषा है संस्कृत उसकी वह दो देवदत्त लिपियाँ हैं एसा उन दो लिपियों के नामों से ही स्पष्ट है-पी एन ओक

69.         Old Testament का इतिहास और कालक्रम इनका आधुनिक संशोधन ध्यान में लेकर हम सरलतया यह कह सकते हैं की ऋग्वेद केवल आर्यों का ही नहीं अपितु सारे मानवों का प्राचीनतम ग्रन्थ है. (Page 213, The Teaching of the Vedas, by Rev. Morris Philip)

70.         जिन जिन भाषाओँ में संस्कृत का रिश्ता दिखाई देता हो वे सभी उस मूल देवदत्त साहित्य के ही अंग हैं जिसे किसी एक मूलस्थान में पढ़कर मानव पृथ्वी के विधिन्न प्रदेशों में जाकर बसते रहे. (H.H. Wilson, Page ciii, preface to Vishnu Puran, Oxford)

71.         चक्राणासः परीणहं पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुभमाना:

न हिन्दानासस्ति तिरुस्त इंद्रा परिस्पर्शो अद्घातु सूर्येण. (ऋग्वेद १०/१४९/१)

अर्थात पृथ्वी गोल है. उसके आधे भाग पर सूर्य चमकता है और दुसरे अर्द्ध पर अँधेरा होता है (अर्थात पृथ्वी अपने अक्ष पर घुमती रहती है). पृथ्वी सूर्य से आकर्षित होकर टंगी रहती है. (अनुवाद-पंडित रघुनंदन शर्मा, वैदिक सम्पत्ति)

सविता यन्त्रै: पृथ्वीमरम्णअन अस्कम्भने सविता द्यामदृहत.

अर्थात सौर्य यंत्र पृथ्वी को परिभ्रमण कराता है. अन्य ग्रह भी उसी प्रणाली से घूमते हैं. (वही ग्रन्थ)

72.         प्राध्यापक लुडविग कहते हैं की पृथ्वी का अक्ष भूमध्य रेखा के प्रति झुका होने का ज्ञान ऋग्वेद में मिलता है जिसका उल्लेख ऋग्वेद १/१०/१२ और १०/८९/४ में है. (बालगंगाधर तिलक का ग्रन्थ ओरियन, पृष्ठ ५८)

73.         एक प्राचीन यांत्रिक ग्रन्थ शिल्पसन्हिता में दूरबीन यंत्र का उल्लेख इस प्रकार है:

“मिट्टी भुन के उससे प्रथम कांच बनती है. एक पोली नलिका के दोनों नुक्कड़ पर वह कांच लगाई जाति है. दूर के नक्षत्र आदि देखने में तुरी यंत्र जैसा उसका उपयोग किया जाता है.

74.         एक प्राचीन शास्त्रज्ञ कणाद ऋषि लिखते हैं की चुम्बक की अदृश्य कर्षण शक्ति के कारन लोहा चुम्बक के प्रति खिंचा जाता है. (वैशेषिक दर्शन ५/१/१५)

75.         शिल्पसन्हिता नामक ग्रन्थ में पारा, सूत्र, तेल और जल आदि सामग्री लेकर तापमापन यंत्र (थर्मामीटर) बनाने की पद्धति का वर्णन है. सिद्धांत शिरोमणि नामक प्राचीन ग्रन्थ में भी एक प्राचीन तापमापक यंत्र का वर्णन है.

76.         प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ बृहदविमानशास्त्र, गयाचिन्तामणि, भागवतम, शानिस्त्रोत और रामायण में विमानों का उल्लेख है. बंगलोर के इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस के विमान विभाग के पांच रिसर्चरों का शोध पत्र मद्रास से प्रकाशित द हिन्दू पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. शोधकों ने लिखा था, “भरद्वाज मुनि द्वारा लिखित बृहदविमानशास्त्र ग्रन्थ में वर्णित विविध विमानों में से ‘रुक्मी’ प्रकार के विमान का वहनतंत्र या उड़ानविधि समझ में आती है. उस विधि द्वारा आज भी विमान की उडान की जा सकती है. किन्तु अन्य विमानों का ब्यौरा समझ नहीं आता.

77.         प्राचीन काल के वैदिक शास्त्रों में ८ प्रकार के उर्जा स्रोत से चलनेवाले यंत्र का वर्णन मिलता है:

१.शक्त्योद्गम-विद्युत् उर्जा से चलने वाले यंत्र

२.भूतवह-जल या अग्नि उर्जा से चलने वाले यंत्र

३.धूमयान-वाष्प उर्जा से

४.सूर्यकांत या चन्द्रकांत-हीरे, मानिक जैसे रत्नों से

५.वायुशक्ति यंत्र

६.पंचशिखी-खनिज तेल से चलनेवाले यंत्र

७.सूर्यताप यंत्र

८.पारे के भाप उर्जा से (यह उर्जा वैज्ञानिकों के समझ से अभी तक परे है क्योंकि पारे से भाप बनाने केलिए वर्तमान में अत्यधिक ताप की आवश्यकता होती है.) (वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास, भाग-१)

78.         आग्नेयास्त्र बनाने की विधि शुक्रनीति नामक प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ में मिलता है. शुक्रनीति ग्रन्थ के अध्याय १, श्लोक ३६७ में एक ऐसे विधि का वर्णन है जिससे २० सहस्त्र मील दुरी पर चलनेवाली बातों का पता राजा को उसी दिन लग जाता था (अर्थात आधुनिक दूरभाष, आकशवाणी)

79.         भुमेर्बाहि: द्वादाशयोजनानि भुवयुर्म्बम्बुदविद्युत्ताद्याम

अर्थात आकाश में जो बिजली कड़कती है वह और बादल पृथ्वीस्तर से १२ योजन दूर उपर आकाश में होते हैं.

ह्रस्वो रूक्षोऽप्रशस्तश्च परिवेषस्तु लोहितः |

आदित्ये विमले वीलम् लक्ष्म लक्ष्मण दृश्यते || (६-२३-९, बाल्मीकि रामायण)

अर्थात O, Lakshmana! A dark stain appears on the cloudless solar disc (सौर्य धब्बा), which is diminished, dreary, inauspicious and coppery.” अनुवाद https://valmikiramayan.net/

80.         भास्कराचार्य ने Differential Calculas नाम की गणना विधि चलाई थी. ईसापूर्व १०० वर्ष या उससे भी अधिक पूर्वकाल के आर्यभट ने वर्गमूल और घनमूल विधि, Arithmetical progressing summation of series और पाई की संख्या आदि गणितीय तंत्रों का प्रयोग किया था. Indeterminate equation of the second degree का श्रेय जिस युलर को दिया जाता है उससे हजारों वर्ष पूर्व ब्रह्मगुप्त के समय में भारत को ज्ञात थी.

81.         आईन्स्टीन के हजारों वर्ष पूर्व व्यास जी ने दिग्देशकालभेद अर्थात समय और अंतर की शुन्यता का विवरण दिया है. गोडफ्रे हिंगिस लिखते हैं, “विज्ञान में तो ग्रीक लोग शिशु जैसे थे. प्लेटो, पायथागोरस आदि जैसे उनके विद्वजन जब पूर्व की ओर (यानि भारत) गए ही नहीं थे तो उन्हें विज्ञान की जानकारी होती भी कहाँ से? विज्ञान और अन्य विद्याओं में वे भारतियों से पिछड़े हुए थे. उन्होंने या तो अज्ञानतावश सारी गापड-शपड. कर रखी है या जानबूझकर घोटाला कर रखा है. (Page 112, The Celtic Druids)

82.         चीनी और अन्य प्राच्य पर्यटकों को कम्पास ज्ञात था. पाश्चात्यों ने उन्ही से कम्पास का उपयोग सिखा. मार्कोपोलो चीन से वैसा एक यंत्र यूरोप लाया और लगभग उसी काल में वास्कोडिगामा ने भी वैसा ही यंत्र भारत से प्राप्त किया था. (Page 113, The Celtic Druids, Godfrey Higgins)

83.         कई लोगों की धारणा है की ड्रउइड आदि प्राचीन लोग टेलिस्कोप का प्रयोग करते थे. Diodorus Siculus लिखता है की कोलटक के पश्चिम के एक द्वीप में ड्रउइडस द्वारा लगाए एक दर्पण-यंत्र से सूर्य और चन्द्रमा बड़े समीप से दीखते थे. ड्रउइड द्रविड़ का यूरोपीय अपभ्रंश है. ड्रउइडस भारतीय ऋषि, विद्वान या ब्राह्मण थे. (वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास, भाग-१)

84.         ड्रुइड लोग बारूद बनाना जानते थे. मोरिस नाम के लेखक का उल्लेख है की अति प्राचीन काल से हिन्दू लोग बारूद का उपयोग जानते थे. क्रोफर्ड नाम के दुसरे लेखक का भी वही मत है (खंड २, पृष्ठ १४९)

85.         वैदिक लोग ‘लोक’ नामक एक संख्या का प्रयोग करते थे जिसका मान १०१९ अर्थात १ पर १९ शून्य के बराबर है. जिन लोगों को १ पर १९ शून्य इतनी बड़ी संख्या का उपयोग करना पड़ता था उनका गणित, व्यापार और उद्योग कितना अग्रसर होगा. जगन्नाथपुरी के शंकराचार्य ने वैदिक मैथेमेटिक्स नामक ग्रन्थ वेदों के अध्ययन कर के ही लिखा था-पी एन ओक

86.         वेदों में ऋचाओं की संख्यां १०५८० है; शब्द १५३८२० और अक्षर हैं ४३२०००. यह संख्यां महज संयोग है या सूक्ष्म गणित या कोई रहस्य? निचे देखें:

“चतुर्युग अर्थात सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग कुल ४३२०००० वर्षों का होता है जिसे एक चक्र कहते हैं. १००० चक्र अर्थात ४३२००००००० वर्ष को एक कल्प कहते हैं जो बिगबैंग सिद्धांत के अनुरूप सृष्टि निर्माण काल और विरामकाल के अनुरूप है. एक कल्प में १४ मन्वन्तर होते हैं. वर्तमान विश्व सातवें मन्वन्तर में है जो सौर्यमंडल सिद्धांत और सूर्य के वैज्ञानिक आयु के समकक्ष है.

87.         प्राचीन वैदिक वैज्ञानिकों को छः प्रकार की बिजली ज्ञात थी-

१.तड़ित-जो चमड़े या रेशम के घर्षण से उत्पन्न होती थी

२.सौदामिनी-कांच या रत्नों के घर्षण से निर्माण की जाने वाली

३.विद्युत्-मेघ या वाष्प से उत्पन्न

४.शतकुम्भी-जो बैटरी से निकलती है

५.हृदिनी- बैटरी के कुम्भों में संचित उर्जा

६.अशनि-चुम्बकीय दंड से उत्पन्न (वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास, भाग-१)

८८.   किसी भी क्षेत्र में उच्चतम स्तर को प्राप्त व्यक्ति को वैदिक प्रणाली में ब्राह्मण कहा जाता था. मनुस्मृति के अनुसार जन्म से सभी शुद्र ही होते हैं अतः किसी भी कुल में जन्मा व्यक्ति निजी योग्यता बढ़ाते बढ़ाते ब्राह्मणपद पर पहुंच सकता था यदि वह १.निष्पाप शुद्ध आचरण वाला जीवन यापन करता है २.अध्ययन त्याग और निष्ठा से करे ३.स्वतंत्र जीविका उपार्जन करता है ४.उसका दैनन्दिनी कार्यक्रम आदर्श हो. अतः मनुमहराज कहते हैं, इस देश में तैयार किए गये ब्राह्मणों से विश्व के सारे मानव आदर्श जीवन सीखें. ऐसे ब्राह्मणों को प्राचीन यूरोप में ड्रउइड कहा जाता था.

८९.   आयरलैंड में एक जगह है तारा हिल्स यानि तारा की पहाड़ियाँ जहाँ एक शिवलिंग स्थापित है। वैज्ञानिक इसे 4000 वर्ष प्राचीन बताते हैं. ये शिवलिंग यहाँ Pre Christian युग का है जब यहाँ मूर्ति पूजक रहते थे। आज से 2500 वर्ष पहले तक आयरलैंड के सभी राजाओं का राज्याभिषेक यहीं इन्हीं के आशीर्वाद से होता था, फिर 500 AD में ये परम्परा बंद कर दी गई। इसमें कोई शक नहीं कि ये शिव लिंग है क्यूँकि जिस देवी तारा के नाम पर ये पर्वत स्थित है हमारे शास्त्रों में तारा माता पार्वती को भी कहते हैं।

90.         यूरोप में ईसायत के प्रसार से पूर्व और रोमन शासक अगस्टस के ईसाई धर्म अपनाने तक यूरोप में वैदिक संस्कृति थी. इस संस्कृति का नेतृत्व और अधीक्षण, निरिक्षण, शिक्षण, व्यवस्थापन आदि कार्य ड्रुइडस के हाथों में था. पुरे द्वीप पर ड्रुइडो का धर्मशासन था. ड्रुइड धर्माधीश थे. ड्रुइडो के प्रति लोगों की इतनी श्रद्धा थी की ड्रुइडो की आज्ञा प्रमाण होती थी. किसी व्यक्ति को बहिष्कृत कराने अथवा व्यक्तिगत या सामूहिक विवादों में निर्णय इन्ही का माना जाता था. इन्हें युद्ध में नहीं जाना पड़ता था और कर भी नहीं भरना पड़ता था. (ए कम्प्लीट हिस्ट्री ऑफ़ ड्रुइडस, पेज २८-३१)

91.         पी एन ओक का कहना है की, “सारे विश्व में आर्यधर्म का अधीक्षण, निरिक्षण, व्यवस्थापन आदि करनेवाला वर्ग द्रविड़ कहलाता था. द्रविड़ का द्र यानि द्रष्टा और विद यानि ज्ञानी या जाननेवाला यानि ऋषि मुनि. यह द्रविड़ लोग केवल भारत में ही नहीं अपितु सारे विश्व में वही भूमिका निभाते थे. आर्य संस्कृति के रखवाले ऋषिमुनि ही यूरोप में ड्रुइड कहलाते हैं और भारत में द्रविड़. यूरोप में भी द्रविड़ थे. उन्हें ड्रुइड (Druids) कहा जाता था. अतः आर्य और द्रविड़ परस्पर पूरक संज्ञाएँ हैं.  वे समाज के पुरोहित, अध्यापक, गुरु, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, पंचांगकर्ता, खगोल-ज्योतिषी, भविष्यवेत्ता, मन्त्रद्रष्टा, वेदपाठी आदि गुरुजन थे.”

92.         “द्रविड़ तो क्षत्रिय थे और सारे क्षत्रिय आर्य (धर्मी) थे. मनुस्मृति के १० वें अध्याय के श्लोक ४३, ४४ में वृषलों के यानि क्षत्रियों के १० कुल थे जिनमे द्रविड़ सम्मिलित थे. (पेज १५४, Matter, myth and spirit or keltic Hindu Links, लेखिका, दोरोथि चैपलिन,)

चाणक्य द्वारा चन्द्रगुप्त को इसी वृषल शब्द से सम्बोधित करने पर हमारे वामपंथी इतिहास चन्द्रगुप्त मौर्य को शुद्र बताता है और तर्क देता है नीच अथवा अपमान सूचक वृषल शब्द शूद्रों केलिए प्रयोग किया जाता था.

93.         एशियाटिक रिसर्चस (खंड २, पृष्ठ ४८३) ग्रन्थ में रेवरेण्ड थोमस मौरिस लिखते हैं, “प्राचीन समाज के अध्ययन में ड्रुइड लोगों का मूल स्थान एशिया खंड ही था यह बात दीर्घ समय से मान्यता प्राप्त है. रियूबेन बरो नामक विख्यात खगोल ज्योतिषी पहला व्यक्ति था जिसने ड्रुइडो की दन्तकथाएँ, उनका समय, मान्यताएं, धारणाएँ आदि का कड़ा अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला की वे भारत से आए दार्शनिक थे.”

94.         Antiquities of India (खंड ६, भाग १, पृष्ठ २४६) में रेवरेण्ड थोमस मौरिस ने लिखा है, “यह पुरोहित (ड्रुइड लोग) भारत के ब्राह्मण थे. एशिया के उत्तरी प्रदेशों में फैलते-फैलते वे साईबेरिया तक गए. शनैः शनैः केल्टिक (उर्फ़ सेल्टिक) जातियों (कश्मीर के दक्षिण के कालतोय) में वे घुल मिल गए. वहां से आगे चलते-चलते यूरोप के कोने-कोने तक पहुँचते पहुंचते उन्होंने ब्रिटेन में भी ब्राह्मण केंद्र (गुरुकुल, मन्दिर) का स्थापना कर दिया. मेरा निष्कर्ष यह है की ब्रिटेन में एशियाई लोगों की सर्वप्रथम बस्ती थी.”

95.         जर्मनी में एक प्रदेश है वेदस्थान (Vaitland). वहां छः ऋषियों की प्रतिमाएं और वैदिक मन्दिर पाए गए थे.

96.         ड्रुइडो के कई मन्दिरों के भग्नावशेष अभी आयिजल ऑफ़ मैन और अंग्लसी द्वीपों (isle of Angelsey, ब्रिटेन के वेल्स में) पर हैं. उनमे से कई महान शिलाओं के हैं जैसी शिलाएं अबीरी और स्टोनहेंज नामक प्राचीन स्थानों में हैं. (वही पेज ३६)

मन्दिर का वह भग्नावशेष विष्णु मन्दिर का है. वहां शेषशय्या पर भगवान विष्णु विराजमान थे-पी एन ओक

97.         इजिप्त से निकलकर यहूदी लोग उनके प्रदेश में आने से पूर्व कननाइट लोगों (अर्थात कान्हा या कृष्ण के अनुयायी) ने मूर्तिपूजा आरम्भ कर दिया था. वे पूर्वाभिमुख होकर पहाड़ों पर खुले में यज्ञ करते थे.सारे पहाड़ शनी, गुरु और अपोलो (सूर्य) देवों के वसतिस्थान समझकर पवित्र माने जाते थे. कई व्यक्तियों का निष्कर्ष है की ड्रुइडो  के धर्म तत्व भारत के ब्राह्मण और योगीजनों से, ईरान के मगी (महायोगी) लोगों से और असीरिया के चाल्डईयन लोगों के तत्वों के समान ही थे.( पेज ४३-४५, A complete History of Druids)

98.         ड्रुइडो का कथन है की ब्रह्मा से उन्हें चार ग्रन्थ प्राप्त हुए जिनमे सारा ज्ञान भंडार है. मृत्यु के पश्चात प्रत्येक आत्मा नये शरीर में प्रवेश करता है एसा उनका विश्वास है. उनका कथन है की जीवहत्या नहीं करनी चाहिए. वे मांस नहीं खाया करते थे. विशिष्ट तिथियों को उनके यज्ञ और पर्व हुआ करते थे. यद्यपि उनके कुछ विशिष्ट देव थे, कई लोगों के अपने व्यक्तिगत देव या कुलदेवता भी होते थे. इन्द्र को विविध नामों से पूजा जाता था. उसे तारामिस यानि वरुण देवता कहते थे. उत्तर में उसे थोर करते थे. स्वीडन, जर्मनी देशों के निवासी और सैक्सन लोग उस देवता को उतना ही मानते थे जीतने ब्रिटेन के और फ़्रांस के लोग. ( पेज ४९-५९, A complete History of Druids)

99.         ब्रिटेन के केंट का राज्य जाट बन्धुओं का स्थापित किया हुआ है. केंट और वाईट द्वीप के निवासी जाटों की सन्तान हैं. (पृष्ठ ११३, Matter, myth and spirit or keltic Hindu Links, लेखिका, दोरोथि चैपलिन, प्रकाशक-F.S.A. Scott Rider and co., London, 1935)

100.      रोमन शासक जुलियस सीजर जो भारत के विक्रमादित्य के समकालीन (५३ इसा पूर्व लगभग) था उसका यूरोप पर शासन था. उसके ग्रन्थ का शीर्षक है Coesars commentarious on the gallic War, आंग्ल अनुवादक T. Rice Holmes, London, 1908) उसके पृष्ठ १८०-१८२ पर लिखा है की “फ़्रांस के हर भाग में दो ही वर्ण महत्वपूर्ण माने जाते हैं. उनमें एक हैं ड्रुइड (अर्थात ब्राह्मण) और दूसरा हैं सेनानायक (अर्थात क्षत्रिय). ड्रुइड लोग देवपूजन, व्यक्तिगत या सामूहिक होम हवन और धर्माचार, सम्बन्धी प्रश्नों पर विचार आदि में लगे रहते. ड्रुइडो की धर्मपरम्परा ब्रिटेन से फ़्रांस में पहुंची. आत्मा की अमरत्व की बात के कारन क्षत्रिय लोग युद्ध में वीरता से लड़ने में हिचकिचाते नहीं थे (पृष्ठ १८२-८३). ड्रुइड अपोलो (सूर्य), मंगल (रन देवता), मिनर्वा (लक्ष्मी) आदि की पूजा करते थे. इन्द्र को वे देवताओं का राजा कहते थे.

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